दवाओं की एमआरपी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, जनहित याचिका पर 5 अक्टूबर को अगली सुनवाई
नई दिल्ली, 29 सितंबर (आईएएनएस)। दवाओं की कीमत और एमआरपी तय करने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान पिटीशनर और वकील किशन चंद जैन ने मामले से जुड़े प्रमुख बिंदुओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह जनहित याचिका वर्ष 2003 में दायर की गई थी, जिसमें जेनेरिक दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन और दवाओं की कीमत निर्धारित करने से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे।
किशन चंद जैन ने बताया कि जनहित याचिका में दो मुख्य मुद्दे उठाए गए थे। पहला, प्रत्येक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा जेनेरिक मेडिसिन लिखे जाने का विषय था। दूसरा मुद्दा दवाओं की एमआरपी और उनकी कीमत तय करने की प्रक्रिया से संबंधित था। उन्होंने बताया कि ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) 2013 के तहत दवाओं को शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल कैटेगरी में बांटा गया है। शेड्यूल दवाओं की कीमत निर्धारित करने का काम नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी करती है और इसमें रिटेलर के लिए 16 प्रतिशत मार्जिन का प्रावधान है।
जैन ने कहा कि बाजार में बड़ी संख्या में दवाएं नॉन-शेड्यूल कैटेगरी में आती हैं और इनकी कीमत निर्धारित करने पर उसी तरह का नियंत्रण नहीं है। उन्होंने दावा किया कि निर्माता अपनी दवाओं की एमआरपी काफी अधिक तय कर सकते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई दवा बाजार में 10 रुपए में उपलब्ध है तो उसकी एमआरपी 100 रुपए तक रखी जा सकती है। इससे खास तौर पर उन अस्पतालों में मरीजों को आर्थिक नुकसान होता है, जहां एमआरपी के आधार पर बिलिंग की जाती है। सरकार की ओर से किसी तरह का रीइंबर्समेंट होने की स्थिति में भी अधिक भुगतान का असर पड़ सकता है।
किशन चंद जैन ने बताया कि सुनवाई के दौरान कोर्ट की ओर से यह ऑब्जर्वेशन सामने आया कि रिटेलर के लिए कीमत पर रिटेलर का 16 प्रतिशत मार्जिन जोड़कर एमआरपी निर्धारित करने की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का मुद्दा लंबे समय से अदालत के सामने है और सरकार की ओर से भी इस दिशा में प्रयास किए जाते रहे हैं।
जैन ने बताया कि सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से कहा गया कि वह प्रस्ताव का विरोध नहीं कर रही है, लेकिन अधिकारियों से चर्चा कर ऐसा रास्ता निकालना चाहती है जिससे दवाओं की एमआरपी उचित तरीके से निर्धारित की जा सके। कोर्ट ने मामले को आवश्यक बताते हुए इसे जल्द तय करने की बात कही है। मामले में अगली सुनवाई के लिए 5 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की गई है।
किशन चंद जैन ने बताया कि उन्होंने अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा कि दवा शेड्यूल हो या नॉन-शेड्यूल, दोनों को आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आवश्यक वस्तु माना जाना चाहिए। उन्होंने मेडिकल डिवाइसेज का भी उल्लेख करते हुए कहा कि ग्लव्स, इंजेक्शन और अन्य मेडिकल सामान भी आवश्यक वस्तुओं के दायरे में आते हैं। अदालत ने इस तर्क पर सहमति जताई कि यदि सभी दवाएं आवश्यक वस्तु अधिनियम की परिधि में आती हैं तो फिर शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल दवाओं के बीच कीमत नियंत्रण को लेकर अलग-अलग व्यवस्था का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए।
अब मामले में 5 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में दवाओं की एमआरपी निर्धारित करने की व्यवस्था और कीमत नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर आगे की सुनवाई होगी।
--आईएएनएस
पीएसके
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JMB के ऑफशूट की आतंकी साजिश का खुलासा, NIA ने 13 आरोपियों को किया गिरफ्तार
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) के एक ऑफशूट संगठन द्वारा पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकी नेटवर्क फैलाने की साजिश के मामले में बड़ी कार्रवाई की है. NIA ने मंगलवार को असम, पश्चिम बंगाल और केरल में 16 ठिकानों पर छापेमारी की. इस कार्रवाई के दौरान कुल 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है.
NIA के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपियों में 8 असम, 4 पश्चिम बंगाल और 1 आरोपी केरल से पकड़ा गया है. तलाशी के दौरान आरोपियों के कब्जे से मोबाइल फोन, पेन ड्राइव और मेमोरी कार्ड समेत कई डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं.
ऑनलाइन कट्टरपंथ फैलाने के मामले से जुड़ा है केस
यह मामला दिसंबर 2025 में असम पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई से शुरू हुआ था. 28 दिसंबर 2025 को असम पुलिस ने असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के अलग-अलग जिलों से 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया था. इसके बाद STF पुलिस स्टेशन में 30 दिसंबर 2025 को केस नंबर 06/2025 दर्ज किया गया. जांच में सामने आया कि बांग्लादेश में बैठे हैंडलर्स कथित तौर पर ‘Purva Akash’ नाम के टेलीग्राम ग्रुप के जरिए ऑनलाइन कट्टरपंथ फैलाने का मॉड्यूल चला रहे थे.
इस मामले में कुल 35 आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया गया था. गिरफ्तार किए गए शुरुआती 11 आरोपियों के खिलाफ 25 जून 2026 को चार्जशीट दाखिल की गई थी और वे फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं.
बाद में NIA ने इस मामले की जांच अपने हाथ में ले ली. एजेंसी ने इन 11 आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की विभिन्न धाराओं के तहत गुवाहाटी स्थित NIA की विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की.
IMK के जरिए JMB का नेटवर्क बढ़ाने की साजिश का आरोप
NIA की जांच के अनुसार, आरोपी इमाम महमूदेर काफिला (IMK) नाम के संगठन से जुड़े आतंकी षड्यंत्र में सक्रिय रूप से शामिल थे. जांच एजेंसी का कहना है कि IMK प्रतिबंधित आतंकी संगठन JMB का एक स्वरूप/ऑफशूट है और इसका उद्देश्य पश्चिम बंगाल तथा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में संगठन की विचारधारा और नेटवर्क का विस्तार करना था.
जांच में यह भी सामने आने का दावा किया गया है कि JMB के वरिष्ठ सदस्य इमाम महमूद हबीबुल्लाह ने भारत में प्रतिबंधित संगठन के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए IMK की स्थापना की थी. NIA के अनुसार, इस साजिश के तहत युवाओं को कट्टरपंथ की ओर आकर्षित करने, आतंकी संगठन के चरमपंथी एजेंडे को बढ़ावा देने और भारत में संगठन का नेटवर्क मजबूत करने की कोशिश की जा रही थी.
गुप्त बैठक और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल
NIA की जांच में आरोपियों द्वारा कथित तौर पर गुप्त बैठकें आयोजित करने, धार्मिक कट्टरपंथी विचारों से प्रभावित करने वाले कार्यक्रम चलाने और चरमपंथी साहित्य का प्रसार करने की बात सामने आई है. जांच एजेंसी का आरोप है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भारत विरोधी प्रचार के लिए भी किया जा रहा था. इसके अलावा आरोपियों द्वारा IMK/JMB के नेतृत्व के प्रति निष्ठा को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही थी.
10 आरोपी अभी भी फरार
NIA के मुताबिक, इस मामले में अभी 10 आरोपी फरार हैं. इनमें एक भारतीय नागरिक और 9 बांग्लादेशी नागरिक शामिल हैं. मामले की जांच RC-01/2026/NIA/GUW के तहत जारी है. NIA फरार आरोपियों की भूमिका और भारत में JMB के इस कथित नेटवर्क के विस्तार से जुड़े अन्य पहलुओं की भी जांच कर रही है.
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