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भरोसे एवं भारत की आवाज थे विरल पत्रकार मार्क टुली

भारत की समकालीन इतिहास-यात्रा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल घटनाओं का वृत्तांत नहीं लिखते, बल्कि समय की चेतना में घुल-मिलकर स्वयं इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। सर विलियम मार्क टुली, जिन्हें दुनिया भर में स्नेह और सम्मान से ‘मार्क टुली’ कहा गया, ऐसे ही विरल पत्रकार थे। उनका निधन केवल एक वरिष्ठ पत्रकार का जाना नहीं है, बल्कि उस पत्रकारिता-दृष्टि का अवसान है, जिसमें सत्य सनसनी से ऊपर और संवेदना आंकड़ों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती थी। बीबीसी रेडियो की वह गूंजती हुई पंक्ति-‘दिस इज मार्क टुली रिपोर्टिंग फ्रॉम दिल्ली’, दशकों तक भारतीय उपमहाद्वीप में भरोसे, प्रामाणिकता और संतुलन का पर्याय बनी रही। मार्क टुली एक विदेशी पत्रकार भर नहीं थे, वे भारत की आत्मा के स्थायी प्रवासी थे, जिनमें भारतीयता रची-बसी थी। उनका भारत से रिश्ता किसी वीजा, नियुक्ति या करियर-रणनीति का परिणाम नहीं था, बल्कि वह रक्त और मिट्टी का संबंध था। 24 अक्टूबर 1935 को कोलकाता के टॉलीगंज में जन्मे टुली ने ब्रिटिश राज के अंतिम दौर का भारत देखा, जिया और महसूस किया। एक समृद्ध ब्रिटिश परिवार में जन्म लेने के बावजूद दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूलों और भारतीय जनजीवन की विविध छवियों ने उनके भीतर एक ऐसी आत्मीयता एवं संस्कार बो दिया, जो जीवन भर पुष्पित-पल्लवित होती रही। नौ वर्ष की आयु में जब वे इंग्लैंड गए, तब भी भारत उनके भीतर जीवित रहा-स्मृतियों में, संवेदनाओं में और दृष्टि में।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र का अध्ययन करते समय उन्होंने पादरी बनने का विचार किया था। यह तथ्य अपने-आप में बहुत कुछ कहता है, क्योंकि सत्य की खोज, नैतिक विवेक और मानवीय करुणा उनके व्यक्तित्व की मूल धुरी थीं। किंतु नियति ने उन्हें चर्च की सीमित दीवारों से बाहर निकालकर एक ऐसे मंच पर खड़ा कर दिया, जहां वे पूरी मानवता से संवाद कर सकते थे। पत्रकारिता उनके लिए पेशा नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व थी। जब वे बीबीसी के संवाददाता के रूप में भारत लौटे, तो उन्होंने इसे एक असाइनमेंट नहीं बल्कि अपने घर लौटने जैसा अनुभव किया। मार्क टुली की पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे भारत को पश्चिमी चश्मे से नहीं देखते थे। वे सत्ता के गलियारों से अधिक गांव की चौपाल, मंदिर-मस्जिद के आंगन, खेतों की मेड़ और आम आदमी की चिंता को महत्त्व देते थे। आपातकाल हो या इंदिरा गांधी की राजनीति, सिख विरोधी दंगे हों या बाबरी मस्जिद विध्वंस, पंजाब का उग्रवाद हो या कश्मीर की पीड़ा-मार्क टुली ने हर विषय को संतुलन, गहराई और मानवीय संवेदना के साथ दुनिया के सामने रखा। वे घटनाओं के पीछे छिपी सामाजिक और सांस्कृतिक परतों को समझने की कोशिश करते थे, इसीलिए उनकी रिपोर्टिंग तत्कालीन शोर-शराबे से ऊपर उठकर स्थायी संदर्भ बन गई।

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आज के आपाधापी और टीआरपी-केंद्रित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दौर में, जहाँ खबर से ज्यादा शोर और तथ्य से ज्यादा त्वरित प्रतिक्रिया को महत्व दिया जाता है, मार्क टली की पत्रकारिता एक उजली कसौटी बनकर सामने आती है। टीवी स्टूडियो की तीखी बहसों, चीखती हेडलाइनों और सतही विश्लेषण के उलट, मार्क टली ने यह सिद्ध किया कि शांत, संयमित और तथ्यपरक संवाद भी उतना ही प्रभावशाली होता है बल्कि अधिक विश्वसनीय होता है। उनकी पत्रकारिता दिल्ली के सत्ता-केंद्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह भारत की आत्मा-गाँव, कस्बे, आम जन और उनकी पीड़ा से जुड़ी हुई थी। आज जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अक्सर सत्ता, बाज़ार और सनसनी के दबाव में अपनी विश्वसनीयता खोता दिख रहा है, तब मार्क टली की शैली यह सिखाती है कि पत्रकारिता का असली धर्म प्रश्न पूछना, सच को धैर्य से समझना और उसे बिना शोर के, पूरे संदर्भ के साथ प्रस्तुत करना है। उनका जीवन आज के टीवी मीडिया के लिए एक मौन लेकिन सशक्त संदेश है कि भरोसे की आवाज़ ऊँची नहीं, सच्ची होती है।

मार्क टुली की सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने भारत की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। वे मानते थे कि भारत किसी एक विचार, एक भाषा या एक संस्कृति से नहीं बनता, बल्कि यहां की बहुलता ही इसकी आत्मा है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई-ग्रामीण-शहरी, गरीब-अमीर, इन सबके बीच बहता हुआ संवाद ही भारत की असली पहचान है। जब दुनिया के कई हिस्से भारत को केवल गरीबी, अव्यवस्था या अराजकता के चश्मे से देखते थे, तब मार्क टुली ने भारत की सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और जीवटता को रेखांकित किया। उन्होंने यह दिखाया कि यह देश विरोधाभासों के बावजूद नहीं, बल्कि उन्हीं के साथ जीना जानता है। मार्क टुली की आवाज रेडियो के माध्यम से करोड़ों लोगों के घरों तक पहुंचती थी। वह दौर ऐसा था, जब समाचार सुनने के लिए लोग घड़ी देखकर रेडियो ऑन करते थे। उनकी रिपोर्टिंग में नाटकीयता नहीं, बल्कि सजीवता-ठहराव था। वे कहते थे कि भारत को समझने के लिए अपनी घड़ी उतारकर रखनी पड़ती है। यह कथन केवल समय-संस्कृति की बात नहीं करता, बल्कि उस धैर्य और विनम्रता की ओर संकेत करता है, जिसके बिना भारत जैसे देश को समझा नहीं जा सकता। यही धैर्य उनकी पत्रकारिता में झलकता था।

एक विदेशी होकर भी उन्होंने भारतीयता पर गर्व करना सिखाया, वह भी उस समय, जब हम स्वयं अपनी जड़ों को लेकर संशय में थे। उनकी पुस्तकों और कार्यक्रमों में भारत केवल खबर नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता के रूप में उपस्थित रहता है। ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ जैसी कृतियां भारत की निरंतर चलती कहानी को सामने लाती हैं, जहां कोई अंतिम विराम नहीं, केवल प्रवाह है। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की अव्यवस्थाओं की आलोचना भी की, लेकिन वह आलोचना स्नेह और चिंता से भरी होती थी, उपेक्षा या उपहास से नहीं। ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड और भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना उनके योगदान की औपचारिक स्वीकृति है, लेकिन उनकी असली विरासत वह विश्वास है, जो भारतीय जनता ने उन पर किया। लोग उनकी बात इसलिए मानते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह व्यक्ति भारत को समझता है, उसे चाहता है और उसके साथ ईमानदार है।

आज के दौर में, जब पत्रकारिता तेजी से बदल रही है, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड में, नई तकनीक के दबाव में हांफ रही है, तब मार्क टुली की कमी और अधिक महसूस होती है। उनका जाना उस युग का अंत है, जहां शब्दों की गरिमा थी और तथ्य पवित्र माने जाते थे। वे हमें यह सिखाकर गए कि पत्रकारिता सूचना का व्यापार नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है। भारत की मिट्टी में जन्मा, विदेशी धरती पर शिक्षित और अंततः भारत की ही गोद में समा जाने वाला यह व्यक्तित्व सदैव स्मृतियों में जीवित रहेगा। वे ऐसे विदेशी साक्षी थे, जिन्होंने भारत को केवल दुनिया की नजरों में ही नहीं, बल्कि भारतीयों की अपनी नजरों में भी नई गरिमा दी। मार्क टुली का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सीमाएं नागरिकता तय कर सकती हैं, संवेदनाएं नहीं। उनकी आवाज भले ही अब रेडियो पर न गूंजे, लेकिन भारत की आत्मा में उनकी प्रतिध्वनि लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।

- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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