पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब पर विवाद: पेंग्विन ने जारी किया आधिकारिक बयान, प्रकाशन को लेकर अभी भी सस्पेंस बरकरार
नई दिल्ली : भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' पिछले काफी समय से विवादों और सुर्खियों में है। किताब के प्रकाशन में हो रही देरी और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच, प्रकाशक 'पेंग्विन रैंडम हाउस' ने एक आधिकारिक बयान साझा किया है।
जनरल नरवणे ने खुद इस बयान को साझा करते हुए किताब की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी दी है।
पेंग्विन का आधिकारिक बयान और 'स्टेटस'
प्रकाशक पेंग्विन ने स्पष्ट किया है कि किताब फिलहाल 'अनपब्लिश्ड' है। जनरल नरवणे ने सोशल मीडिया पर इस स्पष्टीकरण को साझा किया ताकि उन अटकलों पर विराम लगाया जा सके जिनमें दावा किया जा रहा था कि किताब को वापस ले लिया गया है या इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है।
बयान के अनुसार, किताब प्रकाशन की प्रक्रिया में है, लेकिन कुछ आवश्यक औपचारिकताओं और सुरक्षा समीक्षाओं के कारण इसे अभी तक बाजार में नहीं उतारा गया है।
क्यों हो रहा है किताब पर विवाद?
इस किताब को लेकर मुख्य विवाद तब शुरू हुआ जब इसके कुछ अंश मीडिया में लीक हो गए। किताब में जनरल नरवणे ने अग्निपथ योजना की घोषणा के समय सेना की प्रतिक्रिया और पूर्वी लद्दाख (LAC) में चीन के साथ हुए गतिरोध के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया है।
सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील जानकारियों का हवाला देते हुए किताब के कुछ हिस्सों पर समीक्षा और आपत्ति जताई थी।
सरकार और रक्षा मंत्रालय की समीक्षा
नियमानुसार, किसी भी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी को सेवा के बाद अपनी यादें साझा करने से पहले सरकार से अनुमति लेनी होती है, विशेषकर तब जब उसमें रणनीतिक या गोपनीय बातें शामिल हों।
जनरल नरवणे की किताब को सुरक्षा एजेंसियों द्वारा 'क्लियरेंस' मिलना अभी बाकी है। यही कारण है कि पेंग्विन को इसकी रिलीज की तारीख बार-बार आगे बढ़ानी पड़ी है।
जनरल नरवणे का रुख
जनरल नरवणे ने हमेशा यह बनाए रखा है कि उन्होंने किताब में केवल वही बातें लिखी हैं जो एक सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हो सकती हैं या जो देश की सुरक्षा को खतरे में नहीं डालतीं।
उन्होंने पेंग्विन के बयान को साझा करके यह संकेत दिया है कि वे अभी भी इसके प्रकाशन की उम्मीद कर रहे हैं और कानूनी व आधिकारिक प्रक्रियाओं का पालन कर रहे हैं।
Big Debate: लोकसभा अध्यक्ष पर अविश्वास | क्या सदन की निष्पक्षता खतरे में? | Video
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक असाधारण और गंभीर घटनाक्रम सामने आया है। विपक्ष के 118 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया है। 75 वर्षों में यह केवल चौथी बार है जब सदन के सर्वोच्च पद पर बैठे अध्यक्ष की निष्पक्षता और कार्यशैली पर औपचारिक चुनौती दी गई है।
विवाद के बीच नैतिकता का हवाला देते हुए ओम बिरला ने फैसला आने तक सदन की कार्यवाही से खुद को अलग करने का निर्णय लिया है। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष के प्रति झुकाव के कारण वह संतुलन टूट गया है, जिसकी अपेक्षा एक अध्यक्ष- यानी सदन के ‘पंच’- से की जाती है।
इस अविश्वास प्रस्ताव की पृष्ठभूमि में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को सदन में बोलने से रोके जाने, 8 सांसदों के निलंबन और विपक्षी आवाज को दबाने के आरोप हैं। विपक्ष का कहना है कि जब रक्षक ही निष्पक्ष न रहे, तो लोकतांत्रिक मर्यादा खतरे में पड़ जाती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है-
क्या लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका पर अविश्वास, संसद की आत्मा पर उठता प्रश्न है?
सवाल एक नहीं बहुतेरे हैं, जिन पर हरिभूमि और INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने विशेष “चर्चा” की।
इस खास पेशकश में शामिल हुए- राजनीति और पत्रकारिता से जुड़े दिग्गज
- सुनीता दुग्गल - पूर्व सांसद, भाजपा
- श्रवण गर्ग - वरिष्ठ पत्रकार
- सुमित मेहरोत्रा - प्रवक्ता, TMC
- डॉ. अजय उपाध्याय - प्रवक्ता, AICC
किसने क्या कहा? जानने के लिए देखें पूरी चर्चा
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