Bangladesh Elections: बांग्लादेश में ये हिंदू नेता भी बन सकते हैं मंत्री, रहमान सरकार में मिल सकती है अहम जिम्मेदारी
Bangladesh Elections: बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने आम चुनावों में भारी बहुमत हासिल कर लिया है. पार्टी अब सरकार बनाने की तैयारी में है. निर्वाचित सांसदों की आधिकारिक गजट अधिसूचना भी सरकार की ओर से जारी कर दी गई है. पार्टी से दो हिंदू सांसद भी चुने गए हैं. इनमें से ढाका-3 सीट से जीते गोयेश्वर चंद्र रॉय को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है. रॉय को बीएनपी का प्रभावशाली नेता माना जाता है. वे करीब 30 साल पहले खालिदा जिया की सरकार में भी राज्य मंत्री थे.
बांग्लादेशी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद के अलावा पांच बड़े विभाग अपने पास रख सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद 148 के अनुसार, आधिकारिक नतीजे आने के तीन दिन के अंदर निर्वाचित प्रतिनिधियों को शपथ लेनी होती है. इसी वजह से मंगलवार को सदस्य शपथ ग्रहण करेंगे. वहीं, कैबिनेट भी मंगलवार को ही शपथ लेगी.
जिया परिवार के करीबी हैं गोयेश्वर चंद्र रॉय
रॉय बांग्लादेश की राजनीति में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक माने जाते हैं. एक नवंबर 1951 को उनका जन्म ढाका जिले के केरानीगंज के एक बंगाली हिंदू परिवार में हुआ था. वे साल 1978 से ही बीएनपी से जुड़े हए हैं. वे वर्तमान में पार्टी की स्थायी समिति के सदस्य हैं, जो बीएनपी का सर्वोच्च नीति-निर्माण निकाय है. 1990 के दशक में खालिदा जिया की सरकार में वे राज्य मंत्री का जिम्मा निभा चुके हैं. वे पर्यावरण, वन, मत्सय और पशुपालन मंत्रालय के प्रभारी थे.
जमात के शाहिनुर इस्लाम को हराया
ढाका-3 सीट से उन्होंने जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार मोहम्मद शाहिनुर इस्लाम को लगभग 17,000 वोटों से हराया था. वे खुद को धरती का बेटा बोलते हैं. उनका कहना है कि बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक अलग नहीं है. सभी नागरिकों को बांग्लादेश में समान अधिकार मिले हैं.
रोम के जिओर्दानो ब्रूनो, जिनके विचारों से घबराई सत्ता और जिंदा जला दिया
नई दिल्ली, 16 फरवरी (आईएएनएस)। चुनौती किसी भी सत्ता को पसंद नहीं होती है, चाहे वो धर्म के ठेकेदार हों या फिर समाज और देश पर राज करने वाले। जिओर्दानो ब्रूनो के साथ ऐसा ही कुछ हुआ। इटली के दार्शनिक, गणितज्ञ और खगोलचिंतक जिओर्दानो ब्रूनो को यूरोपीय बौद्धिक इतिहास में स्वतंत्र चिंतन के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
वे उन विचारकों में थे जिन्होंने स्थापित धार्मिक मान्यताओं के बीच ब्रह्मांड और मानव ज्ञान की सीमाओं पर नए प्रश्न उठाए। उनके विचारों ने 16वीं सदी के यूरोप में गहरा विवाद पैदा किया और अंततः उन्हें कठोर दंड का सामना करना पड़ा। ब्रूनो का जन्म 1548 में इटली के नोला नगर में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे डोमिनिकन मठ में शामिल हुए, जहां उन्होंने धर्मशास्त्र और दर्शन का अध्ययन किया।
अध्ययन के दौरान ही उन्होंने पारंपरिक मान्यताओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। वे निकोलस कोपरनिकस के सूर्यकेन्द्रीय सिद्धांत से प्रभावित थे, जिसमें पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र नहीं माना गया था। ब्रूनो ने इस सिद्धांत को और आगे बढ़ाया। उनका मत था कि ब्रह्मांड अनंत है और उसमें असंख्य तारे हैं, जो स्वयं अन्य सौरमंडलों के केंद्र हो सकते हैं। उन्होंने यह भी संभावना व्यक्त की कि अन्य ग्रहों पर जीवन मौजूद हो सकता है। उस समय के धार्मिक दृष्टिकोण में ब्रह्मांड सीमित और पृथ्वी-केंद्रित माना जाता था, इसलिए उनके विचारों को विधर्म के रूप में देखा गया।
उनके दार्शनिक विचार केवल खगोल विज्ञान तक सीमित नहीं थे। वे ईश्वर को ब्रह्मांड की असीम उपस्थिति के रूप में देखते थे और मानते थे कि सत्य की खोज तर्क और अनुभव से की जानी चाहिए। इन विचारों ने चर्च के आधिकारिक सिद्धांतों को चुनौती दी, जो पसंद नहीं आई।
1592 में उन्हें गिरफ्तार किया गया और रोम ले जाया गया, जहां रोमन इन्क्विजिशन के सामने उन पर मुकदमा चला। कई वर्षों तक चली सुनवाई के दौरान उन पर जोर डाला गया कि वो अपने विचारों को त्याग दें, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। अंततः 17 फरवरी 1600 को रोम के कैंपो दे फियोरी में उन्हें जिंदा जला दिया गया। समय के साथ इतिहास ने ब्रूनो को अलग दृष्टि से देखा।
आधुनिक युग में उन्हें वैज्ञानिक जिज्ञासा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में माना जाता है। 19वीं सदी में उसी स्थान पर उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जहां उन्हें दंड दिया गया था।
--आईएएनएस
केआर/
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