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मनोज मुंतशिर बोले- ‘बॉर्डर 2’ का गाना लिखते वक्त रोया:मिथुन ने कहा- इतने लंबे करियर के बाद भी लगा जैसे ये मेरी पहली फिल्म

‘बॉर्डर 2’ में देशभक्ति, जज्बे और जमीन से जुड़े इमोशंस का ऐसा संगम है कि फिल्म का हर सीन दर्शकों के दिल में सीधे उतर रहा है। फिल्म के गाने भी खूब पसंद किए जा रहे हैं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत के दौरान फिल्म के गीतकार मनोज मुंतशिर ने बताया कि जब तक अच्छे शब्द नहीं मिले तब तक गाने 9 महीनों तक लगातार लिखते रहे। कई बार गीत लिखते वक्त उनकी आंखों में आंसू आ जाता था। म्यूजिक डायरेक्टर मिथुन ने बताया कि उन्हें 20 साल के करियर के बाद भी लगा कि ‘बॉर्डर 2’ उनकी पहली फिल्म है। पेश है मनोज मुंतशिर और मिथुन से हुई बातचीत के कुछ और प्रमुख अंश.. सवाल: जब ‘बॉर्डर 2’ का ऑफर आया तो मन में पहला सवाल क्या था? पुरानी विरासत को बचाना या नई पहचान बनाना? मनोज मुंतशिर/ जवाब: पुरानी लेगेसी को सम्मान देना। ‘बॉर्डर’ ने जो इज्जत कमाई है, उसे बनाए रखना ही हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य था। हमने अन्नू मलिक और जावेद अख्तर साहब से बहुत कुछ सीखा। ‘बॉर्डर 2’ की नई कहानी और नई सिचुएशन हैं। लेकिन पुराने गानों के आगे हमारा सिर हमेशा झुका रहा। हमने अपना बेस्ट दिया। लेकिन मूल बॉर्डर साउंडट्रैक के लिए हमेशा सम्मान रहा। सभी रिक्रिएटेड गानों में हमारी श्रद्धांजलि झलकती है। सवाल: मिथुन आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगे? मिथुन/जवाब: मनोज जी जिस सम्मान की बात कर रहे रहे हैं, वो गानों में साफ सुनाई देता है। "घर कब आओगे" और "जाते हुए लम्हों" सुनिए तो पता चलेगा। ये मूल गानों के सामने नमन हैं। पूरे एहतराम और प्रार्थना के साथ बनाए गए। हमारा यही भाव था। जो लोग पसंद कर रहे हैं, उन्हें ये भावना महसूस हुई। सवाल: ‘बॉर्डर 2’ के गाने बनाते समय प्रेशर महसूस हुआ? मिथुन/ जवाब: मुझे लगता है कि प्रेशर ऐसा शब्द है, जिससे मैं या शायद मनोज जी भी ज्यादा रिलेट नहीं करते। हां, जिम्मेदारी जरूर होती है, और वो हर फिल्म में होती है, क्योंकि हर कहानी कुछ न कुछ कहना चाहती है। इसलिए संगीतकार और गीतकार से वही उम्मीद की जाती है। लेकिन जब बात ‘बॉर्डर’ की होती है, तो जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है। ये सिर्फ एक ब्रांड की बात नहीं है। अगर कुछ देर के लिए फिल्म का नाम ‘बॉर्डर’ न भी मानें, तब भी ये हमारे सैनिकों की सच्ची कहानियों पर आधारित है। 1971 में भारत ने कई मोर्चों पर युद्ध लड़े थे। ‘बॉर्डर’ लोंगेवाला की लड़ाई पर थी, जबकि इस बार कहानी एक अलग फ्रंट की है। इस फिल्म की कहानी से हमारे देश के शहीदों के नाम जुड़े हैं, और यही इसे बेहद गंभीर और संवेदनशील बनाता है। हम हाल ही में शहीदों के परिवारों से मिले और तब समझ आया कि इस कहानी से जुड़ना कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। सवाल: ‘बॉर्डर’ के म्यूजिक से आपका रिश्ता कैसा रहा है, और नए वर्जन को लेकर आपका नजरिया क्या था? मनोज मुंतशिर/जवाब: ‘बॉर्डर’ के दो गाने मेरी जिंदगी का हिस्सा तब से हैं, जब वे कैसेट पर आए थे। तब प्लेलिस्ट का कॉन्सेप्ट नहीं था, लेकिन शायद ही कोई हफ्ता ऐसा गया हो जब मैंने उस म्यूजिक को दोबारा न सुना हो। उस म्यूजिक से हम बेहद करीबी रिश्ता महसूस करते हैं। ऐसे में न मैं और न ही मिथुन सर कभी किसी रेस में थे कि हम इससे बेहतर कुछ करेंगे। जिस चीज से आप इतना प्यार करते हैं, उससे मुकाबला नहीं, उसे एंजॉय और सेलिब्रेट किया जाता है। हमारी कोशिश बस इतनी थी कि पूरी विनम्रता के साथ देखें, क्या हम अपने तरीके से उसमें कुछ जोड़ सकते हैं। सवाल : ‘संदेशे आते हैं’ जैसे आइकॉनिक गीत में कुछ नया लिखने की जरूरत क्यों पड़ी? मनोज मुंतशिर/जवाब: ‘संदेशे आते हैं’ अपने आप में एक कम्प्लीट सॉन्ग है। जावेद अख्तर साहब ने उसमें अपनी आत्मा डाली थी। वो सिर्फ गीत नहीं, एक धड़कता हुआ दिल है। उसमें कुछ नया जोड़ना यह दिखाने के लिए नहीं था कि हम भी लिख सकते हैं। बात सिर्फ इतनी थी कि ‘बॉर्डर 2’ एक नई फिल्म है, इसके मोर्चे और इसके किरदार अलग हैं। जो किरदार सीधे ‘बॉर्डर’ पर नहीं थे, उनकी भी अपनी कहानी है, और उस कहानी को कहने के लिए एक भाषा चाहिए। अनु मलिक का म्यूजिक और जावेद साहब का इमोशनल लैंडस्केप पहले से मौजूद था। हमने बस उसी कैनवस पर अपने हिस्से के चार रंग जोड़े। ‘संदेशे’ हमेशा जावेद अख्तर, अनु मलिक, रूप कुमार राठौड़ और सोनू निगम का ही गीत रहेगा। इस पर न मिथुन की दावेदारी है, न मेरी, न किसी और की। सवाल: क्या यह गीत अचानक लिखा गया था या इसके पीछे लंबा सफर रहा? मनोज मुंतशिर/जवाब: यह गीत किसी एक दिन या कुछ घंटों में नहीं लिखा गया। इसे लगभग 9 महीनों तक लगातार लिखा और बदला गया। कई बार शब्द अच्छे लगे, फिर नई धुन आई तो लगा इससे भी गहरा लिखा जा सकता है। यह एक सतत साधना थी, जिसमें भावनाएं हर दिन शामिल रहीं। सवाल: इस गीत को लिखते समय भावनात्मक जुड़ाव कितना गहरा था? मनोज मुंतशिर/जवाब: बहुत गहरा। कई बार लिखते हुए आंसू आ जाते थे। कुछ पंक्तियां ऐसी थीं जिन्हें लिखते समय भावनाओं पर काबू नहीं पाया जा सका। यह गीत उन किरदारों और उस कहानी की पुकार था, जिसे बिना संवेदनशील हुए लिखा ही नहीं जा सकता। सवाल: मिथुन, उस पल अपनी भावनाओं को संभालना आपके लिए कितना मुश्किल था? मिथुन/जवाब: मैं इसे मुश्किल नहीं कहूंगा। जब दिल सही जगह पर हो और नीयत साफ हो, तो भावनाएं खुद बहने लगती हैं। कमरे में मनोज मुंतशिर जी और अनुराग सिंह जी जैसे लोग थे, जिनका सेना से गहरा जुड़ाव और भावनात्मक समझ बहुत मजबूत है। उनकी मौजूदगी मेरे लिए सही रोशनी जैसी थी। मुझे बस अपनी भावना को खुलकर बाहर आने देना था। जो धुन आपने सुनी, वही मेरी पहली और सच्ची अभिव्यक्ति थी। सवाल: गीत लिखना और कविता लिखना अलग कैसे होता है, और मिथुन के साथ आपका जुड़ाव कैसा रहा? मनोज मुंतशिर/जवाब: फिल्मों के गाने लिखते वक्त कविता नहीं, बल्कि ऐसे बोल लिखे जाते हैं जो संगीत के साथ सांस ले सकें। मिथुन के साथ हमेशा पूरा भरोसा रहा, क्योंकि वो शब्दों की गहराई को तुरंत समझ लेते हैं और उसी पल उसका सही एक्सप्रेशन ढूंढ लेते हैं। सवाल: जिस धुन पर गाना बना, वो कैसे तय हुआ? मनोज मुंतशिर/जवाब: मैंने उन्हें दो लाइनें सुनाईं और उसी पल उन्होंने पियानो पर जो धुन बनाई, वही आज गाने में है। उसे संवारने में एक साल लगा, लेकिन धुन वही रही। यही कनेक्शन है। मिथुन हमेशा यूनिवर्स से जुड़े हुए लगते हैं, जैसे वो बस चुने हुए इंस्ट्रूमेंट हों। सवाल: आप दोनों को बहुत शानदार फीडबैक मिले होंगे। वीर जवानों के परिवारों से भी आप मिले। ऐसा कोई खास कॉम्प्लिमेंट या प्रतिक्रिया, जो आज भी जहन में हो? मनोज मुंतशिर/जवाब: हजारों-हजारों कमेंट आए। कई लोगों ने लिखा कि सिर्फ इस गीत के लिए मैं ये फिल्म 10 बार देखूंगा। ये पढ़कर बहुत अच्छा लगा। लेकिन सच कहूं तो आप शायद गाने के लिए फिल्म देखने जाएं, मगर फिल्म इतनी अच्छी बनी है कि आप 20 बार देखेंगे। 10 बार गाने के लिए और 10 बार फिल्म के लिए। सवाल: मिथुन, आपको कोई ऐसा फीडबैक मिला जो दिल को छू गया हो? मिथुन/जवाब: मैं फीडबैक से थोड़ा दूर रहता हूं, सोशल मीडिया से भी दूरी रखता हूं। लेकिन जब मेरा गाना लोगों तक पहुंचता है, तो उसकी फ्रीक्वेंसी मुझे महसूस होती है। मेरे लिए सबसे खास लम्हा तब था जब हम INS विक्रांत पर परफॉर्म कर रहे थे। स्टेज पर सोनू निगम जी, मनोज जी, 50 म्यूजिशियन और हमारे भारतीय नौसेना के अफसर मौजूद थे। दो अंतरों के बाद मुझे लगा जैसे वक्त थम गया हो। मैंने सब से खड़े होकर हमारे “मिट्टी के बेटों” को श्रद्धांजलि देने की गुजारिश की। फिर कोरस ने गाया- “कुछ दर्द कभी सोते ही नहीं…” वो पल कला, सिनेमा, अवॉर्ड्स, व्यूज, सब से परे था। वो अनुभव किसी भी सम्मान से बड़ा था। सवाल: मनोज जी, आप सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव हैं। पॉजिटिव और क्रिटिकल फीडबैक को कैसे फिल्टर करते हैं? मनोज मुंतशिर/जवाब:मेरे पास सिर्फ एक फिल्टर है कि क्या मेरी बात से देश का, समाज का, लोगों का भला हो रहा है? अगर जवाब “हां” है, तो मैं डरता नहीं। लेकिन अगर कोई बात सिर्फ मुझे मजा दे और समाज को नुकसान पहुंचाए, तो मैं उसे कभी नहीं कहूंगा। मेरे लिए सब कुछ मुझसे बड़ा है। ये मेरे बारे में नहीं, देश के बारे में है। सवाल: जब लोग कहते हैं कि आपके गीतों या धुनों ने उनकी जिंदगी बदल दी, तब आप क्या महसूस करते हैं? मनोज मुंतशिर/जवाब: हम बस ईश्वर का आभार मानते हैं। अगर सब कुछ हमारी काबिलियत से होता, तो मैं रोज सुबह उठकर एक बड़ा गीत लिख देता। सच ये है कि हम बहुत सीमित हैं। हम पत्थर हैं और हमारे वीरों की कहानियां वो पारस हैं, जो हमें सोना बना देती हैं। सवाल: मिथुन, आप इस बारे में कुछ कहना चाहेंगे? मिथुन/ जवाब: नम्रता एक कलाकार की सबसे बड़ी ताकत है। मैंने ये अपने गुरुओं से सीखा है। प्यारेलाल जी कहा करते थे कि ईश्वर हमें तभी इस्तेमाल करता है, जब हम खाली होते हैं। 20 साल के करियर के बाद भी मुझे लगता है कि ‘बॉर्डर 2’ मेरी पहली फिल्म है और हर काम ऐसे करता हूं जैसे ये आखिरी हो। सवाल: इतना गहरा असर छोड़ने वाले गीत कैसे रचे जाते हैं? मनोज मुंतशिर/जवाब: फैज साहब ने कहा था कि जिस दिन मेरे सीने का नासूर रिसना बंद हो जाएगा, मैं लिखना छोड़ दूंगा। जिस दिन मैं दूसरों का दर्द महसूस करना बंद कर दूं, उस दिन मैं लिखना भी छोड़ दूंगा। आज मैं लिखता हूं क्योंकि मैं तड़पता हूं। मेरी आंखों में आंसू हैं, और शायद यही वजह है कि मेरे गीत लोगों को छू पाते हैं। सवाल: आज देशभक्ति को पैट्रियोटिज्म बनाम जिंगोइज्म के चश्मे से क्यों देखा जा रहा है? आप क्या कहना चाहेंगे? मनोज मुंतशिर/जवाब: ये फिल्म बनाने वालों की नीयत पर निर्भर करता है। अगर इरादा सिर्फ भावनाएं भड़काकर पैसा कमाने का है, तो जिंगोइज्म लगेगा। लेकिन अगर ईमानदारी से कहानी कही जाए, तो उस पर कभी जिंगोइज्म की मुहर नहीं लगती।

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