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'गेंदबाज ही हार के जिम्मेदार हैं...', पूर्व भारतीय क्रिकेटर ने खोली गेंदबाजों की पोल, बोले- 'ऐसा पहली बार नहीं हुआ'

Mohammed Kaif On Team India Loss: बुधवार को हैदराबाद में चौथे T20I मैच में वेस्टइंडीज के हाथों भारतीय क्रिकेट टीम को 24 रनों से करारी हार का सामना करना पड़ा. इस करारी हार के बाद भारत के पूर्व बल्लेबाज मोहम्मद कैफ ने टीम इंडिया के प्रदर्शन की कड़ी आलोचना की. टॉस जीतने के बाद भारत ने पहले गेंदबाजी करने का फैसला किया, लेकिन कैप्टन श्रेयस अय्यर यह फैसला उल्टा पड़ गया क्योंकि वेस्टइंडीज के बल्लेबाजों ने शुरुआत से ही भारतीय गेंदबाजों पर दबदबा बनाए रखा. मेहमान टीम ने अपने 20 ओवरों में 247/3 का विशाल स्कोर खड़ा किया, जिसमें कप्तान शाई होप ने सिर्फ 50 गेंदों पर नाबाद 102 रन बनाकर अहम भूमिका निभाई.

इनिंग्स ब्रेक के दौरान, कैफ ने श्रेयस अय्यर और भारतीय गेंदबाजों की जमकर आलोचना की. उन्होंने गेंदबाजों के खराब प्रदर्शन पर सवाल उठाए, क्योंकि कई गेंदबाजों के लिए यह मैच काफी मुश्किल रहा. अर्शदीप सिंह, अक्षर पटेल और मयंक यादव काफी महंगे साबित हुए, जिसके चलते वेस्टइंडीज की टीम 250 रन के आंकड़े के बेहद करीब तक पहुंच गई.

मोहम्मद कैफ ने भारतीय गेंदबाजों की लगाई क्लास

पूर्व भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद कैफ ने भारतीय गेंदबाजों के निराशाजनक प्रदर्शन को हार का कारण माना. उन्होंने कहा, "भारतीय टीम के हारने का मुख्य कारण की बात करें, तो इसके लिए हम काफी हद तक गेंदबाजी को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं. वह गेंदबाजी ही है. हम बल्लेबाजी की बात तो करते हैं, लेकिन 247 रन एक बहुत बड़ा स्कोर होता है, भाई! मेरा मानना ​​है कि अगर हम हारे हैं, तो इसकी वजह खराब गेंदबाजी है. हमने बहुत ज्यादा रन लुटा दिए. इस मैदान पर इतने रन काफी से भी ज्यादा हैं, और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है."

बल्लेबाजों पर भी बोले कैफ

वेस्टइंडीज के दिए 248 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय क्रिकेट टीम ने अच्छी शुरुआत की थी. पहले विकेट के लिए संजू सैमसन और अभिषेक शर्मा के बीच 60 रनों की पार्टनरशिप हुई थी. मगर, फिर टीम नियमित अंतराल पर विकेट गंवाती रही और 24 रन से मैच हार गई.

मोहम्मद कैफ ने भारतीय बल्लेबाजों पर बात करते हुए कहा, "पहला विकेट 60 रन पर गिरा, जो कि ठीक है. लेकिन 90 रन के आसपास आपके तीन विकेट गिर गए, और इसी से मैच बदल गया. आपने बहुत कम समय में अपने तीन फॉर्म में चल रहे बल्लेबाजों संजू सैमसन, श्रेयस अय्यर और ईशान किशन को खो दिया. मुझे लगता है कि मैच में यही सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था. इसके बाद वेस्टइंडीज ने वापसी की."

भारत को 24 रन से मिली हार

हैदराबाद के राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में भारत और वेस्टइंडीज के बीच चौथा टी-20 मैच खेला गया. इस मुकाबले में भारतीय कप्तान श्रेयस अय्यर ने टॉस जीतकर गेंदबाजी करने का फैसला किया. जहां, पहले बैटिंग करने आई वेस्टइंडीज की टीम ने 3 विकेट के नुकसान पर 247 रन बोर्ड पर लगा दिए. जवाब में लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम 9 विकेट के नुकसान पर 223 रन ही बना पाई और 24 रन से हार गई.

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इस्लामाबाद सिंड्रोम: वेस्टर्न स्पाई और पाकिस्तानी ISI के बीच बढ़ा अविश्वास, फ्रांस की DGSE और CIA से जुड़े रहस्यमयी मामलों ने बढ़ाया शक

इस्लामाबाद सिंड्रोम: इस्लामाबाद में जासूसी की दुनिया लंबे समय से शक, टकराव और गुप्त अभियानों से भरी रही है. फ्रांस की विदेशी खुफिया एजेंसी DGSE और अमेरिकी CIA समेत पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस  के साथ रिश्ते हमेशा जटिल रहे हैं. अब एक नई रिपोर्ट में ऐसे कई रहस्यमयी घटनाक्रमों का जिक्र किया गया है, जिन्हें कुछ खुफिया अधिकारियों ने “इस्लामाबाद सिंड्रोम” की संज्ञा दी है. 

फ्रांसीसी जासूस के रेडिएशन एक्सपोजर का मामला

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2010 में इस्लामाबाद स्थित फ्रांसीसी दूतावास में तैनात DGSE अधिकारी जेरोम (बदला हुआ नाम) ने रेडिएशन मापने वाले डोजीमीटर से जांच की, जिसमें उसके रेडिएशन के संपर्क में आने के संकेत मिले. बाद की जांच में उसके क्रोमोसोम में बदलाव पाए गए, जो रेडिएशन एक्सपोजर का परिणाम हो सकते थे. कुछ अन्य DGSE अधिकारियों ने भी अपने स्तर पर जांच कराई, जिसमें कुछ के डोजीमीटर में रेडिएशन एक्सपोजर दर्ज हुआ. इस घटना के बाद फ्रांसीसी अधिकारियों को रूस के पूर्व खुफिया अधिकारी अलेक्जेंडर लिट्विनेंको की मौत की याद आई, जिनकी 2006 में पोलोनियम-210 जहर से मौत हुई थी. इस मामले में शक की सुई पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की तरफ गई, जो उस समय जनरल अहमद शुजा पाशा के नेतृत्व में थी.

रिपोर्ट के अनुसार, उस समय DGSE ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी जानकारियां जुटाने के लिए एक अहम स्रोत तैयार किया था. अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस को आशंका थी कि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम और परमाणु सामग्री आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे समूहों के हाथ लग सकती है. 1998 में परमाणु शक्ति घोषित पाकिस्तान का परमाणु भंडार 2010 तक करीब सौ हथियारों तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था. साथ ही, परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान के नेटवर्क और उत्तर कोरिया के साथ संभावित परमाणु संबंधों को लेकर पश्चिमी खुफिया एजेंसियां सतर्क थीं. 

DGSE और ISI के बीच बढ़ी खुफिया जंग

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि DGSE और ISI के बीच तनाव तब बढ़ा जब फ्रांसीसी एजेंटों ने पाकिस्तान में अपने खुफिया स्रोत विकसित करने शुरू किए. कराची में तैनात एक फ्रांसीसी अधिकारी को स्थानीय स्रोत भर्ती करने के बाद देश छोड़ने के लिए कहा गया. इसके बाद ISI की निगरानी फ्रांसीसी एजेंटों पर और बढ़ गई. हालांकि, फ्रांसीसी जांच एजेंसियों और फ्रेंच रेडिएशन प्रोटेक्शन इंस्टीट्यूट (IRSN) की जांच में रेडिएशन के ठोस सबूत नहीं मिले. 2010-11 में इस्लामाबाद पहुंची IRSN टीम ने भी दूतावास परिसर में कोई असामान्य रेडिएशन नहीं पाया. 

CIA स्टेशन चीफ की बीमारी और ISI पर शक

रिपोर्ट के मुताबिक, DGSE से जुड़े इस मामले ने अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों का ध्यान भी खींचा. CIA और MI6 अधिकारियों ने फ्रांसीसी अधिकारियों के साथ बैठकें कीं और ISI की संभावित भूमिका को लेकर चिंता जताई. इसके कुछ समय बाद इस्लामाबाद में CIA स्टेशन चीफ मार्क केल्टन भी एक रहस्यमयी बीमारी से जूझने लगे. 2011 में ओसामा बिन लादेन के एबटाबाद ऑपरेशन के बाद उन्हें तेज पेट दर्द की शिकायत हुई और इलाज के लिए अमेरिका लौटना पड़ा. CIA डॉक्टरों ने कई संभावनाओं पर विचार किया, जिनमें जहर दिए जाने की आशंका भी शामिल थी. हालांकि, किसी भी जांच में इसकी पुष्टि नहीं हो सकी. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में मौजूद बैक्टीरिया और अन्य स्वास्थ्य कारण भी बीमारी की वजह हो सकते थे. 

ISI को लेकर पश्चिमी एजेंसियों में गहरा अविश्वास

रिपोर्ट के अनुसार, रेडिएशन एक्सपोजर और कथित जहर देने जैसी आशंकाओं ने पश्चिमी खुफिया एजेंसियों में ISI के प्रति पहले से मौजूद अविश्वास को और गहरा किया. हालांकि, इन घटनाओं में ISI की प्रत्यक्ष भूमिका साबित नहीं हो सकी. 'इस्लामाबाद सिंड्रोम' की कहानी दरअसल उन जटिल रिश्तों को दिखाती है, जहां आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और परमाणु सुरक्षा जैसे मुद्दों पर साझेदारी के बावजूद खुफिया एजेंसियां एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर पातीं.

इस्लामाबाद: दुनिया की खुफिया गतिविधियों का केंद्र

अफगानिस्तान युद्ध, आतंकवादी संगठनों पर निगरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों के कारण पाकिस्तान पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है. अमेरिका ने 9/11 के बाद पाकिस्तान के साथ आतंकवाद विरोधी अभियानों में सहयोग बढ़ाया, लेकिन इसी दौरान पाकिस्तान की नीतियों और कुछ आतंकी संगठनों को लेकर वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच मतभेद भी सामने आते रहे जिससे जुड़ी कई रिपोर्ट सार्वजनिक हुई और सामने आई. खुफिया एजेंसियों के बीच संबंध आमतौर पर सार्वजनिक नहीं होते, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी इंटेलिजेंस साझेदारी की नींव भरोसा, सूचना साझा करने और रणनीतिक समानता पर टिकी होती है. जब देशों के हित अलग-अलग होते हैं तो सहयोग के बावजूद प्रतिस्पर्धा और अविश्वास बना रह सकता है.

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