बांग्लादेश: चुनाव की निष्पक्षता सवालों के घेरे में, अमेरिकी विद्वान बोले 'बड़े दलों को बाहर रखना ठीक नहीं'
वॉशिंगटन, 6 फरवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं। देश की स्थिति बेहद चिंताजनक है। इस बीच एक अमेरिकी स्कॉलर ने कहा है कि बांग्लादेश में होने वाले नेशनल चुनाव स्वतंत्र या निष्पक्ष नहीं होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि बड़े सियासी दलों को बाहर करने से यह प्रक्रिया पहले ही लोकतांत्रिक तौर पर अपनी अहमियत खो चुकी है।
अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट थिंक-टैंक के सीनियर फेलो माइकल रूबिन ने आईएएनएस से वोट की विश्वसनीयता के बारे में पूछे जाने पर कहा, बांग्लादेश में बिल्कुल भी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं होंगे।
रूबिन ने कहा कि असली चुनावों के लिए खुली प्रतिस्पर्धा जरूरी है। उन्होंने कहा, बांग्लादेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का एकमात्र तरीका यह है कि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों में मुकाबला हो। ये ऐसी पार्टियां हैं, जिन्हें ज्यादातर बांग्लादेशियों का सहयोग प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि अवामी लीग को रोकने की कोशिशें लोकतांत्रिक सिद्धांत के बजाय राजनीतिक डर को दर्शाती हैं। रूबिन ने कहा, यह तथ्य कि मोहम्मद यूनुस (मुख्य सलाहकार) और जमात-ए-इस्लामी अवामी लीग पर बैन लगाना चाहते हैं, सिर्फ इस बात का संकेत देती है कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में अवामी लीग ही जीतेगी।
इससे पहले, इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक डायलॉग द्वारा आयोजित बांग्लादेशी चुनावों पर एक कॉन्फ्रेंस में अपने मुख्य भाषण में, रूबिन ने चेतावनी दी कि बांग्लादेश संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए एक बड़ा विदेश नीति संकट बन सकता है।
रूबिन ने कहा, बांग्लादेश का संकट कई मायनों में लगभग धीमी गति से होने वाली ट्रेन दुर्घटना जैसा लगता है। उनका मानना है कि वाशिंगटन नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस की सरपरस्ती में हो रही हिंसक घटनाओं पर लगाम लगाने में विफल रहा है। यूनुस ने 8 अगस्त, 2024 से मुख्य सलाहकार के रूप में पदभार संभाला था।
2024 के मध्य में बांग्लादेश में राजनीतिक अशांति के बारे में प्रचलित बातों को चुनौती देते हुए, उन्होंने कहा: अब हम जो जानते हैं, वह यह है कि हमने जो विरोध प्रदर्शन देखे, वे स्वाभाविक नहीं थे।
उन्होंने ऐसी स्थितियों में हुए चुनावों की तुलना सत्तावादी प्रणालियों से की। रूबिन ने कहा, अगर आप चुनाव कराते हैं... जब अवामी लीग जैसी पार्टी पर बैन लगा दिया जाता है, तो असल में आप जिस चुनाव की बात कर रहे हैं, वह वैसा ही है जैसा हमने पहले सोवियत संघ या इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान में देखा है।
रूबिन ने बाहरी हस्तक्षेप का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान बांग्लादेश को पूर्वी पाकिस्तान के रूप में देखता है और दावा किया कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने जमात-ए-इस्लामी से जुड़ी एक छात्र-नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टी को फंड दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसे फंडिंग के सबूत पक्के थे, हालांकि इसके बारे में ज्यादा रिपोर्ट नहीं की गई।
उन्होंने चेतावनी दी कि राजनयिक अलगाव गलत फैसलों को और खराब करता है। रूबिन ने कहा, राजनयिकों के लिए असल में दूतावास से बाहर निकलकर उन समाजों की सच्चाई देखना बहुत मुश्किल होता है, जिनके बारे में उन्हें रिपोर्ट देनी होती है। उन्होंने तर्क दिया कि सीमित कॉन्टैक्ट नेटवर्क पर निर्भरता अमेरिकी आकलन को बिगाड़ देती है।
--आईएएनएस
केआर/
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Bangladesh Elections: ‘बांग्लादेश में सिर्फ अल्लाह का कानून चलेगा’, जमात नेता का चुनाव से पहले बड़ा बयान
Bangladesh Elections: बांग्लादेश में आम चुनाव होने वाले हैं. चुनाव के आते ही जमात-ए-इस्लामी को लेकर बहर एक बार फिर से तेज हो गई है. पार्टी के वरिष्ठ नेता के बयान के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या चुनाव से पहले फिर से जमात-ए-इस्लामी अपनी पुरानी विचारधारा की ओर लौट रही है.
पांच फरवरी को जमात-ए-इस्लामी के सेंट्रल नायब-ए-अमीर प्रोफेसर मुजीबुर रहमान ने एक चुनावी जनसभा को संबोधित किया. इस दौरान, उन्होंने एक बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि देश की आजादी के बाद से अब तक बांग्लादेश में अल्लाह का कानून लागू नहीं हुआ लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा.
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'इंसानों द्वारा बनाया गया कोई कानून नहीं चलेगा'
रहमान ने साफ कह दिया कि आने वाले वक्त में इस देश में इंसानों द्वारा बनाया गया कोई भी कानून नहीं चलेगा. देश की अगली संसद कुरान और सुन्नत के आधार पर चलाई जाएगी. अगली संसद अल्लाह द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार चलेगी. इस बयान को जमात की मूल सोच के रूप में देखा जा रहा है.
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जमात-ए-इस्लामी की सोच बहुत ज्यादा खतरनाक
चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि अगर देश में अल्लाह का कानून लागू करना है तो जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों को वोट देना होगा. रहमान के बयान के बाद राजनीतिक गलियों में चर्चाएं शुरू हो गईं हैं कि क्या फिर से जमात-ए-इस्लामी अपनी पहली वाली विचारधारा को सामने ला रही है. जमात-ए-इस्लामी की ये सोच बहुत ज्यादा खतरनाक है.
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