अगर दिख रहे '3पी' लक्षण तो हो जाएं अलर्ट, कहीं पास तो नहीं आ रहा डायबिटीज का खतरा?
नई दिल्ली, 29 जनवरी (आईएएनएस)। डायबिटीज मेलिटस एक मेटाबोलिक डिसऑर्डर है, जिसमें रक्त में ग्लूकोज (शुगर) का स्तर लगातार बढ़ा रहता है। इसकी मुख्य वजह इंसुलिन का कम बनना या शरीर का इंसुलिन का सही उपयोग न कर पाना है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने डायबिटीज मेलिटस के प्रमुख लक्षणों के बारे में जागरूकता फैलाते हुए लोगों से अपने शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करने की अपील की।
मंत्रालय के अनुसार, डायबिटीज एक मेटाबोलिक डिसऑर्डर है जिसमें रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है और यह शरीर को कई तरह से प्रभावित करता है। इसकी समय पर पहचान और जांच से जटिलताओं को रोका जा सकता है। डायबिटीज के सबसे आम और क्लासिकल लक्षणों को तीन पी के नाम से जाना जाता है।
इनमें पॉलीयूरिया यानी बार-बार और अधिक मात्रा में पेशाब आना। हाई ब्लड ग्लूकोज के कारण किडनी अतिरिक्त ग्लूकोज को बाहर निकालने की कोशिश करती है, जिससे पेशाब बढ़ जाता है। दूसरा है पॉलीडिप्सिया यानी बहुत ज्यादा प्यास लगना। बार-बार पेशाब आने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है, जिससे लगातार प्यास महसूस होती है। वहीं, तीसरा है पॉलीफेजिया जिसमें, अत्यधिक भूख लगना शामिल है। शरीर को ऊर्जा के लिए ग्लूकोज नहीं मिल पाता, इसलिए भूख बढ़ जाती है, लेकिन फिर भी वजन कम होता रहता है।
इनके अलावा अन्य संकेत भी हैं, जैसे बिना किसी वजह के वजन कम होना। लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना शामिल है।
एक्सपर्ट के अनुसार, अगर ये लक्षण दिखें तो तुरंत ब्लड शुगर जांच करवाएं। शरीर के इन संकेतों को अनदेखा न करें और इसे गंभीरता से लें। डायबिटीज को समय रहते नियंत्रित करने से हृदय रोग, किडनी समस्या, आंखों की परेशानी और नसों के नुकसान जैसी गंभीर शारीरिक समस्याओं से बचा जा सकता है।
डायबिटीज के शुरुआती लक्षणों को पहचानकर जीवनशैली में बदलाव, संतुलित आहार, व्यायाम और आवश्यक दवाओं से इसे अच्छी तरह प्रबंधित किया जा सकता है। आयुष मंत्रालय आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के माध्यम से भी डायबिटीज प्रबंधन पर जोर देता है। नियमित जांच और जागरूकता से राहत मिलती है।
--आईएएनएस
एमटी/डीकेपी
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गुजरात सरकार की चारा बीज योजना, गौशाला और पंजरापोल को मिलेगा उन्नत बीजों का लाभ
गुजरात सरकार के कृषि, किसान कल्याण एवं सहकारिता विभाग द्वारा शुरू की गई “Scheme for Supply of Improved Seeds for Fodder” का मुख्य उद्देश्य गौशाला, पंजरापोल और इसी प्रकार की संस्थाओं को उन्नत किस्म के चारा बीज उपलब्ध कराना है. यह योजना विशेष रूप से चरागाह भूमि यानी गौचर भूमि पर पौष्टिक हरे चारे की खेती को प्रोत्साहित करती है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो सके.
किन बीजों का मिलेगा लाभ
इस योजना के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के उन्नत चारा बीज किट उपलब्ध कराए जाएंगे. मक्का के लिए अधिकतम 10 किट दिए जाएंगे, जिनमें प्रत्येक किट 5 किलोग्राम की होगी. ज्वार के लिए अधिकतम 50 किट, प्रत्येक 5 किलोग्राम की व्यवस्था है. जई के लिए अधिकतम 5 किट और लूसर्न के लिए अधिकतम 20 किट दिए जाएंगे, जिसमें प्रत्येक किट 2 किलोग्राम की होगी. यह वितरण संस्थाओं की आवश्यकता और पात्रता के आधार पर किया जाएगा.
पात्रता शर्तें क्या है?
इस योजना का लाभ केवल वही पंजरापोल और संस्थाएं ले सकेंगी, जो चैरिटी एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत हों. इसके साथ ही आवेदक के पास स्वयं की भूमि या वैध लीज पर ली गई भूमि का दस्तावेज होना आवश्यक है, जहां चारा उत्पादन किया जा सके.
आवेदन प्रक्रिया क्या है?
आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन रखी गई है. आवेदक को I-Khedut पोर्टल पर जाकर योजना के लिए आवेदन करना होगा. पोर्टल के होम पेज पर ‘Schemes’ विकल्प में जाकर ‘Animal Husbandry Schemes’ का चयन करना होगा. इसके बाद संबंधित योजना पर ‘Apply’ बटन पर क्लिक कर नया आवेदन भरना होगा. आवेदन में सुधार के लिए ‘Update Application’ विकल्प भी उपलब्ध है. आवेदन पूरा होने के बाद उसे कन्फर्म करना अनिवार्य है.
आवेदन के बाद की प्रक्रिया
ऑनलाइन आवेदन के बाद उसका प्रिंट आउट निकालकर 30 दिनों के भीतर संबंधित बोर्ड में जमा कराना होगा. इस प्रिंट आउट पर संबंधित जिले के GGVB नोडल अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर होना आवश्यक है. साथ ही आवेदन में मांगे गए सभी दस्तावेज संलग्न करने होंगे. आवेदक I-Khedut पोर्टल के माध्यम से अपने आवेदन की स्थिति भी देख सकता है.
आवश्यक दस्तावेज क्या क्या लगेंगे?
योजना के लिए आवेदन करते समय भूमि से जुड़े 7/12, 8-A और 6-अधिकार की प्रतियां अनिवार्य हैं. यदि भूमि लीज पर ली गई है तो लीज एग्रीमेंट की प्रति देनी होगी. इसके अलावा ग्राम पंचायत के तलाटी द्वारा जारी जल संसाधन उपलब्धता प्रमाण पत्र भी आवश्यक है. विभाग द्वारा आवश्यकता अनुसार अन्य दस्तावेज भी मांगे जा सकते हैं.
पशुधन विकास को मिलेगा बढ़ावा
यह योजना राज्य में पशुधन पोषण सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है. हरे और पौष्टिक चारे की उपलब्धता से पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर होगा, दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होगी और गौशाला एवं पंजरापोल की कार्यक्षमता को मजबूती मिलेगी.
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