चीन को झटका देने के लिए भारत ने एक बड़ा कदम उठाया। सीमा के पास ब्रह्मपुत्र नदी की लहरों के सैकड़ों फीट नीचे भारत सुरंग बनाने की तैयारी कर रहा है। यहां दो विशाल सुरंगे बनाई जाएंगी और चीन की हर चाल पर नजर रखी जाएगी। भारत का यह कदम चीन के लिए तगड़ा झटका है। दरअसल भारत सरकार ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे देश की पहली अंडर वाटर रोल रेल सुरंग बनाने की तैयारी में है। यह मेगा प्रोजेक्ट असम में गोपुर को नुमलीगढ़ से जोड़ेगा। इसकी अनुमानित लागत 18,600 से 19,000 करोड़ बताई जा रही है और जल्द ही केंद्रीय कैबिनेट से इसे मंजूरी मिलने की उम्मीद है। सबसे बड़ी बात कि यह सुरंग दो अलग-अलग ट्यूब में बनेगी। एक सड़क के लिए और दूसरी रेलवे लाइन के लिए। यानी गाड़ियां और ट्रेनें दोनों एक साथ नदी के नीचे से गुजर सकेंगी।
अभी ब्रह्मपुत्र पार करने में नाव या पुल के जरिए 4 से 6 1/2 घंटे तक लग जाते हैं। लेकिन सुरंग बनने के बाद यह दूरी सिर्फ 30 मिनट में तय की जा सकेगी। बाढ़, बारिश या प्राकृतिक आपदा का भी इस पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि यह पानी के नीचे सुरक्षित ढांचे के रूप में तैयार की जाएगी। आर्थिक नजरिए से देखें तो यह सुरंग असम और पूरे पूर्वोत्तर के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है। चाय, फल, सब्जियां और अन्य स्थानीय उत्पाद तेजी से देश के बाकी हिस्सों तक पहुंचेंगे। लॉजिस्टिक्स की लागत घटेगी क्योंकि ट्रकों और ट्रेनों का लंबा चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। बेहतर कनेक्टिविटी से निजी कंपनियां निवेश करेंगी। फैक्ट्रियां लगेंगी और हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा। पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा क्योंकि सफर आसान और तेज हो जाएगा।
इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे देश की रक्षा और मजबूत होगी। असम पूर्वी सीमा पर स्थित है और अरुणाचल के जरिए चीन से सटाक है। साथ ही बांग्लादेश और म्यांमार की सीमाएं पास हैं। ऐसे में सेना की तेज आवाजाही बेहद जरूरी है। सुरंग बनने के बाद आपात स्थिति में सैनिक हथियार और जरूरी सामान सिर्फ 30 मिनट में नदी पार कर सकेंगे। पुलों पर निर्भरता कम होगी जो बाढ़ या दुश्मन हमले में क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। यह सुलीगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन नेक पर दबाव कम करने में मदद करेगा जो कहीं ना कहीं चीन के लिए एक बड़ा झटका साबित होने वाला है। यह परियोजना पूर्वोत्तर को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने वाली रणनीतिक जीवन रेखा बनेगी। यह सिर्फ एक सुरंग नहीं बल्कि भूगोल की चुनौती को अवसर में बदलने की कोशिश है। हाईवे, रेलवे और जलमार्ग के साथ यह परियोजना क्षेत्र के समग्र विकास का हिस्सा है।
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14 फरवरी असम का डिब्रूगढ़ और भारत की सुरक्षा रणनीति में एक नया ऐतिहासिक दिन। भारतीय वायुसेना ने इतिहास रच दिया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद सी130 जे सुपर हरकुलस से हाईवे पर बने इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी पर उतरे। आज देश की पहली हाईवे इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उतरे। यह कोई सामान्य रनवे नहीं है। यह एक ऐसा हाईवे है जो जरूरत पड़ने पर एयरफोर्स का रनवे बन जाता है। प्रधानमंत्री ने लैंडिंग की लॉकिड मार्टिन C130 जे सुपर हरकुलस से जो स्पेशल ऑपरेशन और टेक्निकल मिशनों के लिए जाना जाता है। चलिए अब जानते हैं ईएलएफ यानी कि इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी है क्या? सोचिए जिस हाईवे पर रोज गाड़ियां दौड़ती है, वहां कुछ मिनटों में एयरफोर्स का रनवे बन जाए।
ईएलएफ एक ऐसा हाईवे स्ट्रिप होता है जिसे इस तरह डिजाइन किया जाता है। जरूरत पड़ने पर लड़ाकू विमान उतर सकें। ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ऑपरेट कर सकें। हेलीकॉप्टर से कैजुअल्टी इवैक्यूएशन हो सके। अगर युद्ध में मुख्य एयरबेस को नुकसान हो जाए तो यही हाईवे बन जाएगा बैकअप एयरबेस।
डिब्रूगढ़ ईएलएफ क्यों खास है?
डिब्रूगढ़ ऊपरी असम में है। भारत चीन सीमा के बेहद करीब है। रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। अब यह ईएलएफ पूर्वी सेक्टर में भारतीय वायुसेना की ऑपरेशनल गहराई बढ़ाता है। यह सुविधा दुश्मन के लिए टारगेटिंग मुश्किल बनाती है। एयरक्राफ्ट की सर्वाइवल कैपेबिलिटी बढ़ाती है। तेज तैनाती और रिस्पांस सुनिश्चित करती है। यह सिर्फ उद्घाटन नहीं था। यह पावर शो था वायुसेना का। प्रधानमंत्री मोदी का खुद इस ट्रिप पर उतरना एक बड़ा प्रतीक है। यह वही मॉडल है जैसा साल 2021 में उत्तर प्रदेश में हुआ था जब उन्होंने सुल्तानपुर के हाईवे स्ट्रिप पर लैंडिंग की थी। लेकिन डिब्रूगढ़ का महत्व कहीं ज्यादा है क्योंकि यह पूर्वोत्तर के संवेदनशील मोर्चे पर है।
यह ईएलएफ कोई अकेला प्रोजेक्ट नहीं है। सड़क परिवहन मंत्रालय और इंडियन एयरफोर्स देश भर में 28 ऐसे स्थान चिन्हित कर चुके हैं। असम में ही पांच ईएलएफ बन रहे हैं। इतना ही नहीं कुछ और बड़े प्रोजेक्ट हैं जैसे ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे प्रस्तावित रोड, रेल, सुरंग, ऑल वेदर, टनल, रणनीतिक सड़क नेटवर्क और इन सब का मकसद है सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता कम करना, तेज सन तैनाती करना और सीमाई सुरक्षा सुनिश्चित करना। अब सिलीगुरु कॉरिडोर जिसे चिकन ने कहा जाता है। भारत के लिए बेहद संवेदनशील इलाका है। अगर वहां कनेक्टिविटी प्रभावित हो जाए तो पूर्वोत्तर का संपर्क कट सकता है।
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