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भारत-एसएसीयू व्यापार समझौते से आर्थिक संबंधों को मिलेगा बढ़ावा: भारत में दक्षिण अफ्रीका के उच्चायुक्त

नई दिल्ली, 11 फरवरी (आईएएनएस)। भारत में दक्षिण अफ्रीका के उच्चायुक्त फ्रोफेसर अनिल सूकलाल ने बुधवार को कहा कि प्रस्तावित भारत-एसएसीयू (दक्षिणी अफ्रीकी की सीमा शुल्क संघ) फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट से दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापार और निवेश में काफी बढ़त होगी।

समाचार एजेंसी आईएएनएस के साथ एक विशेष साक्षात्कार में उच्चायुक्त ने कहा कि यह भारत और अफ्रीका के किसी क्षेत्रीय गुट के बीच पहला मुक्त व्यापार समझौता होगा। एसएसीयू में पांच सदस्य देश -बोत्सवाना, इस्वातिनी, लेसोथो, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं और दक्षिण अफ्रीका व्यापार वार्ता में उस सीमा शुल्क संघ के हिस्से के रूप में भाग लेता है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष चर्चा में तेजी लाने पर सहमत हुए हैं।

उन्होंने आगे कहा कि भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच व्यापार और निवेश प्रवाह बहुत महत्वपूर्ण रहा है। अफ्रीकी महाद्वीप में दक्षिण अफ्रीका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और भारत वैश्विक स्तर पर हमारा चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। हमारा दोतरफा व्यापार लगभग 20 अरब डॉलर है, जो अफ्रीका के साथ भारत के कुल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत है।

सूकलाल ने यह भी बताया कि दक्षिण अफ्रीका के व्यापार, उद्योग और प्रतिस्पर्धा मंत्री, पार्क्स ताऊ ने हाल ही में सीआईआई भारत-अफ्रीका कॉन्क्लेव में भाग लिया, जहां दक्षिण अफ्रीका अतिथि देश था। उस अवसर पर, मंत्री ताऊ ने दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को गहरा करने की प्रमुख पहलों पर चर्चा करने के लिए वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के साथ द्विपक्षीय बैठक की।

उच्चायुक्त ने यह भी कहा कि भारत ग्लोबल साउथ की एक अग्रणी आवाज रहा है। 2023 में भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाई कि अफ्रीकी संघ जी20 का पूर्ण सदस्य बन जाए। इसकी पूरे अफ्रीका में व्यापक रूप से सराहना की गई।

भारत ने वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ समिट की भी शुरुआत की, जिसने विकासशील देशों की चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि भारत न केवल एक अग्रणी आवाज बना हुआ है, बल्कि एक अधिक समावेशी वैश्विक प्रणाली को आकार देने में अग्रणी सर्जक भी बना हुआ है।

सूकलाल ने आगे कहा कि भारत-ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका (आईबीएसए) सहयोग ने वैश्विक शासन के मुद्दों को संबोधित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हाल ही में, दक्षिण अफ्रीका में जी20 शिखर सम्मेलन के इतर, एक आईबीएसए शिखर सम्मेलन हुआ था जहां ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, प्रधानमंत्री मोदी और दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा करने के लिए मुलाकात की।

दिलचस्प बात यह है कि सहयोग के नए क्षेत्रों में से एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में सहयोग है।

आईबीएसए ने ग्लोबल साउथ के सामने आने वाली विकासात्मक चुनौतियों का समाधान करते हुए डब्ल्यूटीओ, ब्रेटन वुड्स संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली सहित वैश्विक संस्थानों के सुधार की वकालत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

दक्षिण अफ्रीका में जी20 बैठक के अमेरिकी बहिष्कार के बारे में बात करते हुए, उच्चायुक्त ने कहा, हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि संयुक्त राज्य अमेरिका अनुपस्थित था, जोहान्सबर्ग में शिखर सम्मेलन बहुत सफल रहा। अन्य सभी सदस्य देशों ने भाग लिया, और हमने प्रमुख वैश्विक चुनौतियों को संबोधित करते हुए एक व्यापक घोषणा को अपनाया।

उन्होंने कहा, इससे पता चला कि जी20 एक सामूहिक मंच है। कोई भी देश इसे पंगु नहीं बना सकता। दूर रहकर कोई रचनात्मक परिणाम हासिल नहीं कर सकता। इसके विपरीत, वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोग ही एकमात्र प्रभावी तरीका है।

अमेरिकी टैरिफ दबावों के खिलाफ नई दिल्ली के रुख पर उन्होंने कहा कि भारत ने टैरिफ के हथियारीकरण और अनुचित एकतरफा उपायों को लागू करने के संबंध में एक सैद्धांतिक रुख अपनाया है।

भारत, जो अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, ने प्रदर्शित किया है कि कोई भी बाहरी दबाव किसी देश को अपनी संप्रभुता से समझौता करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि भारत के दृष्टिकोण ने समान दबावों का सामना कर रहे कई विकासशील देशों को ताकत और आत्मविश्वास दिया है।

सुकलाल ने यह भी कहा कि भारत में आगामी एआई शिखर सम्मेलन एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर वैश्विक एआई चर्चा शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एआई तेजी से विकसित हो रहा है और विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए अपार अवसर प्रस्तुत करता है। साथ ही, यह ऐसी चुनौतियाँ लाता है जिनके लिए वैश्विक सहयोग की आवश्यकता होती है।

भारत में एआई शिखर सम्मेलन की मेजबानी यह दर्शाती है कि ग्लोबल साउथ उभरती प्रौद्योगिकियों में नेतृत्व कर सकता है। उन्होंने कहा कि इस शिखर सम्मेलन से संभवतः महत्वपूर्ण परिणाम सामने आएंगे और एआई प्रशासन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत होगा।

--आईएएनएस

एबीएस/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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इटली और पोलैंड ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में नहीं होंगे शामिल

नई दिल्ली, 11 फरवरी (आईएएनएस)। इटली और पोलैंड ने भी डोनाल्ड ट्रंप के सुझाए बोर्ड ऑफ पीस से किनारा करने का फैसला लिया है। वारसॉ और रोम ने बुधवार को इस पर अपना रुख साफ किया। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने मौजूदा हालात का हवाला दिया तो वहीं इटली ने संवैधानिक चुनौतियों को इनकार की वजह बताया।

विभिन्न मीडिया आउटलेट्स ने इसकी पुष्टि की है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, पोलिश प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने सरकारी बैठक में कहा कि पोलैंड मौजूदा हालात में अमेरिका के नेतृत्व वाले बोर्ड ऑफ पीस में शामिल नहीं होगा, लेकिन इसका विश्लेषण करता रहेगा।

टस्क ने कहा, बोर्ड के आकार को लेकर कुछ राष्ट्रीय शंकाओं को ध्यान में रखते हुए पोलैंड बोर्ड ऑफ पीस में शामिल नहीं होगा, लेकिन हम इसका एनालिसिस करेंगे।

टस्क बुधवार को नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक में अपने विरोधी करोल नॉवरोकी से मिलने वाले थे, जहां बोर्ड ऑफ पीस एजेंडा में था।

वहीं, इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने संविधान का हवाला दिया, जिसके मुताबिक देश दूसरे देशों के बराबर शर्तों पर ही अंतर्राष्ट्रीय संस्था में शामिल हो सकता है। रोम का कहना है कि ये शर्त बोर्ड के मौजूदा कानून में फिट नहीं बैठतीं क्योंकि यह ट्रंप को बहुत ज्यादा एग्जीक्यूटिव पावर (कार्यकारिणी शक्ति) देता है।

उन्होंने स्काई टीजी24 न्यूज चैनल से कहा, हम बोर्ड ऑफ पीस में शामिल नहीं हो सकते क्योंकि इटली के सामने संवैधानिक चुनौती है।

इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने पिछले महीने ही कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से इटली को शामिल होने लायक बनाने के लिए बोर्ड ऑफ पीस की शर्तों में बदलाव करने का आग्रह किया था।

डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता वाला बोर्ड ऑफ पीस शुरुआत में एक सीमित उद्देश्य के लिए गढ़ा गया था। इसे पहले विश्व नेताओं के एक छोटे समूह के रूप में तैयार किया गया था। इसका मुख्य मकसद गाजा युद्धविराम योजना की निगरानी करना था। लेकिन फिर बाद में ट्रंप प्रशासन की महत्वाकांक्षाएं इस बोर्ड को लेकर बढ़ गईं। ट्रंप ने इसका दायरा बढ़ाते हुए दर्जनों देशों को न्योता भेजा। संकेत दिया गया है कि भविष्य में यह बोर्ड केवल गाजा तक सीमित न रहकर एक वैश्विक संघर्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा।

पाकिस्तान, मिस्र, और तुर्की समेत कई देशों ने न्योता स्वीकारा है, तो फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन, और यूके जैसे देशों ने बोर्ड में शामिल होने से इनकार कर दिया।

--आईएएनएस

केआर/

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