बांग्लादेश चुनाव 2026: रहमान की जीत भारत के लिए 'चुनौती' या 'मौका'? जमात का खतरा और कूटनीति का पूरा विश्लेषण
नई दिल्ली : बांग्लादेश के 13वें आम चुनाव में तारिक रहमान की प्रचंड जीत ने दक्षिण एशिया के सियासी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। 208 सीटों के साथ बीएनपी की सत्ता में वापसी ने नई दिल्ली के गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अवामी लीग के जाने के बाद भारत के लिए चुनौतियां बढ़ी हैं, लेकिन जमात-ए-इस्लामी पर बीएनपी का बढ़ता वर्चस्व भारत के लिए एक राहत भरी खबर भी है। अगर जमात सत्ता की चाबी अपने हाथ में लेती, तो बांग्लादेश सीधे तौर पर पाकिस्तान की गोद में जा सकता था, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट होता।
विशेषज्ञों की चिंता: क्या फिर लौटेगा भारत विरोधी दौर?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता तारिक रहमान का पिछला इतिहास है। 2001-2006 के बीएनपी शासनकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के संबंधों में काफी कड़वाहट थी। उस समय पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादियों को बांग्लादेश में सुरक्षित पनाहगाह मिलती थी।
विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या तारिक रहमान अब पुराने ढर्रे पर चलेंगे या 17 साल के निर्वासन के बाद एक परिपक्व राजनेता के रूप में भारत के साथ नई शुरुआत करेंगे।
'जमात' और पाकिस्तान का गठजोड़: भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा
विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि यदि जमात-ए-इस्लामी इस चुनाव में बीएनपी से अधिक शक्तिशाली होकर उभरती, तो बांग्लादेश का 'पाकिस्तानीकरण' होना तय था। जमात की विचारधारा भारत विरोधी रही है।
हालांकि, बीएनपी को मिले स्पष्ट बहुमत ने जमात को 'किंगमेकर' बनने से रोक दिया है। यह भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से एक सकारात्मक पक्ष है, क्योंकि अब तारिक रहमान को फैसले लेने के लिए कट्टरपंथी ताकतों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा और 'जीरो टॉलरेंस' नीति
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सीधे तौर पर बांग्लादेश की स्थिरता से जुड़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की पहली मांग तारिक सरकार से यह होगी कि बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल 'सेवन सिस्टर्स' में उग्रवाद फैलाने के लिए न हो। यदि तारिक रहमान सुरक्षा के मुद्दे पर भारत को सहयोग देते हैं, तो दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ जल्दी पिघल सकती है।
चीन का बढ़ता प्रभाव और कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
अवामी लीग के पतन के बाद चीन और पाकिस्तान बांग्लादेश में अपनी पैठ बढ़ाने की पूरी कोशिश करेंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, तारिक रहमान की सरकार के लिए बीजिंग से आने वाला भारी निवेश लुभावना हो सकता है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत बांग्लादेश को चीन के कर्ज जाल में जाने से कैसे रोके और अपनी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को सुरक्षित रखे।
आर्थिक निर्भरता: भारत के बिना अधूरा है बांग्लादेश का बाजार
जानकारों का मानना है कि तारिक रहमान अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेश की डूबती अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते अनिवार्य हैं। बिजली आपूर्ति से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक, बांग्लादेश भारत पर निर्भर है। यह आर्थिक निर्भरता भारत के लिए एक कूटनीतिक हथियार की तरह काम करेगी, जो नई सरकार को भारत विरोधी कदम उठाने से रोकेगी।
तीस्ता जल बंटवारा और लंबित कूटनीतिक मुद्दे
विशेषज्ञों का कहना है कि तारिक रहमान अपनी घरेलू लोकप्रियता बनाए रखने के लिए भारत से तीस्ता जल समझौते जैसे लंबित मुद्दों पर दबाव बना सकते हैं। शेख हसीना के दौर में ये मुद्दे ठंडे बस्ते में थे, लेकिन अब बीएनपी इन मुद्दों को उछालकर खुद को 'राष्ट्रवादी' साबित करने की कोशिश करेगी। भारत को इन संवेदनशील मसलों पर बहुत सावधानी से बातचीत की मेज पर आना होगा।
अवामी लीग के बाद का खालीपन और भारत की रणनीति
शेख हसीना की अनुपस्थिति में भारत ने एक भरोसेमंद साथी खोया है। अब भारत को अपनी रणनीति बदलते हुए सीधे तौर पर बांग्लादेश की जनता और नए नेतृत्व के साथ 'पीपल-टू-पीपल' कनेक्ट बढ़ाना होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को अब तारिक रहमान के साथ एक "वर्किंग रिलेशनशिप" तैयार करनी होगी, जो केवल राजनीतिक विचारधारा पर नहीं बल्कि सुरक्षा और विकास के साझा हितों पर आधारित हो।
NITI Aayog रिपोर्ट की बड़ी सलाह, Electronics Export बढ़ाने के लिए FTA का सही इस्तेमाल जरूरी
भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात बढ़ाने के लिए संरचनात्मक लागत संबंधी चुनौतियों का समाधान करना, मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का बेहतर ढंग से फायदा उठाना और रणनीतिक कलपुर्जों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना होगा। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है।
दुनियाभर में इलेक्ट्रॉनिक्स 4.6 लाख करोड़ डॉलर का बाजार
आयोग की शुक्रवार को जारी ‘ट्रेड वॉच क्वार्टरली’ रिपोर्ट के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र का दुनियाभर में 4.6 लाख करोड़ डॉलर का बाजार है, लेकिन 2024 में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक प्रतिशत ही रही। कंप्यूटर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले इंटीग्रेटेड सर्किट (आईसी) और सेमीकंडक्टर जैसे उच्च-प्रौद्योगिकी कलपुर्जों के बाजार पर चीन, हांगकांग और ताइवान का दबदबा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल में कई देशों एवं समूहों के साथ हुए एफटीए से भारतीय उत्पादों की विदेशी बाजार तक पहुंच बेहतर हुई है, लेकिन अस्थिर भू-राजनीतिक माहौल में निवेश जुटाने के लिए घरेलू खरीद नीति में अनुमान लगा पाने की क्षमता, निर्यात वित्त और विनियामक सरलीकरण पर अधिक जोर देना होगा।
नीति आयोग ने सुझाव दिया कि भारत की रणनीति को असेंबली आधारित वृद्धि से आगे बढ़कर कलपुर्जा-आधारित विनिर्माण की ओर स्थानांतरित होना चाहिए। आपूर्ति पक्ष पर प्रोत्साहनों को घरेलू मूल्य संवर्धन, निरंतर शोध एवं विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देने वाले ‘एंकर निवेश’ से जोड़ा जाना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात मुख्यतः अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) एवं नीदरलैंड को होते हैं और इनमें मोबाइल फोन की हिस्सेदारी 52.5 प्रतिशत है।
वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में इंटीग्रेटेड सर्किट, मोबाइल फोन और डेटा प्रोसेसिंग मशीनों की बड़ी हिस्सेदारी है। सितंबर तिमाही में देश के कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात में लगभग 8.5 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की गई, जो आयात वृद्धि से अधिक रही। रिपोर्ट के मुताबिक, सीमापार ई-कॉमर्स 2030 तक निर्यात वृद्धि का प्रमुख माध्यम बन सकता है।
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