जीएसटी परिषद की सिफारिशों का नैसकॉम ने किया स्वागत
नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। उद्योग निकाय नैसकॉम ने गुरुवार को कहा कि जीएसटी परिषद की सिफारिशों ने सेवा निर्यात, इनपुट टैक्स क्रेडिट, रिफंड और अनुपालन से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही चिंताओं का समाधान किया है। वहीं, नोटिस, अभियोजन और गिरफ्तारी की शक्तियों से जुड़े प्रस्ताव कर प्रवर्तन के लिए अधिक संतुलित दृष्टिकोण का संकेत देते हैं।
आईटी सॉफ्टवेयर क्षेत्र के शीर्ष व्यापारिक संगठन ने एक बयान में कहा, “हम इन मुद्दों पर उद्योग के साथ केंद्र और राज्य सरकारों, वित्त मंत्रालय तथा सीबीआईसी की रचनात्मक भागीदारी की सराहना करते हैं।”
नैसकॉम की ओर से आईटी-आईटीईएस उद्योग के लिए विदेशों में स्थित शाखाओं के माध्यम से दी जाने वाली सेवाओं से जुड़ी सिफारिश का विशेष रूप से स्वागत किया गया है। भारतीय कंपनियां अकसर विदेशों में स्थित अपनी शाखाओं के माध्यम से विदेशी ग्राहकों को सेवाएं देती हैं। मौजूदा कानून के तहत भारतीय कार्यालय से विदेश स्थित अपनी शाखा को दी जाने वाली सेवाएं निर्यात की श्रेणी में नहीं आ पाती हैं, क्योंकि दोनों एक ही व्यक्ति/संस्था के प्रतिष्ठान माने जाते हैं।
नैसकॉम के अनुसार, इस प्रतिबंध को हटाने की परिषद की सिफारिश उस लंबे समय से चली आ रही चिंता को दूर करती है, जिसे नैसकॉम ने सरकार के सामने उठाया था। अन्य निर्यात शर्तें पूरी होने पर इससे कर संबंधी अनिश्चितता, मुकदमेबाजी और अनावश्यक कार्यशील पूंजी लागत कम होने की उम्मीद है।
नैसकॉम ने आगे कहा कि जीएसटी परिषद ने विदेशी ग्राहकों के स्वामित्व वाले सामान पर भारत में की जाने वाली रिसर्च, टेस्टिंग, सर्टिफिकेशन और इंजीनियरिंग सेवाओं के लिए आपूर्ति स्थल से जुड़े नियमों में बदलाव की भी सिफारिश की है। मौजूदा व्यवस्था में ग्राहक के प्रोटोटाइप या सैंपल की भारत में भौतिक मौजूदगी के कारण ऐसी सेवाएं निर्यात के रूप में योग्य नहीं हो पाती हैं।
प्रस्तावित बदलाव से इंजीनियरिंग आरएंडडी कंपनियों, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) और विदेशी ग्राहकों को योग्य रिसर्च एवं टेस्टिंग सेवाएं देने वाले डीप-टेक स्टार्टअप्स को फायदा हो सकता है। इससे भारत को वैश्विक रिसर्च और इंजीनियरिंग से जुड़े अधिक काम आकर्षित करने में भी मदद मिल सकती है।
ई-कॉमर्स के क्षेत्र में, दूसरे राज्यों में प्लेटफॉर्म के वेयरहाउस का इस्तेमाल करने वाले छोटे विक्रेताओं के लिए प्रस्तावित सरल पंजीकरण व्यवस्था का भी नैसकॉम ने स्वागत किया है। इससे छोटे कारोबारियों को हर राज्य में अपना अलग परिसर स्थापित किए बिना अंतरराज्यीय ऑनलाइन कारोबार में भाग लेने में मदद मिलेगी।
नैसकॉम ने इनवर्टेड-ड्यू रिफंड को इनपुट सेवाओं तक बढ़ाने, प्लांट और मशीनरी के लिए रिफंड की पात्रता तथा रिफंड के तेज प्रसंस्करण के प्रस्ताव का भी स्वागत किया। परिषद की कर्मचारी स्वास्थ्य और जीवन बीमा पर इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति देने की सिफारिश से उद्योग की एक और लंबे समय से चली आ रही चिंता दूर होगी।
नैसकॉम के बयान में कहा गया कि इन बदलावों से कारोबार से जुड़े खर्चों में फंसे वैध टैक्स क्रेडिट की राशि को कम करने में मदद मिलेगी।
--आईएएनएस
एबीएस
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डॉक्टरों को महंगे तोहफे देने वाली फार्मा कंपनियों पर SC सख्त, केंद्र को विशेष कमेटी बनाने और रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का निर्देश
दवाओं की बिक्री बढ़ाने के लिए डॉक्टरों को महंगे तोहफे, विदेश यात्राएं, पैसे या दूसरी सुविधाएं देने की शिकायतों को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया है. इस मामले में कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक विशेष कमेटी बनाने और उसकी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के सामने रखने का निर्देश दिया है. कोर्ट का यह कदम इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इसका सीधा संबंध मरीजों के इलाज, दवाओं की कीमत और स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता से है.
दरअसल, इस मामले में दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ फार्मा कंपनियां अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए डॉक्टरों को अलग-अलग तरह के फायदे देती हैं. इनमें महंगे गिफ्ट, विदेश यात्रा, कैश और दूसरी सुविधाएं शामिल होने की बात कही गई है. आरोप है कि इस तरह के फायदे मिलने के बाद डॉक्टरों पर अप्रत्यक्ष रूप से उन कंपनियों की दवाएं लिखने का दबाव बन सकता है. इसका असर आखिरकार मरीज पर पड़ता है.
डॉक्टर की लिखी दवा पर भरोसा सबसे ज्यादा
किसी भी मरीज के लिए डॉक्टर की लिखी दवा पर भरोसा सबसे ज्यादा होता है. मरीज आमतौर पर यह नहीं देख पाता कि डॉक्टर ने किसी खास कंपनी की दवा क्यों लिखी है. वह डॉक्टर की सलाह को ही सही मानकर दवा खरीदता है. ऐसे में अगर किसी दवा के पीछे मरीज की जरूरत के बजाय कोई कारोबारी हित काम कर रहा हो, तो यह चिंता का विषय बन जाता है. खासकर तब, जब मरीज पहले से बीमारी और इलाज के खर्च से परेशान हो.
जरूरत से ज्यादा दवाएं लिखी जाती हैं
याचिका में इसी तरह के सवाल उठाए गए हैं. आरोप है कि दवाओं की बिक्री बढ़ाने की इस तरह की कोशिशों का असर केवल डॉक्टर और फार्मा कंपनी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका बोझ आम मरीज की जेब पर भी पड़ सकता है. अगर किसी मरीज को जरूरत से ज्यादा दवाएं लिखी जाती हैं या महंगी दवा लेने की स्थिति बनती है, तो इलाज का खर्च भी बढ़ जाता है.
सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार से इस पूरे मुद्दे पर गंभीरता से काम करने को कहा है. कोर्ट ने एक विशेष कमेटी बनाने और उसकी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है. इसका मकसद यह देखना है कि फार्मा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच होने वाले ऐसे लेन-देन या सुविधाओं को लेकर किस तरह के नियम बनाए जा सकते हैं और मौजूदा व्यवस्था में क्या सुधार जरूरी है.
सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ गई
इस मामले की पिछली सुनवाई में भी केंद्र सरकार ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा था. सरकार ने कहा था कि वह इस मुद्दे को लेकर एक रूपरेखा तैयार कर रही है. हालांकि, उस समय केंद्र ने नियम तैयार करने के लिए कुछ और समय मांगा था. अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इस विषय पर सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ गई है.
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वास्थ्य क्षेत्र में डॉक्टर और मरीज के बीच भरोसा सबसे अहम होता है. डॉक्टर से उम्मीद की जाती है कि वह मरीज की बीमारी और जरूरत को ध्यान में रखकर इलाज और दवा तय करेगा. वहीं, दवा कंपनियों का मुख्य उद्देश्य अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाना होता है. इन दोनों के बीच कारोबारी हित और मरीज के हित में संतुलन बना रहना जरूरी है.
दवाओं की बिक्री बढ़ाने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से अब उम्मीद है कि दवा कंपनियों की ओर से डॉक्टरों को दिए जाने वाले फायदे और उनके बदले दवाओं की बिक्री बढ़ाने की कोशिशों को लेकर ज्यादा स्पष्ट नियम सामने आ सकते हैं. अगर ऐसी व्यवस्था बनती है जिसमें डॉक्टरों को किसी भी तरह के कारोबारी दबाव से दूर रखा जा सके, तो इसका सबसे बड़ा फायदा मरीजों को मिल सकता है.
आखिरकार सवाल सिर्फ दवा बेचने या खरीदने का नहीं है. सवाल इस बात का है कि मरीज को जो दवा लिखी जा रही है, वह उसकी जरूरत के मुताबिक है या किसी दूसरे प्रभाव की वजह से. सुप्रीम कोर्ट की पहल इसी बड़े सवाल पर व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की दिशा में एक अहम कदम के तौर पर देखी जा रही है.
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