Dussehra 2026: अच्छाई की जीत का प्रतीक है दशहरा
भारत में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में दशहरा का विशेष महत्व है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसे विजयादशमी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके धर्म की स्थापना की थी। दशहरा न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दशहरा शब्द हिंदी के दो शब्दों दस और हारा से मिलकर बना है। जहां दस गणित के अंक दस (10) और हारा शब्द पराजित का सूचक है। इसलिए यदि इन दो शब्दों को जोड़ दिया जाए तो दशहरा बनता है।
भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक व शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में फसल उगाकर अनाज घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के लिये वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए उनका पूजन करता है। भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है।
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दशहरा भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इसी दिन भगवान राम ने बुराई के प्रतीक दस सिर वाले रावण का संहार किया था तो देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार करने वाले महिषासुर का 10 दिन तक चले भयंकर युद्ध के बाद मां दुर्गा ने वध किया था। इसीलिये इसको विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं। इस दिन शस्त्र-पूजा की जाती है। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का समापन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है।
भारत एक विविधताओं से भरा देश है जहाँ अनेक धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। यहां साल भर अनेक त्योंहार मनाए जाते हैं जो न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक भी होते हैं। इन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है दशहरा जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है और इसका भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान है। दशहरा का पर्व भगवान राम की रावण पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसे विजयादशमी कहा जाता है जिसका अर्थ है विजय प्राप्त करने वाला दसवाँ दिन। रामायण के अनुसार भगवान राम ने रावण का वध कर अपनी पत्नी सीता को उसके बंदीगृह से मुक्त कराया था। यह पर्व यह संदेश देता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो अंत में जीत सत्य और धर्म की ही होती है। यह त्योहार लोगों को नैतिक मूल्यों, सत्य, और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
बंगाल, ओडिशा और असम में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है। यह बंगालियों, ओडिया, और आसमिया लोगों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। बंगाल में दशहरा पूरे पांच दिनों के लिए मनाया जाता है। ओडिशा और असम मे चार दिन तक त्योहार चलता है। यहां देवी दुर्गा को भव्य सुशोभित पंडालों में विराजमान करते हैं। देश के नामी कलाकारों को बुलवा कर दुर्गा की मूर्ति तैयार करवाई जाती हैं। यहां दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है और प्रसाद वितरण किया जाता है। पुरुष आपस में आलिंगन करते हैं जिसे कोलाकुली कहते हैं। स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं। इसके साथ ही वे आपस में भी सिंदूर लगाती हैं व सिंदूर से खेलती हैं। इस दिन यहां नीलकंठ पक्षी को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। अन्त में देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।
महाराष्ट्र में नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को समर्पित रहते हैं जबकि दसवें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना की जाती है। इस दिन विद्यालय जाने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई में आशीर्वाद पाने के लिए मां सरस्वती के तांत्रिक चिह्नों की पूजा करते हैं। किसी भी चीज को प्रारंभ करने के लिए खासकर विद्या आरंभ करने के लिए यह दिन काफी शुभ माना जाता है। महाराष्ट्र के लोग इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश एवं नये घर खरीदने का शुभ मुहूर्त समझते हैं। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है।
कर्नाटक में मैसूर का दशहरा भी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को रोशनी से सज्जित किया जाता है और हाथियों का शृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य जुलूस निकाला जाता है। इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीपमालिकाओं से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इसके साथ शहर में लोग टार्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभायात्रा का आनंद लेते हैं। पंजाब में दशहरा नवरात्रि के नौ दिन का उपवास रखकर मनाते हैं।
गुजरात में मिट्टी सुशोभित रंगीन घड़ा देवी का प्रतीक माना जाता है और इसको कुंवारी लड़कियां सिर पर रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं जिसे गरबा कहा जाता है। गरबा नृत्य इस पर्व की शान है। पुरुष एवं स्त्रियां दो छोटे रंगीन डंडों को संगीत की लय पर आपस में बजाते हुए घूम घूम कर नृत्य करते हैं। तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते हैं। पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन होता है। अगले तीन दिन कला और विद्या की देवी सरस्वती की अर्चना की जाती है और अंतिम दिन देवी शक्ति की देवी दुर्गा की स्तुति की जाती है। पूजन स्थल को अच्छी तरह फूलों और दीपकों से सजाया जाता है। लोग एक दूसरे को मिठाइयां व कपड़े देते हैं।
कश्मीर के अल्पसंख्यक हिन्दू नवरात्रि के पर्व को श्रद्धा से मनाते हैं। परिवार के सारे वयस्क सदस्य नौ दिनों तक उपवास करते हैं। अत्यंत पुरानी परम्परा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय विजय नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।
हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। अन्य स्थानों की ही भांति यहां भी दस दिन अथवा एक सप्ताह पूर्व इस पर्व की तैयारी आरंभ हो जाती है। स्त्रियां और पुरुष सभी सुंदर वस्त्रों से सज्जित होकर ढोल, नगाड़े, बांसुरी आदि वाद्य यंत्रो को लेकर बाहर निकलते हैं। पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता का धूम धाम से जुलूस निकाल कर पूजन करते हैं। देवताओं की मूर्तियों को बहुत ही आकर्षक पालकी में सुंदर ढंग से सजाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। इस जुलूस में प्रशिक्षित नर्तक नटी नृत्य करते हैं। इस प्रकार जुलूस बनाकर नगर के मुख्य भागों से होते हुए नगर परिक्रमा करते हैं और कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ करते हैं। दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा निराली होती है।
बस्तर में दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय ना मान कर लोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते हैं। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैंजो दुर्गा का ही रूप हैं। यहां यह पर्व पूरे 75 दिन चलता है। यहाँ दशहरा श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है। बस्तर में यह समारोह लगभग 15वीं शताब्दी से शुरु हुआ था। इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है।
रमेश सर्राफ धमोरा
(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
दुर्गा विसर्जन और दशहरा: विजय, शक्ति और धर्म की स्थापना का महापर्व
दुर्गा विसर्जन और विजयादशमी यानी दशहरा ऐसा महापर्व है, जो बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अहंकार पर मर्यादा की विजय का संदेश देता है। शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के बाद दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है। इसी दिन अनेक स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। दूसरी ओर भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण के वध की स्मृति में देश के अनेक हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इस प्रकार एक ही पर्व में शक्ति की आराधना और धर्म की विजय, दोनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं।
कब मनाया जाएगा दशहरा और दुर्गा विसर्जन?
विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। दिल्ली के स्थानीय पंचांग के अनुसार दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12.50 बजे शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2.19 बजे समाप्त होगी। विजय मुहूर्त दिल्ली में लगभग दोपहर 1.59 बजे से 2.45 बजे तक बताया गया है। दुर्गा विसर्जन के लिए दिल्ली-एनसीआर के समीपवर्ती पंचांग गणना में 20 अक्टूबर को दोपहर 1.15 बजे से 3.31 बजे तक का समय दिया गया है। हालांकि पूजा और विसर्जन का मुहूर्त स्थान, स्थानीय सूर्योदय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार कुछ अलग हो सकता है।
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दशहरा का धार्मिक महत्व
इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। रावण विद्वान और शक्तिशाली होने के बावजूद अपने अहंकार, अधर्म और अन्याय के कारण विनाश को प्राप्त हुआ। इसलिए दशहरा यह संदेश देता है कि ज्ञान और शक्ति तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग धर्म और मर्यादा के लिए किया जाए।
दूसरी मान्यता शक्ति परंपरा से जुड़ी है। देवी दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध कर देवताओं और संसार को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई। इसीलिए विजयादशमी को असुरता पर देवी शक्ति की विजय का पर्व भी माना जाता है। यही कारण है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस दिन की धार्मिक परंपराएं अलग दिखाई देती हैं, लेकिन मूल भावना धर्म की विजय और अधर्म का अंत ही है।
दुर्गा विसर्जन का महत्व
नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा के बाद दशमी के दिन प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन को केवल प्रतिमा को जल में प्रवाहित करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह पूजा-अनुष्ठान की पूर्णता और मां को सम्मानपूर्वक विदा करने की धार्मिक परंपरा है। पूजा में जिस शक्ति का आवाहन किया गया था, विसर्जन के समय उसी शक्ति से पुनः अपने जीवन और घर-परिवार पर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है। विसर्जन का आध्यात्मिक संदेश भी अत्यंत गहरा है। संदेश यह है कि आगमन और प्रस्थान, निर्माण और विलय तथा आरंभ और पूर्णता प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। इसीलिए भक्त मां को विदा करते समय कहते हैं कि माता अगले वर्ष फिर आएं और अपने साथ सुख, शांति, समृद्धि और शक्ति लेकर आएं।
दुर्गा विसर्जन की सामान्य पूजा विधि
दुर्गा विसर्जन से पहले मां दुर्गा की पूजा श्रद्धा और विधि-विधान से की जाती है। सबसे पहले मां दुर्गा को स्नान, वस्त्र, पुष्प, अक्षत, रोली, सिंदूर, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। फिर मां दुर्गा की आरती की जाती है और परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण के लिए प्रार्थना की जाती है। जहां नवरात्रि की परंपरा में कन्या पूजन किया जाता है, वहां कन्याओं को भोजन कराया जाता है और उन्हें दक्षिणा तथा उपहार देकर आशीर्वाद लिया जाता है। नवरात्रि के प्रारंभ में स्थापित कलश तथा अन्य पूजन सामग्री का विधि के अनुसार समापन किया जाता है। कलश के जल को पवित्र स्थान या पौधे में अर्पित करने की परंपरा कई परिवारों में है। इसके बाद मां दुर्गा से निवेदन किया जाता है कि वे भक्तों की पूजा स्वीकार कर पुनः अपने दिव्य धाम को प्रस्थान करें और अपने आशीर्वाद से परिवार की रक्षा करें। तत्पश्चात प्रतिमा को श्रद्धापूर्वक विसर्जन स्थल तक ले जाया जाता है। वहां पूजा और प्रार्थना के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थल और नियमों का पालन करना चाहिए। प्रतिमा और पूजन सामग्री के विसर्जन की व्यवस्था स्थानीय नियमों के अनुसार करना उचित है।
दशहरा पूजन विधि
विजयादशमी के दिन अनेक परिवारों में भगवान श्रीराम, मां दुर्गा, शस्त्र, वाहन, औजार तथा पुस्तकों आदि की पूजा की जाती है। कुछ परंपराओं में शमी पूजा, अपराजिता पूजा और सीमोल्लंघन भी किया जाता है। इन्हें सामान्यतः अपराह्न काल में करने की परंपरा बताई गई है।
पूजा के लिए स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को स्वच्छ करें। भगवान श्रीराम, मां दुर्गा अथवा अपने इष्टदेव की पूजा करें। पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। शस्त्र, औजार या वाहन की पूजा करने की पारिवारिक परंपरा हो तो उसे भी विधिवत पूजें। शमी अथवा अपराजिता की पूजा करें। भगवान श्रीराम और मां दुर्गा का स्मरण करते हुए परिवार के सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। अंत में आरती करके प्रसाद वितरित करें। पूजा की स्थानीय परंपरा और कुलाचार को प्राथमिकता देना उचित है।
दशहरा व्रत कथा
विजयादशमी की कथा के दो प्रमुख धार्मिक प्रसंग हैं। श्रीराम और रावण का युद्ध तथा मां दुर्गा और महिषासुर का संग्राम।
श्रीराम और रावण की कथा
लंका का राजा रावण अत्यंत विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसके भीतर अहंकार और अधर्म बढ़ गया था। उसने माता सीता का हरण किया और भगवान श्रीराम को चुनौती दी। श्रीराम ने धर्म और न्याय की रक्षा के लिए रावण के विरुद्ध युद्ध किया। लंका में कई दिनों तक भयंकर युद्ध चला। अंततः विजयादशमी के दिन श्रीराम ने रावण का वध किया। इसी घटना की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है और अनेक स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इस कथा का संदेश केवल रावण के वध तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य को चेतावनी देती है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह अंततः विनाश का कारण बनता है।
मां दुर्गा और महिषासुर की कथा
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और अत्यंत शक्तिशाली हो गया। शक्ति के मद में उसने देवताओं और पृथ्वी पर अत्याचार आरंभ कर दिया। महिषासुर से युद्ध करने में देवताओं को कठिनाई हुई। तब देवताओं की शक्तियों के समन्वय से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर से भयंकर युद्ध किया और अंततः उसका वध कर दिया। इसी विजय की स्मृति में देवी को महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजा जाता है और नवरात्रि के बाद विजयादशमी को शक्ति की विजय का पर्व माना जाता है। यह कथा बताती है कि जब अत्याचार अपनी सीमा पार करता है, तब धर्म और शक्ति का संगठित रूप अधर्म का अंत करता है।
दशहरा हमें क्या संदेश देता है?
दशहरा केवल पुतले जलाने या उत्सव मनाने का दिन नहीं है। यह अपने भीतर मौजूद उन प्रवृत्तियों को पहचानने का अवसर भी है, जो मनुष्य को धर्म और सत्य से दूर ले जाती हैं। रावण के दस सिर को परंपरागत रूप से अनेक नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसलिए दशहरे का वास्तविक संदेश यह है कि मनुष्य अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अन्य विकारों पर विजय प्राप्त करे। मां दुर्गा की आराधना हमें शक्ति देती है और श्रीराम की मर्यादा हमें उस शक्ति के उचित उपयोग का मार्ग दिखाती है।
इसीलिए विजयादशमी का सबसे बड़ा संदेश है कि शक्ति हो, लेकिन उसके साथ विवेक हो। सामर्थ्य हो, लेकिन उसके साथ मर्यादा हो। विजय मिले, लेकिन उसके साथ धर्म भी बना रहे।
- शुभा दुबे
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