नई National Steel Policy से सस्ते आयात पर लगेगी रोक, Green Steel पर होगा फोकस
भारत सरकार नई राष्ट्रीय इस्पात नीति को जल्द ही आम लोगों और उद्योग से जुड़े पक्षों की राय के लिए सार्वजनिक करने जा रही है। इस नीति का ड्राफ्ट अगले करीब एक सप्ताह में सार्वजनिक किए जाने की उम्मीद है। इस्पात सचिव संदीप पौंडरिक ने मंगलवार को बताया कि नई नीति का मकसद 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के साथ देश के इस्पात उद्योग को आगे बढ़ाना है।
संदीप पौंडरिक ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि नई राष्ट्रीय इस्पात नीति को जल्द ही सार्वजनिक चर्चा के लिए रखा जाएगा। इसके बाद उद्योग और इससे जुड़े दूसरे पक्ष अपने सुझाव और आपत्तियां दर्ज करा सकेंगे। सरकार का अनुमान है कि 2047 तक भारत की इस्पात उत्पादन क्षमता बढ़कर 600 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच सकती है।
गौरतलब है कि भारत दुनिया के प्रमुख इस्पात उत्पादक देशों में शामिल है और देश में निर्माण, सड़क, रेलवे, वाहन तथा बुनियादी ढांचे के विकास के साथ इस्पात की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सरकार नई नीति के जरिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ उद्योग को तकनीक और कीमत के मामले में ज्यादा मजबूत बनाना चाहती है।
नई नीति में सस्ते और कम गुणवत्ता वाले विदेशी इस्पात के आयात को रोकने के लिए भी कई उपाय किए जाने हैं। इसके तहत जरूरत पड़ने पर सुरक्षा शुल्क और डंपिंग रोधी शुल्क जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। सरकार का मानना है कि इससे घरेलू इस्पात कंपनियों को अनुचित रूप से सस्ते आयात से बचाने में मदद मिल सकती है।
खास ध्यान छोटे इस्पात उत्पादकों पर भी दिया जा रहा है। नीति में ऐसी व्यवस्था बनाने की बात है, जिससे छोटी कंपनियां नई तकनीक अपना सकें और कीमत के मामले में बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। इससे देश के इस्पात क्षेत्र में छोटे और मध्यम कारोबारियों की स्थिति मजबूत करने की कोशिश की जाएगी।
मौजूद जानकारी के अनुसार, नई नीति में 2035 और 2047 के लिए हरित इस्पात, विशेष इस्पात और जंगरोधी इस्पात के उत्पादन को लेकर भी लक्ष्य तय किए जाने हैं। सरकार का जोर सामान्य उत्पादों के साथ ज्यादा मूल्य वाले इस्पात उत्पादों को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने पर रहेगा।
नई नीति के तहत इस्पात क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना भी बड़ा लक्ष्य है। रॉयटर्स द्वारा देखे गए ड्राफ्ट के अनुसार, सरकार 2047 तक कच्चे इस्पात के प्रत्येक टन उत्पादन पर औसत कार्बन उत्सर्जन को मौजूदा 2.54 टन से घटाकर करीब 1.54 टन करने की दिशा में काम करना चाहती है। यह लक्ष्य भारत के 2070 तक शून्य शुद्ध उत्सर्जन हासिल करने के व्यापक लक्ष्य से जुड़ा हुआ है।
कच्चे माल की उपलब्धता भी नई नीति का अहम हिस्सा है। ड्राफ्ट के अनुसार, 2047 तक भारत की आयरन ओर की जरूरत करीब 772 मिलियन टन तक पहुंच सकती है। सरकार उच्च गुणवत्ता वाले आयरन ओर भंडार तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए विदेशों में संपत्तियां हासिल करने और दूसरे देशों के साथ ज्वाइंट प्रोजेक्ट की दिशा में भी काम कर सकती है।
इसी तरह इस्पात उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कोकिंग कोयले की मांग 214 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार इसके लिए आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने और विदेशों में खनिज संपत्तियां हासिल करने की योजना पर काम कर रही है। इसे रणनीतिक वैश्विक पहुंच के जरिए आगे बढ़ाया जाएगा।
बता दें कि मौजूदा राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 में बनाई गई थी और उसके 2030-31 तक के कई लक्ष्य तय किए गए थे। अब सरकार इसे बदलती जरूरतों के हिसाब से नए सिरे से तैयार कर रही है। नई नीति में उत्पादन बढ़ाने के साथ गुणवत्ता, पर्यावरण और कच्चे माल की सुरक्षा पर भी जोर रहने वाला है।
3 Crore से ऊपर की FD पर बैंकों को हर दिन सुबह 10 बजे तक घोषित करनी होगी नई Rate
अगर आप बैंक में 3 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा की पैसे फिक्स्ड डिपॉजिट के तौर पर रखने की योजना बना रहे हैं, तो 1 अक्टूबर से आपके लिए एक अहम बदलाव होने जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने बड़ी रकम वाली फिक्स्ड डिपॉजिट को लेकर बैंकों के लिए नए नियम तय किए हैं। इसके तहत बैंकों को ऐसी जमाओं पर मिलने वाली ब्याज दर अपनी वेबसाइट पर हर कामकाजी दिन पहले से बतानी होगी।
नए नियम के अनुसार, बैंक को बड़ी फिक्स्ड डिपॉजिट पर लागू ब्याज दर सुबह 10 बजे तक अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करनी होगी। अगर किसी वजह से इसमें बदलाव करना है तो इसके लिए 10 मिनट की अवधि रखी गई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस दर को बैंक ने पहले से सार्वजनिक किया है, जमा स्वीकार करते समय उसी दर के आधार पर ब्याज देना होगा।
गौरतलब है कि यह व्यवस्था मुख्य रूप से बड़ी रकम जमा करने वाले ग्राहकों के लिए लाई गई है। इसका असर सामान्य ग्राहकों की छोटी या मध्यम रकम वाली फिक्स्ड डिपॉजिटो पर सीधे तौर पर नहीं पड़ेगा। इसका मकसद बड़ी रकम वाली जमा पर बैंकों की ब्याज दर तय करने की प्रक्रिया को ज्यादा साफ और एक जैसा बनाना है।
नए ढांचे के तहत अनुसूचित कमर्शियल बैंकों में आम तौर पर 3 करोड़ रुपये या उससे अधिक की फिक्स्ड डिपॉजिट को बड़ी जमा माना जाता है। ऐसे में कोई ग्राहक अगर इतनी रकम की जमा कराने जा रहा है तो वह पैसा लगाने से पहले बैंक की वेबसाइट पर उस दिन लागू ब्याज दर देख सकेगा।
एक और अहम बदलाव यह है कि एक ही तरह की जमा पर एक ही दिन स्वीकार की गई रकम के लिए घोषित दर ही लागू होनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि केवल अलग शाखा या अलग माध्यम से जमा कराने पर ब्याज दर मनमाने तरीके से अलग नहीं होनी चाहिए। इससे बड़े जमाकर्ताओं को अलग-अलग बैंकों की दरों की तुलना करने में आसानी हो सकती है।
हालांकि, नए नियमों का यह मतलब नहीं है कि किसी बैंक को हर बड़ी जमा पर एक ही ब्याज दर देनी होगी। बैंकों को कुछ परिस्थितियों में अलग दर देने की अनुमति बनी रहेगी। खास तौर पर जमा की नकदी जरूरत से जुड़े अंतर के आधार पर दरों में बदलाव संभव होगा।
यह मामला तरलता कवरेज अनुपात से जुड़ा है। आसान भाषा में समझें तो बैंकों को अचानक होने वाली निकासी और दूसरी नकदी जरूरतों से निपटने के लिए पर्याप्त आसानी से उपलब्ध संपत्ति रखनी होती है। अलग-अलग प्रकार की जमाओं का इस व्यवस्था में अलग असर हो सकता है। इसी वजह से बैंक कुछ जमाओं के लिए अलग ब्याज दर तय कर सकते हैं।
सामान्य फिक्स्ड डिपॉजिट कराने वाले ग्राहकों के लिए तत्काल बदलाव बहुत कम हैं। उदाहरण के लिए 1 लाख, 5 लाख या 25 लाख रुपये जमा करने वाले ग्राहक को हर सुबह बैंक की वेबसाइट पर बड़ी जमा की दर देखने की जरूरत नहीं होगी। बता दें कि नए नियम मुख्य रूप से 3 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा की जमा पर लागू होंगे।
मौजूद जानकारी के अनुसार, बड़े निवेशकों के लिए 1 अक्टूबर के बाद फिक्स्ड डिपॉजिट कराने से पहले बैंक की वेबसाइट पर घोषित ब्याज दर देखना उपयोगी रहेगा। जिस दिन जमा कराई जा रही है, उस दिन की दर का स्क्रीनशॉट या कोई रिकॉर्ड सुरक्षित रखना भी बेहतर हो सकता है। इसके बाद जमा रसीद और दूसरे दस्तावेजों में दर्ज ब्याज दर की जांच की जा सकती है।
इस बदलाव से कई करोड़ रुपये बैंक में रखने वाले ग्राहकों को पैसा जमा करने से पहले उपलब्ध ब्याज दर साफ तौर पर देखने का मौका मिलेगा। वहीं आम फिक्स्ड डिपॉजिट ग्राहकों के लिए बैंक की मौजूदा व्यवस्था में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव नहीं होने वाला है।
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