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भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 14.361 अरब डॉलर बढ़कर ऑल-टाइम हाई 723.774 अरब डॉलर पर पहुंचा

मुंबई, 6 फरवरी (आईएएनएस)। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 30 जनवरी को समाप्त हुए हफ्ते में 14.361 अरब डॉलर बढ़कर ऑल-टाइम हाई 723.774 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। यह जानकारी शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा जारी किए गए डेटा में दी गई।

इससे पहले के हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार में 8.053 अरब डॉलर की बढ़त देखी गई थी। विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी की वजह सोने की कीमतों में तेजी आना है।

आरबीआई के डेटा के मुताबिक, 30 जनवरी को समाप्त हुए हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार के अहम घटक गोल्ड रिजर्व की वैल्यू 14.595 अरब डॉलर बढ़कर 137.683 अरब डॉलर हो गई है।

विदेशी मुद्रा भंडार के सबसे बड़े घटक फॉरेन करेंसी एसेट्स (एफसीए) की वैल्यू 49.3 करोड़ डॉलर कम होकर 562.392 अरब डॉलर हो गई है। एफसीए में डॉलर के साथ दुनिया की कई अहम मुद्राएं जैसे येन, यूरो और पाउंड होते हैं, जिनकी वैल्यू को डॉलर में दिखाया जाता है।

आरबीआई के अनुसार, 30 जनवरी को समाप्त हुए हफ्ते में एसडीआर की वैल्यू 21.6 करोड़ डॉलर बढ़कर 18.953 अरब डॉलर हो गई है। वहीं, भारत की आरबीआई में रिजर्व पॉजिशन 4.4 करोड़ डॉलर बढ़कर 4.746 अरब डॉलर हो गई है।

किसी भी देश की लिए उसका विदेशी मुद्रा भंडार काफी महत्वपूर्ण होता है और इससे उस देश की आर्थिक स्थिति का पता लगता है। इससे अलावा यह मुद्रा की विनिमय दर को स्थिर रखने में बड़ी भूमिका निभाता है।

उदाहरण के लिए अगर किसी स्थिति में डॉलर के मुकाबले रुपए पर अधिक दबाव देखने को मिलता है और उसकी वैल्यू कम होती है तो केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर डॉलर के मुकाबले रुपए को गिरने से रोक सकता है और विनिमय दर को स्थिर रखता है।

बढ़ता हुआ विदेशी मुद्रा भंडार यह भी दिखाता है कि देश में डॉलर की आवक बड़ी मात्रा में बनी हुई है और यह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है। साथ ही इसके बढ़ने से देश के लिए विदेशों में व्यापार करना भी आसान हो जाता है।

--आईएएनएस

एबीएस/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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आतंकी भूमिकाएं और प्रचार के जरिये आईएसकेपी भारतीय युवाओं को कर रहा आकर्षित

नई दिल्ली, 6 फरवरी (आईएएनएस)। इस्लामिक स्टेट (आईएस) से जुड़े भारतीय मूल के आतंकियों को अब पहले की तुलना में अधिक लड़ाकू भूमिकाएं दी जा रही हैं। इसी रणनीति के तहत उन्हें अफगानिस्तान भेजा जा रहा है, जहां इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) उन्हें युद्ध में शामिल करने और प्रचार के जरिए “नायक” के रूप में पेश कर रहा है।

साल 2019 में इस्लामिक स्टेट से जुड़े भारतीयों की संख्या करीब 200 बताई गई थी। उस समय लौटकर आए कुछ लोगों ने पूछताछ में कहा था कि उन्हें केवल छोटे-मोटे काम दिए गए और उनके साथ भेदभाव किया गया। इससे कई भारतीय भर्तियों में नाराजगी थी और वे वापस लौटना चाहते थे।

हालांकि अब हालात बदल गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इस्लामिक स्टेट भारतीय मूल के अपने ऑपरेटिव्स को अब अफगानिस्तान भेज रहा है, जहां आईएसकेपी का प्रभाव है। संगठन भारतीय युवाओं को कट्टरपंथी बनाकर उन्हें भारत से बाहर निकालने और अफगानिस्तान में तैनात करने की कोशिश कर रहा है।

अधिकारियों का कहना है कि भारतीय ऑपरेटिव्स सीरिया और इराक के बजाय अफगानिस्तान को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके पीछे एक वजह सांस्कृतिक समानता बताई जा रही है, जबकि अरब देशों की तुलना में अफगानिस्तान में काम करना उन्हें आसान लगता है।

खुफिया एजेंसियां भारत से अफगानिस्तान की ओर किसी भी संभावित आतंकी मूवमेंट पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। आईएसकेपी को हाल के वर्षों में भारी नुकसान उठाना पड़ा है, ऐसे में वह नए लड़ाकों की तलाश में है।

इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी के अनुसार, यात्रा का रास्ता सीधा नहीं होता। कई भर्तियां पहले खाड़ी देशों का रुख कर सकती हैं और फिर वहां से अफगानिस्तान पहुंचती हैं, ताकि सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचा जा सके।

पहले भारतीय भर्तियों के पास केवल सीरिया और इराक का विकल्प था, लेकिन वहां से लौटे लोगों की डरावनी कहानियों के बाद भारत से भर्ती लगभग ठप हो गई थी। वहां भारतीयों को युद्ध में उतरने की अनुमति नहीं दी जाती थी और उन्हें केवल मामूली काम सौंपे जाते थे।

अफगानिस्तान में स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां भारतीय ऑपरेटिव्स को न केवल लड़ाकू भूमिकाएं दी जा रही हैं, बल्कि आत्मघाती हमलावरों के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा रहा है। यही कारण है कि अफगानिस्तान भारतीय भर्तियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।

हाल के उदाहरणों में अबू खालिद अल-हिंदी, अबू राजह अल-हिंदी और नजीब अल-हिंदी को आत्मघाती हमलों के लिए चुना गया।

आईएसकेपी केवल यहीं तक सीमित नहीं है। संगठन अपने मजबूत प्रचार तंत्र के जरिए इन लोगों को “शहीद” और “नायक” के रूप में पेश करता है। आईएसकेपी की पत्रिका ‘वॉयस ऑफ खुरासान’ में नजीब अल-हिंदी की कहानी चार पन्नों में प्रकाशित की गई थी। केरल के रहने वाले अबू खालिद अल-हिंदी को भी इसी पत्रिका में प्रमुखता से दिखाया गया।

इन लेखों में उनके “बलिदान”, कठिन यात्राओं और संघर्षों का महिमामंडन किया जाता है, जिसका इस्तेमाल युवाओं को बहकाने और भर्ती के लिए किया जा रहा है।

खुफिया अधिकारियों का कहना है कि हाल के महीनों में ऑनलाइन गतिविधियां कई गुना बढ़ी हैं। आईएसकेपी भारतीय ऑपरेटिव्स को जो महत्व दे रहा है, वही युवाओं को आकर्षित कर रहा है।

एजेंसियों के मुताबिक, आईएसकेपी का दीर्घकालिक लक्ष्य भारत से हजारों युवाओं की भर्ती कर उन्हें अफगानिस्तान भेजना है। क्षेत्र में हालात कठिन होते जा रहे हैं और संगठन को लड़ाई के लिए नए लोगों की जरूरत है। ऐसे में वह भारतीय भर्तियों को सबसे उपयुक्त मानता है।

अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यह प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है और सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रहने की जरूरत है।

--आईएएनएस

डीएससी

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