Allahabad High Court ने विद्यालयों में छात्रों की सुरक्षा पर जताई चिंता, मांगा जवाब
लखनऊ, तीन अगस्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने प्रदेश के विद्यालयों में विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि जर्जर भवनों के साथ-साथ गैर-संरचनात्मक खतरे भी बच्चों की सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम हैं। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की पीठ गोमती रिवर बैंक रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि प्रदेश के करीब 4,000 विद्यालयों के ऊपर से हाईटेंशन बिजली की लाइनें गुजर रही हैं, जिससे विद्यार्थियों की सुरक्षा पर खतरा बना हुआ है।
अदालत ने इस पर उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) के प्रबंध निदेशक को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। पीठ ने जौनपुर के समरी प्राथमिक विद्यालय की इमारत गिरने तथा लखनऊ में दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग के एक स्कूल में लोहे का गेट गिरने से एक छात्र की मौत की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों को सुरक्षित बनाना समय की आवश्यकता है। अदालत ने स्कूल बसों और वैन से बच्चों के सुरक्षित आवागमन का मुद्दा भी उठाया।
अदालत को बताया गया कि परिवहन विभाग के अनुसार 2,370 स्कूल वाहन चालकों में से 527 की मिशन भरोसा के तहत पुलिस सत्यापन रिपोर्ट प्रतिकूल पाई गई है। अदालत ने कहा कि वाहन चालकों की पृष्ठभूमि का सत्यापन अनिवार्य होना चाहिए और स्कूल प्रबंधन को इस संबंध में पूरी सतर्कता बरतनी होगी। लखनऊ पुलिस ने अदालत को बताया कि विद्यालयों के प्रवेश द्वारों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे।
अदालत ने अगली सुनवाई तक कैमरों की संख्या और अनुमानित लागत का ब्यौरा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। अदालत को बताया गया कि विद्यार्थियों की सुरक्षा संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) अंतिम चरण में है और इसे अगली सुनवाई में अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। पीठ ने उम्मीद जताई कि राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियां बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगी।
Allahabad High Court ने कहा, लाइसेंसी हथियार से हर्ष फायरिंग नहीं की जा सकती
प्रयागराज, तीन अगस्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि लाइसेंसी हथियार का उपयोग विवाह समारोहों या धार्मिक आयोजनों में हर्ष फायरिंग के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि प्रत्येक लाइसेंसधारक का दायित्व है कि वह खरीदे और इस्तेमाल किए गए गोला-बारूद का समुचित रिकॉर्ड रखे। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने अखिलेश कुमार की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
याचिकाकर्ता ने 767 कारतूसों का हिसाब नहीं दे पाने के बाद रद्द किए गए शस्त्र लाइसेंस के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने 29 जुलाई को दिये फैसले में कहा कि शस्त्र लाइसेंस एक विशेषाधिकार है, जो कानून और लाइसेंस की शर्तों के कड़ाई से पालन पर निर्भर करता है। अदालत ने लाइसेंस जारी करने वाले प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी के आदेशों को सही ठहराया।
अदालत ने कहा, ‘‘शस्त्र लाइसेंस एक विशेषाधिकार है और इसे इस विश्वास के साथ जारी किया जाता है कि लाइसेंसधारक इसकी सभी शर्तों का पालन करेगा।’’ मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता को वर्ष 2000 में शस्त्र लाइसेंस जारी किया गया था। वर्ष 2019 में निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने उससे खरीदे और इस्तेमाल किए गए कारतूसों का विवरण मांगा। याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने वर्षों में 857 कारतूस खरीदे थे लेकिन वह केवल 57 कारतूस और 33 खोखे ही प्रस्तुत कर सका।
उसने दावा किया कि शेष 767 कारतूस निशानेबाजी, शादी तथा छठ पूजा और दुर्गा पूजा जैसे धार्मिक आयोजनों में इस्तेमाल किए गए। इस स्पष्टीकरण से असंतुष्ट लाइसेंस प्राधिकारी ने शस्त्र अधिनियम की धारा 17 के तहत उसका लाइसेंस रद्द कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का रुख किया।
याचिकाकर्चा ने दलील दी कि वर्ष 2000 में लाइसेंस जारी होने के समय इस्तेमाल किए गए कारतूसों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना अनिवार्य नहीं था। अदालत ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि शस्त्र अधिनियम के प्रावधान स्पष्ट करते हैं कि नियामकीय शर्तें लाइसेंस का अभिन्न हिस्सा हैं और उनका पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता को लाइसेंसी हथियार का उपयोग हर्ष फायरिंग के लिए करने की अनुमति नहीं थी।
विवाह और धार्मिक आयोजनों में इस प्रकार हथियार का उपयोग कानून के अनुरूप नहीं है।
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