एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट से बाहर होने के बावजूद पाकिस्तान में मनी लॉन्ड्रिंग अब भी व्यापक: रिपोर्ट
इस्लामाबाद, 1 फरवरी (आईएएनएस)। वर्ष 2022 में पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे सूची से बाहर किया जाना वित्तीय प्रशासन में सुधार का संकेत माना गया था, लेकिन इस फैसले को लेकर बना शुरुआती उत्साह अब फीका पड़ता दिख रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी वित्तपोषण पर प्रभावी अंकुश अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ग्रे सूची से हटाने के बावजूद ‘फॉलो-अप मॉनिटरिंग’ में बनाए रखने का फैसला किया। एफएटीएफ ने यह कदम देश की मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक लगाने की क्षमता और इच्छाशक्ति को लेकर चिंताओं के चलते उठाया। विश्लेषकों का मानना है कि किसी देश का ग्रे सूची से बाहर होना टिकाऊ अनुपालन की गारंटी नहीं होता, खासकर उन देशों में जहां संरचनात्मक कमजोरियां, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और अवैध वित्तीय नेटवर्क गहराई से जड़े हों।
एशियन न्यूज पोस्ट में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, एफएटीएफ की अध्यक्ष एलिजा डी’ आंदा मद्राजो ने इस चेतावनी को स्पष्ट शब्दों में रखा। उन्होंने कहा कि ग्रे सूची से बाहर होना “आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ कोई अचूक ढाल नहीं” है। ग्रे सूची से बाहर होने वाले देशों की भी निरंतर समीक्षा की जाती है और पाकिस्तान के मामले में यह निगरानी एशिया-पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) द्वारा की जा रही है, क्योंकि पाकिस्तान एफएटीएफ का पूर्ण सदस्य नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी देश, जो ग्रे सूची से बाहर निकलता है, मनी लॉन्ड्रिंग या आतंकी वित्तपोषण से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाता।
रिपोर्ट के अनुसार, यह चेतावनी केवल सैद्धांतिक नहीं थी। खुफिया सूचनाओं में सामने आया कि पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने घरेलू डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर लगभग 1.4 करोड़ अमेरिकी डॉलर जुटाए। इस धन का उपयोग कथित तौर पर देशभर में 300 से अधिक नए प्रशिक्षण शिविर बनाने के लिए किया जाना था। इस खुलासे ने इस आशंका को और मजबूत किया कि पाकिस्तान का वित्तीय तंत्र, विशेषकर डिजिटल और अनौपचारिक क्षेत्र, अब भी चरमपंथी नेटवर्क के दुरुपयोग के प्रति संवेदनशील है।
चिंता इस बात को लेकर भी बढ़ी है कि पाकिस्तान वर्चुअल एसेट्स (वीए) और वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (वीएएसपी) को विनियमित करने में धीमी प्रगति कर रहा है। जून 2025 में एफएटीएफ ने इस पर चिंता जताई थी कि पाकिस्तान ने वर्चुअल एसेट्स के उपयोग पर न तो स्पष्ट प्रतिबंध लगाया है और न ही प्रभावी नियमन किया है। एफएटीएफ की वैश्विक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि किसी एक देश में नियामक चूक के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुष्परिणाम हो सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आतंकी वित्तपोषक, मादक पदार्थ तस्कर और राज्य-समर्थित तत्व तेजी से स्टेबलकॉइन का उपयोग कर रहे हैं।
डिजिटल क्षेत्र के अलावा, पाकिस्तान की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, 12 मार्च 2025 को पाकिस्तान के फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (एफबीआर) ने 70 से अधिक रियल एस्टेट एजेंटों की पहचान की, जो कथित तौर पर हवाला और हुंडी नेटवर्क के जरिए संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में करोड़ों डॉलर भेजने में शामिल थे।
--आईएएनएस
डीएससी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
बजट में किसानों के हितों के लिए कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया: हर्षवर्धन सपकाल
मुंबई, 1 फरवरी (आईएएनएस)। महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने रविवार को कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया बजट पिछले बजट से अलग नहीं है।
उन्होंने कहा कि यह बजट किसी भी सामाजिक वर्ग को संतुष्ट करने के लिए नहीं है, बल्कि सिर्फ बड़े-बड़े आंकड़ों और दावों तक सीमित है।
उन्होंने आरोप लगाया कि बजट में आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ की गई है और यह पूरी तरह से दिशाहीन है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि देश में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए एक ठोस नीति की आवश्यकता है, लेकिन इस बजट में रोजगार सृजन के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। किसानों के हितों के लिए कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया है। आयकर देने वाले कार्यरत वर्ग और मध्यम वर्ग को कोई राहत नहीं दी गई है। घोषित विकास दर के लक्ष्यों को प्राप्त करना भी मुश्किल लग रहा है, और केंद्र सरकार का यह बजट केवल घोषणाओं तक ही सीमित है।
सपकाल ने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण देश के लघु, मध्यम और वृहद उद्यम पूरी तरह से कमजोर हो गए हैं, और इस क्षेत्र का अब तक कोई ठोस विकास नहीं हुआ है, और इस बजट से भी इसे कोई ठोस समर्थन नहीं मिला है।
उन्होंने कहा कि देश में अधिकांश रोजगार इसी क्षेत्र से उत्पन्न होता है, लेकिन सरकार ने इस वास्तविकता को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है। मोदी सरकार के कार्यकाल में बेरोजगारी में भारी वृद्धि हुई है और नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, दो स्नातकों में से एक बेरोजगार है। बेरोजगारी दर 50 प्रतिशत से अधिक हो गई है।
उन्होंने आगे कहा कि मोदी सरकार निवेश और रोजगार सृजन के मामले में विफल रही है।
उन्होंने कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, फिर भी इस बजट ने किसानों को निराश किया है। पिछले 12 वर्षों में किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ है। इसके विपरीत, खेती की लागत दोगुनी हो गई है, कृषि उपज को उचित मूल्य नहीं मिल रहा है, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा रहा है, और किसान आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। इन गंभीर मुद्दों पर बजट में कोई ठोस प्रावधान नहीं है। सरकार को यह समझना चाहिए कि किसानों की समस्याओं का समाधान केवल 6 हजार रुपए वार्षिक भुगतान से नहीं हो सकता।
सपकाल ने कहा कि सरकार दावा कर रही है कि 10 वर्षों में 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकल चुके हैं, लेकिन हकीकत यह है कि 80 करोड़ लोगों को आज भी 5 किलो अनाज ही मिल रहा है।
--आईएएनएस
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