दीपके को डिटेन करने महिला पुलिस अधिकारी ही क्यों पहुंची? इसके पीछे दिल्ली पुलिस की क्या थी रणनीति
मुंबई से दिल्ली पहुंचते ही CJP नेताओं को एयर इंडिया की फ्लाइट में महिला पुलिसकर्मियों ने हिरासत में क्यों लिया? क्या महिला पुलिस पुरुषों को हिरासत में ले सकती है? कानून इस बारे में क्या कहता है? आखिर इस कार्रवाई के लिए दिल्ली पुलिस ने महिला पुलिसकर्मियों को ही क्यों चुना ?
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कभी जनसभा से भीड़ को दूर रखने के लिए कांग्रेस ने उठाया था ऐसा कदम, अगले दिन की हेडलाइन बनी- फिर भी बाबूजी 'बॉबी' से जीत गए!
आज जब भी देश की राजधानी या किसी बड़े शहर में कोई जन-आंदोलन करवट लेता है। चाहे वह नागरिक अधिकारों को लेकर उठा विरोध हो, किसान आंदोलन हो या सीजेपी जैसे मानवाधिकार मंचों से जुड़े प्रदर्शन तो सत्ता का पहला कदम क्या होता है? मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद कर दिए जाते हैं, ट्रेनों के रूट डायवर्ट होते हैं, इंटरनेट की रफ्तार थाम दी जाती है और धारा 144 की दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं। मकसद साफ होता है भीड़ को सड़क तक पहुंचने से रोकना। इसके असर को सीमित कर देना। शनिवार को दिल्ली में चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के दौरान अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, पिनाराई विजयन, नेहा बोरा, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण समेत कई विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया गया। शाम 5:40 बजे तक राजधानी में लगभग 4,000 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका था। जंतर-मंतर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए गए थे और शाम तक कोई भी प्रदर्शनकारी उस जगह तक नहीं पहुँच पाया था। पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने इस हिरासत की निंदा की और चेतावनी दी कि अगर हिरासत में लिए गए लोगों को रविवार तक रिहा नहीं किया गया, तो वे फिर से अनशन करेंगे। CJP और NCP (SP) द्वारा आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेताओं ने राजधानी में की गई सख़्त कार्रवाई के बावजूद विरोध प्रदर्शन जारी रखने का संकल्प लिया।
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सत्ता और जनआक्रोश का यह टकराव कोई नया नहीं है। जब सरकारें साधन रोकती हैं, तो इतिहास अक्सर यह याद दिलाता है कि जनसैलाब साधनों का मोहताज नहीं होता। इसका सबसे दिलचस्प और ऐतिहासिक उदाहरण 1977 का वह वाकया है, जब सत्ता ने रास्ते रोकने के लिए कोई पुलिस लाठी नहीं, बल्कि सिनेमाई आकर्षण का सहारा लिया था। जनता पार्टी के गठन के ठीक 10 दिन बाद बाबू जगजीवन राम ने केंद्र सरकार से इस्तीफा दे दिया। देश में आपातकाल के बाद की सियासी हवा बदल रही थी। बाबूजी ने 6 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित करने का ऐलान किया। उस दौर की कांग्रेस सरकार इस सभा के असर से वाकिफ थी। सभा को बेअसर करने और मैदान को खाली रखने के लिए सरकार ने एक बेहद चालाक रणनीति अपनाई।
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जब बाबूजी बॉबी से जीत गए
जनता पार्टी के गठन के 10 दिन बाद बाबू जगजीवन राम ने भी केंद्र सरकार से इस्तीफा दे दिया। बाबू जगजीवन राम ने दिल्ली में 6 मार्च को विशाल जनसभा को संबोधित करने का ऐलान किया। उनकी जनसभा को कमजोर करने के लिए कांग्रेस ने एक दिलचस्प चाल चली।’ रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि बाबू जगजीवन राम की जनसभा से भीड़ को दूर रखने के लिए कांग्रेस ने ठीक जनसभा के वक्त उस दौर की मशहूर रोमांटिक फिल्म ‘बॉबी’ का दूरदर्शन पर प्रसारण करवाना तय किया। 1977 में देश में सिर्फ दूरदर्शन ही हुआ करता था और उसका नियंत्रण पूरी तरह से सरकार के हाथों में ही था। आम दिनों में यदि बॉबी फिल्म टीवी पर दिखाई जा रही होती तो दिल्ली की लगभग आधी आबादी टीवी स्क्रीनों के इर्द-गिर्द ही सिमटी रहती। लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हुआ। करीब 10 हजार लोगों ने दिल्ली में बाबूजी और जयप्रकाश नारायण को सुना। उस दौर के एक अखबार ने अगले दिन हैडलाइन बनाई कि आज बाबूजी बॉबी से जीत गए!
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हालांकि यह सच है कि आज का दौर 1977 का आपातकाल नहीं है, न ही आज उस कद के नेता मंचों पर खड़े हैं। लेकिन 1977 की वह शाम और आज के बंद मेट्रो स्टेशन एक बात समान रूप से साबित करते हैं। सत्ता के पास रोकने के तरीके हमेशा तकनीकी और प्रशासनिक होते हैं चाहे वह 'बॉबी' का प्रसारण हो या मेट्रो के बंद फाटक। अब मेट्रो स्टेशन सुरक्षा कारणों से बंद कर दिए जाते हैं, बसें सीमा पर रोक दी जाती हैं और इंटरनेट बंद कर दिया जाता है। लेकिन 1977 की वह शाम आज भी यही सिखाती है कि जब जनता के भीतर अपनी बात कहने और सुनने की बेचैनी हद से बढ़ जाती है, तो न टीवी स्क्रीन पर चमकती 'बॉबी' उसे बांध पाती है, और न ही बंद पड़े मेट्रो स्टेशनों के ताले उसे रोक पाते हैं।
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