इस्लामाबाद सिंड्रोम: वेस्टर्न स्पाई और पाकिस्तानी ISI के बीच बढ़ा अविश्वास, फ्रांस की DGSE और CIA से जुड़े रहस्यमयी मामलों ने बढ़ाया शक
इस्लामाबाद सिंड्रोम: इस्लामाबाद में जासूसी की दुनिया लंबे समय से शक, टकराव और गुप्त अभियानों से भरी रही है. फ्रांस की विदेशी खुफिया एजेंसी DGSE और अमेरिकी CIA समेत पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस के साथ रिश्ते हमेशा जटिल रहे हैं. अब एक नई रिपोर्ट में ऐसे कई रहस्यमयी घटनाक्रमों का जिक्र किया गया है, जिन्हें कुछ खुफिया अधिकारियों ने “इस्लामाबाद सिंड्रोम” की संज्ञा दी है.
फ्रांसीसी जासूस के रेडिएशन एक्सपोजर का मामला
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2010 में इस्लामाबाद स्थित फ्रांसीसी दूतावास में तैनात DGSE अधिकारी जेरोम (बदला हुआ नाम) ने रेडिएशन मापने वाले डोजीमीटर से जांच की, जिसमें उसके रेडिएशन के संपर्क में आने के संकेत मिले. बाद की जांच में उसके क्रोमोसोम में बदलाव पाए गए, जो रेडिएशन एक्सपोजर का परिणाम हो सकते थे. कुछ अन्य DGSE अधिकारियों ने भी अपने स्तर पर जांच कराई, जिसमें कुछ के डोजीमीटर में रेडिएशन एक्सपोजर दर्ज हुआ. इस घटना के बाद फ्रांसीसी अधिकारियों को रूस के पूर्व खुफिया अधिकारी अलेक्जेंडर लिट्विनेंको की मौत की याद आई, जिनकी 2006 में पोलोनियम-210 जहर से मौत हुई थी. इस मामले में शक की सुई पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की तरफ गई, जो उस समय जनरल अहमद शुजा पाशा के नेतृत्व में थी.
रिपोर्ट के अनुसार, उस समय DGSE ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी जानकारियां जुटाने के लिए एक अहम स्रोत तैयार किया था. अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस को आशंका थी कि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम और परमाणु सामग्री आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे समूहों के हाथ लग सकती है. 1998 में परमाणु शक्ति घोषित पाकिस्तान का परमाणु भंडार 2010 तक करीब सौ हथियारों तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था. साथ ही, परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान के नेटवर्क और उत्तर कोरिया के साथ संभावित परमाणु संबंधों को लेकर पश्चिमी खुफिया एजेंसियां सतर्क थीं.
DGSE और ISI के बीच बढ़ी खुफिया जंग
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि DGSE और ISI के बीच तनाव तब बढ़ा जब फ्रांसीसी एजेंटों ने पाकिस्तान में अपने खुफिया स्रोत विकसित करने शुरू किए. कराची में तैनात एक फ्रांसीसी अधिकारी को स्थानीय स्रोत भर्ती करने के बाद देश छोड़ने के लिए कहा गया. इसके बाद ISI की निगरानी फ्रांसीसी एजेंटों पर और बढ़ गई. हालांकि, फ्रांसीसी जांच एजेंसियों और फ्रेंच रेडिएशन प्रोटेक्शन इंस्टीट्यूट (IRSN) की जांच में रेडिएशन के ठोस सबूत नहीं मिले. 2010-11 में इस्लामाबाद पहुंची IRSN टीम ने भी दूतावास परिसर में कोई असामान्य रेडिएशन नहीं पाया.
CIA स्टेशन चीफ की बीमारी और ISI पर शक
रिपोर्ट के मुताबिक, DGSE से जुड़े इस मामले ने अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों का ध्यान भी खींचा. CIA और MI6 अधिकारियों ने फ्रांसीसी अधिकारियों के साथ बैठकें कीं और ISI की संभावित भूमिका को लेकर चिंता जताई. इसके कुछ समय बाद इस्लामाबाद में CIA स्टेशन चीफ मार्क केल्टन भी एक रहस्यमयी बीमारी से जूझने लगे. 2011 में ओसामा बिन लादेन के एबटाबाद ऑपरेशन के बाद उन्हें तेज पेट दर्द की शिकायत हुई और इलाज के लिए अमेरिका लौटना पड़ा. CIA डॉक्टरों ने कई संभावनाओं पर विचार किया, जिनमें जहर दिए जाने की आशंका भी शामिल थी. हालांकि, किसी भी जांच में इसकी पुष्टि नहीं हो सकी. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में मौजूद बैक्टीरिया और अन्य स्वास्थ्य कारण भी बीमारी की वजह हो सकते थे.
ISI को लेकर पश्चिमी एजेंसियों में गहरा अविश्वास
रिपोर्ट के अनुसार, रेडिएशन एक्सपोजर और कथित जहर देने जैसी आशंकाओं ने पश्चिमी खुफिया एजेंसियों में ISI के प्रति पहले से मौजूद अविश्वास को और गहरा किया. हालांकि, इन घटनाओं में ISI की प्रत्यक्ष भूमिका साबित नहीं हो सकी. 'इस्लामाबाद सिंड्रोम' की कहानी दरअसल उन जटिल रिश्तों को दिखाती है, जहां आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और परमाणु सुरक्षा जैसे मुद्दों पर साझेदारी के बावजूद खुफिया एजेंसियां एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर पातीं.
इस्लामाबाद: दुनिया की खुफिया गतिविधियों का केंद्र
अफगानिस्तान युद्ध, आतंकवादी संगठनों पर निगरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों के कारण पाकिस्तान पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है. अमेरिका ने 9/11 के बाद पाकिस्तान के साथ आतंकवाद विरोधी अभियानों में सहयोग बढ़ाया, लेकिन इसी दौरान पाकिस्तान की नीतियों और कुछ आतंकी संगठनों को लेकर वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच मतभेद भी सामने आते रहे जिससे जुड़ी कई रिपोर्ट सार्वजनिक हुई और सामने आई. खुफिया एजेंसियों के बीच संबंध आमतौर पर सार्वजनिक नहीं होते, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी इंटेलिजेंस साझेदारी की नींव भरोसा, सूचना साझा करने और रणनीतिक समानता पर टिकी होती है. जब देशों के हित अलग-अलग होते हैं तो सहयोग के बावजूद प्रतिस्पर्धा और अविश्वास बना रह सकता है.
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जन्म से कॉलेज तक बेटियों को आर्थिक सहारा, उत्तराखंड की नंदा गौरा योजना से 50 हजार से अधिक बालिकाओं को लाभ
Nanda Gaura Yojana: आर्थिक तंगी के कारण बेटियों की पढ़ाई न रुके और उन्हें आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें, इसके लिए उत्तराखंड सरकार की नंदा गौरा योजना मददगार बन रही है. इस योजना के तहत पात्र परिवारों की अधिकतम दो बेटियों को जन्म से लेकर 12वीं के बाद उच्च शिक्षा तक कुल 62 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 50 हजार से अधिक बेटियां इस योजना का लाभ उठा चुकी हैं.
महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग की ओर से संचालित इस योजना का मकसद बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देना, उनके प्रति समाज की सोच में बदलाव लाना और बाल विवाह जैसी कुरीतियों को रोकना है. इसके जरिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बेटियों के पालन-पोषण और आगे की पढ़ाई में मदद मिलती है.
दो चरणों में मिलती है आर्थिक मदद
नंदा गौरा योजना के तहत पात्र बालिकाओं को दो चरणों में सहायता दी जाती है. पहले चरण में बेटी के जन्म पर 11 हजार रुपये दिए जाते हैं। इसका उद्देश्य परिवार को नवजात के पोषण और देखभाल में आर्थिक मदद देना है. दूसरे चरण में 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद स्नातक या मान्यता प्राप्त डिप्लोमा पाठ्यक्रम में दाखिला लेने वाली पात्र छात्रा को 51 हजार रुपये दिए जाते हैं. इसके लिए छात्रा का अविवाहित होना भी जरूरी है. इस तरह दोनों चरणों को मिलाकर कुल 62 हजार रुपये की सहायता मिलती है. राशि सीधे बैंक खाते में भेजी जाती है, ताकि लाभार्थियों तक पैसा पहुंचने में पारदर्शिता बनी रहे.
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पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहन
कई परिवारों में आर्थिक परेशानी के कारण बेटियों की पढ़ाई 12वीं के बाद रुक जाती है. उच्च शिक्षा के लिए मिलने वाली सहायता ऐसे परिवारों का खर्च कम करने में मदद कर सकती है. इससे छात्राओं को कॉलेज या तकनीकी संस्थानों में दाखिला लेने और अपनी पढ़ाई आगे जारी रखने के लिए प्रोत्साहन मिलता है.
योजना की एक खास शर्त यह भी है कि दूसरी किस्त के लिए छात्रा का अविवाहित होना जरूरी है. इसके साथ उच्च शिक्षा में प्रवेश की शर्त कम उम्र में शादी के बजाय पढ़ाई जारी रखने को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जुड़ी है.
पुरानी योजनाओं को मिलाकर शुरू की गई पहल
नंदा गौरा योजना की शुरुआत नंदा देवी कन्या धन योजना और गौरा देवी कन्या धन योजना को मिलाकर की गई थी. इसका उद्देश्य बेटियों के जन्म से लेकर उनकी उच्च शिक्षा तक आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है. सरकार के अनुसार, अब तक 50 हजार से अधिक बालिकाओं को इसका लाभ मिल चुका है. वर्ष 2026 में भी पात्र नवजात बालिकाओं और छात्राओं के परिवारों ने ऑनलाइन माध्यम से योजना के लिए आवेदन किया है.
बेटियों को आगे बढ़ाने पर सरकार का जोर
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि राज्य सरकार बेटियों के उज्ज्वल भविष्य और सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है. नंदा गौरा योजना के माध्यम से जन्म से लेकर उच्च शिक्षा तक आर्थिक सहायता दी जा रही है, ताकि बेटियां आत्मनिर्भर बन सकें. सरकार का लक्ष्य है कि प्रदेश की हर बेटी को शिक्षा, सम्मान और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें.
कुल मिलाकर, नंदा गौरा योजना आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बेटियों की शिक्षा में सहयोग देने की एक अहम पहल है. हालांकि, लिंगानुपात में सुधार और बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याओं पर इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन करने के लिए अलग से प्रमाणित आंकड़ों की जरूरत होगी.
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