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UP Rajyasabha Election: अखिलेश यादव के ये दांव कर गए काम तो बढ़ सकती है विरोधियों की मुश्किल

UP Rajyasabha Election: उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाला चुनाव सिर्फ उच्च सदन की कुछ सीटों का मुकाबला नहीं है. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह चुनाव सपा और भाजपा के बीच राजनीतिक ताकत आजमाने का भी बड़ा मौका बन गया है. 16 अक्टूबर को होने वाली वोटिंग से पहले अखिलेश यादव ने जिस तरह उम्मीदवारों का चयन किया है और तीसरे प्रत्याशी को लेकर सस्पेंस बनाए रखा है, उससे चुनाव का गणित और दिलचस्प हो गया है. 

सपा ने फिलहाल प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाया है. रामगोपाल यादव पार्टी के पुराने और अनुभवी चेहरों में हैं, जबकि धनराज नथवानी का चयन कई मायनों में चौंकाने वाला है. वह रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े कॉरपोरेट एग्जीक्यूटिव और खेल प्रशासक हैं और उनके पिता परिमल नथवानी राज्यसभा सांसद रह चुके हैं. 

लेकिन असली कहानी यहां खत्म नहीं होती. अखिलेश यादव ने संकेत दिया है कि तीसरे प्रत्याशी के नाम का फैसला आवश्यक संख्या बल जुटाने के बाद किया जाएगा. उन्होंने यह भी दावा किया है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के कई विधायक सपा के संपर्क में हैं. 

37 वोट का गणित, 10 सीटों की बड़ी बाजी

उत्तर प्रदेश में मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर राज्यसभा की एक सीट के लिए 37 प्रथम वरीयता वोट की जरूरत है. 10 सीटों के चुनाव में प्रभावी रूप से 370 वोटों का गणित बनता है. 

मौजूदा संख्या बल के आधार पर बीजेपी नेतृत्व वाला एनडीए 8 सीटों की स्थिति में बताया जा रहा है, जबकि सपा और कांग्रेस के पास दो सीटों के लिए पर्याप्त संख्या है. हालांकि तीसरी सीट के लिए सपा को अपने मौजूदा वोटों से आगे जाकर समर्थन जुटाना होगा.  यही वजह है कि आने वाले दिनों में विधायकों की भूमिका बेहद अहम होने वाली है. 

अखिलेश यादव के 5 बड़े दांव

1. तीसरे उम्मीदवार के नाम पर सस्पेंस

अखिलेश यादव का पहला बड़ा दांव फिलहाल तीसरे उम्मीदवार के नाम को रोककर रखना है.  सपा ने दो उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं और दोनों ने नामांकन भी दाखिल कर दिया है. लेकिन तीसरे प्रत्याशी को लेकर पार्टी ने अभी अंतिम घोषणा नहीं की है. अखिलेश ने कहा है कि आवश्यक गणित बैठाने के बाद नाम घोषित किया जाएगा. 

राजनीतिक तौर पर इसका मतलब यह है कि सपा पहले यह देखना चाहती है कि उसके पास कितने अतिरिक्त वोट जुट सकते हैं. अगर पर्याप्त समर्थन मिलता है, तभी तीसरे प्रत्याशी को मैदान में उतारने का रास्ता खुल सकता है. 

यानी इस बार सपा सिर्फ उम्मीदवार घोषित करके वोट मांगने के बजाय पहले वोटों का गणित और फिर उम्मीदवार वाली रणनीति पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है.

2. भाजपा खेमे में सेंध का दावा

अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि बीजेपी और उसके गठबंधन के कई विधायक सपा के संपर्क में हैं.  हालांकि यह दावा राजनीतिक बयान है और मतदान से पहले ये साफ नहीं है कि वास्तव में कितने विधायक सपा के पक्ष में वोट करेंगे. लेकिन राज्यसभा चुनाव के गणित में कुछ अतिरिक्त विधायक भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

अखिलेश ने यह भी कहा कि संपर्क में आने वाले सभी लोगों को पार्टी में समायोजित करना संभव नहीं है और वह ऐसा कोई वादा नहीं करना चाहते जिसे बाद में पूरा न कर सकें. इससे संकेत मिलता है कि सपा फिलहाल विधायकों के सामर्थन और भविष्य की राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है. 

3. पुराने बागियों की वापसी पर नजर

2024 के राज्यसभा चुनाव में सपा के कुछ विधायकों के बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में वोट करने की चर्चा हुई थी. उस चुनाव में सपा की तीसरी सीट की कोशिश सफल नहीं हुई थी. 

इस बार वही अनुभव सपा की रणनीति का हिस्सा बन सकता है. पार्टी के लिए अपने मौजूदा विधायकों को एकजुट रखना सबसे पहली चुनौती है. इसके बाद उन विधायकों का समर्थन हासिल करना अहम होगा जो पहले अलग रुख अपना चुके हैं. 

अखिलेश यादव ने ऐसे विधायकों को इस चुननाव में अपनी पिछली राजनीतिक स्थिति सुधारने का मौका मिलने की बात भी कही है. हालांकि किसी विधायक के मतदान की दिशा के बारे में अंतिम निष्कर्ष वोटिंग से पहले निकालना उचित नहीं होगा. 

4. NDA के सहयोगी दलों पर नजर

राज्यसभा चुनाव में सिर्फ बीजेपी और सपा के विधायक ही अहम नहीं हैं. एनडीए के सहयोगी दलों के विधायक भी अतिरिक्त सीट के गणित में खास हो सकते हैं. 

उत्तर प्रदेश विधानसभा में सुभासपा समेत एनडीए के कई सहयोगी दल मौजूद हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुभासपा के 6 विधायक हैं, जिनमें चार का उल्लेख खास तौर से 10वीं राज्यसभा सीट के गणित के संदर्भ में किया गया है. 

हालांकि किसी सहयोगी दल के विधायक के संभावित क्रॉस वोट को लेकर चल रही चर्चाओं को आधिकारिक निर्णय नहीं माना जा सकता है. मतदान के समय ही वास्तविक तस्वीर सामने आएगी. 

5. धनराज नथवानी के जरिए बड़ा राजनीतिक संदेश

अखिलेश यादव का सबसे ज्यादा चर्चा में आया दांव धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाना है. 
धनराज नथवानी पारंपरिक सपा राजनीति से जुड़े हुए चेहरे नहीं हैं. वह रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े हैं और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष के तौर पर भी भूमिका निभा चुके हैं. उनके पिता परिमल नथवानी राज्यसभा सांसद रहे हैं. 

यह वजह है कि उनके नाम से राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा पैदा की है. सपा के लिए यह उम्मीदवार सिर्फ एक राज्यसभा चेहरा नहीं, बल्कि कारोबारी और संस्थागत क्षेत्र तक पहुंच का संकेत भी माना जा रहा है. 

अखिलेश यादव ने खुद धनराज नथवानी के चयन का बचाव करते हुए कहा है कि उद्योग और निवेश के बिना रोजगार और आर्थिक विकास की बात पूरी नहीं हो सकती. 

भाजपा के सामने भी 8वीं सीट की चुनौती

मुकाबले को केवल सपा की तीसरी सीट की कोशिश के रूप में देखना अधूरा होगा. एनडीए के सामने भी अतिरिक्त सीट का गणित है.
मौजूदा संख्या बल के आधार पर एनडीए आठ सीटें जीतने की स्थिति में लग रही है. लेकिन आठवीं सीट के लिए गठबंधन को अपने विधायकों को एकजुट रखना होगा. यही वह जगह है जहां सहयोगी दलों और संभावित क्रॉस वोटिंग की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है.

अगर सपा तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारती है तो मुकाबला सीधे 10वीं सीट के लिए अतिरिक्त वोटों की लड़ाई में बदल सकता है. 

2024 का हिसाब, 2026 में नई रणनीति

दरअसल 2024 के राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने तीसरी सीट के लिए आलोक रंजन को प्रत्याशी बनाया था. लेकिन क्रॉस वोटिंग के बाद बीजेपी के संजय सेठ चुनाव जीत गए थे. 

इस बार अखिलेश यादव उसी तरह की स्थिति को दोहराने से बचना चाहते हैं. फर्क यह है कि इस बार सपा पहले से अपने वोटों को लेकर सतर्क दिखाई दे रही है और बीजेपी खेमे के विधायकों के संपर्क में होने का दावा भी कर रही है. 

हालांकि 2024 के अनुभव को 2026 के परिणाम का संकेत मानना सही नहीं होगा. दोनों चुनावों में विधानसभा की स्थिति और राजनीतिक समीकरण अलग हैं. 

क्या बदल सकता है पूरा समीकरण?

अगर सपा अपने मौजूदा विधायकों को पूरी तरह एकजुट रखने में सफल रहती है और उसे विपक्षी खेमे के बाहर से कुछ अतिरिक्त वोट मिलते हैं तो तीसरे उम्मीदवार को लेकर उसका गणित मजबूत हो सकता है. 

दूसरी तरफ अगर एनडीए अपने सहयोगी दलों और विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहता है, तो अतिरिक्त सीट का उसका गणित भी मजबूत बना रह सकता है. 

यानी इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस पार्टी के पास कितने विधायक हैं, बल्कि यह भी है कि मतदान के दिन कौन अपने विधायकों को एकजुट रख पाता है. 

इस दिन खुलेगा पत्तों का खेल

फिलहाल सपा ने दो प्रत्याशी उतारे हैं और तीसरे नाम को लेकर सस्पेंस बरकार है. अखिलेश यादव का दावा है कि भाजपा गठबंधन के कई विधायक उनके संपर्क में हैं, लेकिन इन दावों की वास्तविक परीक्षा मतदान के दौरान होगी. 

2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले होने वाला यह राज्यसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पार्टियों के भीतर अनुशासन, गठबंधन की मजबूती और विधायकों की राजनीतिक प्राथमिकताओं की झलक मिल सकती है.

रामगोपाल यादव का अनुभव, धनराज नथवानी का अप्रत्याशित चयन, तीसरे उम्मीदवार पर सस्पेंस और अतिरिक्त वोट जुटाने की कोशिश अखिलेश यादव के ये दांव अगर गणित में फिट बैठते हैं, तो राज्यसभा चुनाव का मुकाबला मौजूदा संख्या बल से कहीं ज्यादा दिलचस्प हो सकता है. 

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मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने पकड़ी रफ्तार, सितंबर में PMI 55.1; नई नौकरियों में भी बढ़ोतरी

भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की गतिविधियों में सितंबर में तेजी देखी गई है और पीएमआई 55.1 पर पहुंच गया है, जो कि अगस्त में 52.8 था. यह जानकारी एसएंडपी ग्लोबल की ओर से गुरुवार को जारी एचएसबीआई इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई सर्वेक्षण में दी गई. सर्वेक्षण में बताया गया कि सितंबर में पीएमआई वृद्धि की वजह नए ऑर्डर का बीते सात महीनों के दौरान सबसे तेजी बढ़ना है. इससे फैक्ट्रियों में रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। साथ ही, बिजनेस कॉन्फिडेंस चार महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है. 

हालांकि, बीते महीने इनपुट लागत और बिक्री मूल्य दोनों में इजाफा देखने को मिला है, लेकिन महंगाई ऐतिहासिक मानकों से कम रही है. एसएंडपी ग्लोबल के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक, खाने-पीने की चीजों, दवाइयों और टेक्सटाइल उत्पादों की ज्यादा मांग के कारण नए बिजनेस ऑर्डर में तेजी से बढ़ोतरी हुई. कुल बिक्री में यह बढ़ोतरी फरवरी के बाद सबसे तेज रही. सर्वेक्षण में आगे बताया गया कि नए निर्यात ऑर्डर भी तेजी से बढ़े हैं पैनल के सदस्यों ने खास तौर पर ब्राजील, यूरोप, यूएई और यूएस के ग्राहकों से ज्यादा मांग देखी. मांग में आई इस तेजी की वजह से पिछले चार महीनों में भारतीय फैक्ट्री प्रोडक्शन में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई. 

ये भी पढ़ें: सितंबर में UPI ने बनाया नया रिकॉर्ड, 24.07 अरब लेनदेन के साथ 29.37 लाख करोड़ का ट्रांजैक्शन

एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने कहा,"भारत का फैक्ट्री सेक्टर तिमाही के आखिर में मजबूत स्थिति में था. इस कारण सितंबर में पीएमआई 52.8 से बढ़कर 55.1 हो गया. इस दौरान मई के बाद से सबसे तेजी से नई भर्तियां शुरू हुईं और मैन्युफैक्चरर्स आने वाले महीनों को लेकर ज्यादा उम्मीद रखने लगे हैं." उन्होंने आगे कहा, "कंपनियों ने ज्यादा सामान खरीदा और संभावित बिक्री की तैयारी के लिए स्टॉक जमा किया है. तैयार माल के स्टॉक में लगभग 12 सालों में दूसरी सबसे बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो कम स्टॉक लेवल से साफ बदलाव का संकेत है."  

INPUT: IANS

 

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