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पीएम मोदी भारत में जिन नीतियों को प्रमोट कर रहे वे भारतीयों के लिए फायदेमंद हैं: इजरायली राजदूत

नई दिल्ली, 13 फरवरी (आईएएनएस)। इजरायल और हमास के बीच ट्रंप के 20 सूत्रीय समझौते के तहत दूसरे चरण की प्रक्रिया जारी है। ट्रंप की अध्यक्षता में इस बोर्ड में कई देश शामिल हो चुके हैं, वहीं कई देश अब भी इसमें शामिल होने के फैसले पर विचार कर रहे हैं। भारत उनमें से एक है।

इस बीच भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने आईएएनएस से खास बातचीत में बताया कि ट्रंप का 20 सूत्रीय संघर्ष विराम समझौता गाजा में कितना असरदार है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो वहां कैसे हालात होंगे। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक स्तर पर पीएम मोदी के नेतृत्व और प्रभाव को लेकर भी बातें की।

गाजा में संघर्ष विराम कितना असरदार है? इसपर इजरायली राजदूत रूवेन अजार ने आईएएनएस से कहा, गाजा के लिए 20-सूत्रीय ट्रंप प्लान, मुझे लगता है कि इस समय हमारे पास गाजा में बाकी चुनौतियों को डिप्लोमैटिक तरीके से हल करने का सबसे अच्छा मौका है। जब मिलिट्री की बात आती है तो इजरायल ने काफी अच्छा काम किया है और हम हमास की ज्यादातर मिलिट्री मशीन को खत्म करने में कामयाब रहे हैं। हमने गाजा के आधे से ज्यादा इलाके पर कब्जा कर लिया है और इस 20-पॉइंट प्लान को अपनाकर, हमास डीमिलिटराइज करने के लिए तैयार है।

उन्होंने आगे कहा, हम चाहते हैं कि वे डिप्लोमैटिक तरीकों से डीमिलिटराइज करें। उन्हें यही करना है। बदकिस्मती से, अब वे इससे पीछे हट रहे हैं, लेकिन हमें भरोसा है कि अमेरिका और बोर्ड ऑफ पीस के देश हमास पर डीमिलिटराइज करने के लिए दबाव डालेंगे ताकि हम गाजा पट्टी के पुर्ननिर्माण में लग सकें, क्योंकि जब तक आतंकवादी संगठन उस जगह पर कब्जा बनाए रखेंगे और इलाके में स्थिरता के लिए खतरा बने रहेंगे, तब तक कोई भी गाजा पट्टी में निवेश करने के लिए राजी नहीं होगा।

समझौते के हिसाब से हमास के हथियार डालने की शर्तों को लेकर रूवेन अजार ने कहा, हम डिप्लोमेसी को एक मौका देना चाहते हैं। हमारा मानना ​​है कि हमास पर हथियार छोड़ने के लिए दबाव डालना न सिर्फ सही है, बल्कि यह एक अच्छा विकल्प भी है क्योंकि अगर यह फेल हो जाता है तो हमें वापस मिलिट्री सॉल्यूशन का सहारा लेना होगा, जिससे हम बचना चाहते हैं।

हमास के गुर्गों को मार गिराने के पीछे इजरायल के कारणों को लेकर भारत में इजरायली राजदूत ने कहा, बदकिस्मती से, समय-समय पर हमास येलो लाइन में घुसकर, हमारी सेना को कमजोर करने और उन पर हमला करके या अपनी क्षमताओं को फिर से बनाने की कोशिश करके सीजफायर तोड़ता रहता है और इजरायल सीजफायर की उस शर्त पर टिका हुआ है जो इस तरह की गतिविधि की इजाजत नहीं देती। इसलिए, जब हम ऐसी गतिविधियां देखते हैं, तो हम तुरंत कार्रवाई करते हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से तनाव जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार ईरान को हमले की धमकी दे चुके हैं। वहीं ईरान ने भी तगड़ा जवाब देने का ऐलान किया। अमेरिकी हमले को लेकर ईरान में हालात पर रूवेन अजार ने कहा, हमें अभी नहीं पता कि यह हमला होगा या नहीं। मुझे लगता है कि डिप्लोमेसी के जरिए बाकी चुनौतियों को सुलझाने की सच्ची कोशिश हो रही है। इजरायल ने साफ कहा है कि हम उन सभी क्षमताओं को खत्म करने की मांग करते हैं जो ईरान ने इजरायल को खत्म करने के लिए बनाई हैं। उन्होंने ऐसा करने की कसम खाई है।

इजरायली राजदूत ने कहा कि उस प्लान को पूरा करने के लिए ईरान ने जो भी तरीके बनाए हैं, उन्हें खत्म करना होगा, यानी मुख्य रूप से उनका मिलिट्री न्यूक्लियर प्रोग्राम, बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम, और उनके प्रॉक्सी, आतंकवादी संगठनों को उनका समर्थन जो मिडिल ईस्ट के अलग-अलग हिस्सों से लगातार इजरायल पर हमला कर रहे हैं।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर उन्होंने कहा कि यह एक बहुत जरूरी डेवलपमेंट है, क्योंकि भारत जितना ज्यादा खुलेगा, आर्थिक सहयोग के उतने ही ज्यादा मौके मिलेंगे। इजरायल भी अमेरिकी बाजार से बहुत जुड़ा हुआ है। हमें अपने विदेशी निवेश का लगभग 80 फीसदी अमेरिका से मिलता है और इजरायल अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा इनोवेशन हब है। यही वजह है कि जब सिस्टम खुलता है, तो यह इजरायली, भारतीय और अमेरिकी कंपनियों के लिए एक साथ काम करने के ज्यादा मौके बनाता है।

वैश्विक स्तर पर पीएम मोदी के नेतृत्व और प्रभाव को लेकर इजरायली राजदूत ने कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में जिन नीतियों को प्रमोट कर रहे हैं, वे भारतीय लोगों के लिए बहुत फायदेमंद रही हैं। सच तो यह है कि करोड़ों लोग गरीबी से बाहर आ गए हैं। सच तो यह है कि यह देश बहुत तेजी से बन रहा है। सच तो यह है कि आपके पास सस्टेनेबल ग्रोथ है जो नए उद्योग बना रही है, इनोवेशन कर रही है, एकेडमिक रिसर्च कर रही है। यह हमारे लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि हम लोकतंत्र, मुक्त व्यापार, बोलने की आजादी के मूल्यों को साझा करते हैं और जितना भारत मजबूत होगा, इजरायल भी उतना ही मजबूत होगा।

--आईएएनएस

केके/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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बढ़ता स्क्रीन टाइम बन रहा बच्चों की भाषा का दुश्मन! नई रिसर्च में हुआ खुलासा

डिजिटल वर्ल्ड में जहां मोबाइल, टैबलेट और टीवी बच्चों की रोज़मर्रा की जिंदगी का आम हिस्सा बन चुके हैं, वहीं नई रिसर्च ने एक गंभीर चिंता उजागर कर दी है. अध्ययन में पाया गया हैं कि बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों की शब्दावली यानी Vocabulary और भाषा के विकास पर नकारात्मक असर डाल रहा है. खासकर कम उम्र के बच्चों में यह प्रभाव ज्यादा देखने को मिल रहा है.

ब्रिटेन की मशहूर Lexicographer ने बताई वजह

ब्रिटेन की प्रसिद्ध लेक्सिकोग्राफर और टीवी शो काउंटडाउन की स्टार सुसी डेंट ने चेतावनी दी है कि बच्चों की शब्दावली लगातार खराब हो रही है. उनका कहना है कि बच्चे पढ़ने और बातचीत की बजाय स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं, जिससे उनकी भाषा पर असर पड़ रहा है. डेंट के मुताबिक 'शब्दावली का अंतर बढ़ता जा रहा है और इसका सीधा प्रभाव बच्चों की पढ़ाई और उनकी सीखने की क्षमता पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है.

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ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में खुलासा

Oxford University Press की 2023 की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि हर पांच में से दो छात्र शब्दावली के विकास में पिछड़ रह हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इसका बड़ा कारण पढ़ने की आदत में गिरावट और डिजिटल कंटेंट पर बढ़ती हुई निर्भरता है. जबसे बच्चे किताबों से दूर हुए हैं, उनका नए शब्दों से परिचय भी कम से कम हो गया है. 

आंकड़ों में क्या मिला?

आंकड़ों के मुताबिक, 2 साल की उम्र तक लगभग 98% बच्चे रोजाना किसी न किसी स्क्रीन के संपर्क में आ जाते हैं. जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम सबसे ज्यादा यानी करीब पांच घंटे प्रतिदिन था, वे उन बच्चों की तुलना में काफी कम शब्द बोल पाते है, जो औसतन 44 मिनट तक ही स्क्रीन प्रतिदिन देखते है. यह अंतर भाषा विकास के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बताया जा रहा है.

बच्चों की शिक्षा के साथ उनकी आदतों पर ध्यान देना जरूरी

ब्रिजेट फिलिप्सन, जो ब्रिटेन में शिक्षा मंत्रालय की सचिव रह चुकी है. उन्होंने भी माना है कि माता-पिता, शिक्षक और नर्सरी कर्मचारी ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती देख रहे हैं जिन्हें बातचीत करने, ध्यान केंद्रित करने और सीखने में कठिनाई हो रही है. सरकार जल्द ही पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन उपयोग को लेकर दिशानिर्देश जारी करने वाली है.

क्या स्क्रीन को पूरी तरह बैन करना सही होगा?

हालांकि, विशेषज्ञ स्क्रीन को पूरी तरह खारिज नहीं करते है. उनका मानना है कि यदि तकनीक का इस्तेमाल सही तरीके से किया जाए, जैसे ई-बुक्स पढ़ना, शैक्षिक खेल खेलना या माता-पिता के साथ इंटरैक्टिव कंटेंट देखना, तो यह बच्चों की शब्दावली को बढ़ाने में सहायक भी हो सकता है.

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