गलत खान-पान बिगाड़ रहा है सेहत? पवनमुक्तासन से पाएं तुरंत राहत
नई दिल्ली, 15 अक्टूबर (आईएएनएस)। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में गलत खान-पान और घंटों एक जगह बैठकर काम करने की वजह से पेट संबंधी समस्या आम हो गई है। इन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए पवनमुक्तासन बेहद सरल और प्रभावी आसन बताया गया है। यह आसन शरीर में मौजूद दूषित वायु को बाहर निकालकर पेट को साफ रखता है और मन को शांति प्रदान करता है।
पवनमुक्तासन संस्कृत के तीन शब्दों से मिलकर बना है... पवन यानी हवा, मुक्त यानी छोड़ना, और आसन यानी योग की मुद्रा। इसका मतलब यह ऐसा योगासन है जो शरीर से गैस या अपच को बाहर निकालने में मदद करता है। यही कारण है कि इसे अंग्रेजी में वाइंड रिलिजिंग पोज भी कहा जाता है।
पवनमुक्तासन उन योगासनों में एक आसन है, जिसे वायु मुक्ति आसन या गैस रिलीज पोज भी कहा जाता है। यह आसन पेट में जमा गैस को बाहर निकालने और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मददगार साबित होता है।
भारत सरकार के आयुष मंत्रालय अनुसार, पवनमुक्तासन वात से भी राहत दिलाता है और पेट को बढ़ने से रोकता है। इससे पेट पर आंतरिक दबाव पड़ता है जिससे आसन पाचन क्रिया में सहायक होता है। पाचन क्रिया के अलावा यह पेल्विक रीजन की मांसपेशियों, लिगामेंट्स और टेंडन्स के लिए बहुत लाभदायक होता है।
इसके साथ ही यह आसन शरीर के कोर मसल्स यानी पेट, कमर और पेल्विक हिस्से की मांसपेशियों को टोन करता है। इन हिस्सों की मांसपेशियां जब मजबूत होती हैं, तो शरीर का संतुलन बेहतर होता है और थकावट कम लगती है। यह खासकर महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद है क्योंकि यह आसन पेल्विक हिस्से की ताकत बढ़ाकर मासिक धर्म से जुड़ी परेशानियों में भी मदद कर सकता है।
हालांकि, इस आसन को करने से पहले कुछ सावधानियां भी बतरनी पड़ती है जैसे कि पेट, कमर या रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट या सर्जरी हुई है तो इस आसन को करने से बचें। गर्भवती महिलाओं को यह आसन नहीं करना चाहिए। उच्च रक्तचाप या हर्निया के रोगियों को चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।
--आईएएनएस
एनएस/पीएम
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Shardiya Navratri 2026 Day 5: कार्तिकेय भगवान माता स्कंद की आज हो रही पूजा, पढ़ें पौराणिक कहानी
Shardiya Navratri 2026 Day 5: आज यानी 15 अक्टूबर 2026 को नवरात्रि का पांचवा दिन है. इस दिन मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जा रही है. स्कंद स्वयं भगवान कार्तिकेय है, जिनकी माता मां पार्वती है. मां पार्वती के दुर्गा स्वरूपों में से पांचवा स्वरूप माता स्कंदमाता का ही है. मां के इस स्वरूप को ममता, प्रेम, करूणा और संतान की रक्षा का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सच्चे मन से स्कंदमाता का पूजन करने से भक्तों को सुख-समृद्धि और सद्बुद्धि प्राप्त होती है. उनके आशीर्वाद से परिवार का कल्याण होता है. मान्यता है कि उनकी पूजा करते समय हमें स्कंदमाता देवी की कथा भी जरूर पढ़नी चाहिए. पढ़ें स्कंदमाता की पौराणिक कथा.
पढ़ें स्कंदमाता की पौराणिक कथा (Read Skandamata Ki Katha in Hindi)
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में तारकासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर हुआ करता था. वह अत्यंत बलवान था और अपनी शक्ति के बल पर तीनों लोकों में आतंक मचाता था. उसने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने के लिए कहा. तारकासुर ने भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु सिर्फ भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकती है. उसे विश्वास था कि भगवान शिव तपस्या में लीन रहते हैं और उनके विवाह तथा संतान होने की संभावना बहुत कम है. इसी विश्वास के कारण उसे लगा कि वह हमेशा के लिए अमर हो गया है.
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वरदान प्राप्त करने के बाद तारकासुर का अहंकार बढ़ गया है. वह देवताओं, ऋषि-मुनियों और निर्दोष प्राणियों को परेशान करने लगा. उसने स्वर्ग पर अधिकार जमाने का प्रयास किया और देवताओं को उनके स्थान से हटाने लगा. उसके अत्याचारों से सभी देवता दुखी हो गए. अंततः सभी देवता भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे तारकासुर के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करने लगे.
तब देवताओं को बताया गया कि तारकासुर का अंत सिर्फ भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव है. लेकिन उस समय भगवान शिव संसार से विरक्त होकर गहन तपस्या में लीन थे. ऐसे में उनके पुत्र का जन्म होना आसान नहीं था.
माता पार्वती की तपस्या और भगवान शिव से विवाह
उसी समय हिमालय की पुत्री माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं. उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या आरंभ की. माता पार्वती ने उसमें भी अनेकों कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उनका विश्वास और संकल्प कभी कमजोर नहीं हुआ. माता पार्वती की अटूट श्रद्धा, भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया. इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ. देवताओं को भी आशा की किरण दिखाई देने लगी, क्योंकि अब तारकासुर के अंत का मार्ग खुल चुका था. कुछ समय बाद भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र का जन्म हुआ. इस दिव्य बालक का नाम स्कंद रखा गया, जिन्हें भगवान कार्तिकेय और कुमार के नाम से भी जाना जाता है.
भगवान कार्तिकेय ने किया तारकासुर का वध
भगवान कार्तिकेय बड़े होकर अत्यंत पराक्रमी और तेजस्वी बने. उन्हें देवताओं का सेनापति नियुक्त किया गया. उन्होंने अपनी शक्ति, साहस और युद्ध कौशल से देवताओं का नेतृत्व किया और तारकासुर के विरुद्ध युद्ध किया. युद्ध में भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई. तीनों लोकों में फिर से शांति स्थापित हुई. देवताओं ने भगवान कार्तिकेय की जय-जयकार की और भगवान शिव तथा माता पार्वती के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की. इस प्रकार माता पार्वती के पुत्र भगवान स्कंद ने अधर्म का अंत करके धर्म की स्थापना की. माता पार्वती जब अपने पुत्र स्कंद को गोद में धारण करने वाले दिव्य स्वरूप में पूजी जाती हैं, तब उन्हें मां स्कंदमाता कहा जाता है.
मां स्कंदमाता की कथा से मिलने वाली सीख
मां स्कंदमाता की कथा हमें सिखाती है कि अहंकार और अत्याचार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंत में धर्म और सत्य की विजय होती है. माता का ममतामय स्वरूप यह भी बताता है कि प्रेम और करुणा के साथ साहस तथा जिम्मेदारी का होना आवश्यक है.
मां स्कंदमाता के स्वरूप का महत्व
स्कंदमाता मां का स्वरूप अत्यंत शांत, सुंदर और दिव्य माना जाता है. माता की चार भुजाएं होती हैं. उनके दो हाथों में कमल के फूल सुशोभित रहते हैं. एक हाथ से वे भक्तों को आशीर्वाद देती हैं और एक हाथ में अपने पुत्र भगवान कार्तिकेय को गोद में धारण करके बैठी हैं. उनका वाहन सिंह है, जो साहस, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है. मां को कमल के आसन पर विराजमान भी दिखाया जाता है. इसी कारण उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है. उनका स्वरूप यह संदेश देता है कि सच्ची शक्ति केवल पराक्रम में नहीं, बल्कि प्रेम, दया और करुणा में भी निहित होती है.
मां स्कंदमाता अपने भक्तों को यह सीख देती हैं कि जिस प्रकार एक मां अपने बच्चे की रक्षा के लिए हर परिस्थिति का सामना करती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने परिवार और कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदार रहना चाहिए.
मां स्कंदमाता की पूजा विधि और भोग
आज यानी नवरात्रि के पांचवें दिन प्रात:काल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके मां दुर्गा या मां स्कंदमाता की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं. माता को कुमकुम, अक्षत और फूल अर्पित करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक मां की कथा सुनें या पढ़ें और परिवार की सुख-शांति तथा संतान के कल्याण की प्रार्थना करें.
भक्त इस मंत्र का 11, 21 या 108 बार जाप कर सकते हैं. माता को केला, अन्य फलों और दूध से बनी मिठाई का भोग लगाया जाता है. पूजा के अंत में मां की आरती करें और सभी के सुखी जीवन की कामना करें. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता की आराधना करने से भक्तों को मानसिक शांति, सकारात्मकता और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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