सरकार ने बृहस्पतिवार को कहा कि दोषसिद्धि दर अदालतों के कामकाज का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब नहीं होती और इसे आपराधिक न्याय प्रणाली के सभी घटकों को ध्यान में रखते हुए समग्र रूप से देखा जाना चाहिए।
राज्यसभा को एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि दोषसिद्धि दर में पुलिस, फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और वकीलों आदि की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
त्वरित अदालतों (फास्ट ट्रैक अदालतों.... एफटीसी) में कथित रूप से घटती दोषसिद्धि दर से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि अदालतें कानून के अनुसार न्याय देने के लिए बाध्य होती हैं और इसमें आरोपी को बरी किया जाना भी शामिल हो सकता है।
न्यायाधीशों, अभियोजकों और अदालतों के कर्मचारियों की भर्ती का उल्लेख करते हुए मेघवाल ने कहा कि त्वरित अदालतों सहित जिला और अधीनस्थ अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पदों को भरना संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों और संबंधित उच्च न्यायालयों की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक ढांचे के तहत संविधान के अनुच्छेद 309 के प्रावधानके साथ अनुच्छेद 233 और 234 के तहत प्रदत्त शक्तियों के अनुसार, संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सरकारें अपने-अपने उच्च न्यायालयों से परामर्श कर न्यायिक अधिकारियों की भर्ती और नियुक्ति से संबंधित नियम बनाती हैं।
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बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने गुरुवार को कहा कि विश्वविद्यालयों में मौजूदा सामाजिक तनाव को देखते हुए, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए समानता संबंधी नियमों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई रोक उचित है। X पर एक पोस्ट में मायावती ने कहा कि UGC को नियमों को लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लेना चाहिए था और सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना चाहिए था।
मायावती ने कहा कि देश के सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों में जातिवादी घटनाओं को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियमों ने सामाजिक तनाव का माहौल पैदा कर दिया है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा UGC के नए नियमों पर रोक लगाने का आज का निर्णय उचित है। उन्होंने कहा कि जबकि देश में इस मामले को लेकर सामाजिक तनाव आदि का माहौल बिल्कुल भी नहीं बनता, अगर यूजीसी ने नए नियमों को लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लिया होता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत जांच समिति में उच्च जाति के समाज को उचित प्रतिनिधित्व दिया होता।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 में सामान्य वर्ग के खिलाफ कथित “भेदभाव” को लेकर देश भर में मचे बवाल के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इन विनियमों पर रोक लगा दी। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि फिलहाल 2012 के यूजीसी विनियम लागू रहेंगे। न्यायालय ने राय दी कि विनियम 3 (सी) (जो जाति-आधारित भेदभाव को परिभाषित करता है) में पूरी तरह अस्पष्टता है और इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। न्यायालय ने कहा, “भाषा को फिर से संशोधित करने की आवश्यकता है।”
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