मणिपुर में हाईवे की नाकेबंदी हटने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका निपटाई, जरूरी सामान की सप्लाई बहाल
मणिपुर में राष्ट्रीय राजमार्गों पर नाकेबंदी हटाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कुकी वूमेन ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स की याचिका का निपटारा कर दिया है. संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कुकी-जो बहुल इलाकों में लंबे समय से जारी आर्थिक नाकेबंदी को खत्म कराने और जरूरी सामान की आपूर्ति सामान्य कराने की मांग की थी. मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की. सुनवाई के दौरान मणिपुर सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि राष्ट्रीय राजमार्ग-2 से नाकेबंदी हटा दी गई है और रास्ता खोल दिया गया है. सरकार की ओर से स्थिति रिपोर्ट भी अदालत में दाखिल की गई.
सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, NH-2 पर आवाजाही बहाल होने के साथ प्रभावित इलाकों में जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति भी दोबारा शुरू हो गई है. अदालत को यह भी बताया गया कि दूसरे राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से भी नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया चल रही है. इन घटनाक्रमों के बाद याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने माना कि मौजूदा परिस्थितियों में याचिका पर आगे आदेश की आवश्यकता नहीं रह गई है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को निपटा दिया. दरअसल, कुकी वूमेन ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. संगठन ने आरोप लगाया था कि मणिपुर के कांगपोकपी जिले के कुकी-जो आबादी वाले इलाकों में लंबे समय से जारी नाकेबंदी की वजह से आम लोगों को भोजन, ईंधन और दवाइयों जैसी जरूरी चीजों की कमी का सामना करना पड़ रहा है.
याचिका में राष्ट्रीय राजमार्ग-2 को विशेष तौर पर महत्वपूर्ण बताया गया था। यह मार्ग इंफाल को दीमापुर से जोड़ता है और मणिपुर में आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही के लिए अहम रास्तों में शामिल है. याचिकाकर्ता के मुताबिक, सड़क मार्ग बाधित होने से प्रभावित इलाकों तक जरूरी सामान पहुंचाने में मुश्किलें पैदा हो रही थीं. मामले की पिछली सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने हाईवे बंद रहने के आम लोगों पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई थी। अगस्त में अदालत ने मणिपुर के विभिन्न पक्षों से सभी बंद राजमार्गों को दोबारा खोलने के लिए एक व्यापक प्रस्ताव तैयार करने को कहा था. अदालत ने उस दौरान यह भी कहा था कि राजमार्ग आम लोगों के लिए जीवनरेखा की तरह हैं और नाकेबंदी से किसी भी पक्ष को लाभ नहीं होता.
पीठ ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि मामले में सीधे और व्यापक निर्देश देने से पहले जमीन पर मौजूद परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है. अदालत ने आशंका जताई थी कि अगर राज्य की ओर से किसी तरह का हस्तक्षेप हिंसक प्रतिक्रिया का कारण बनता है तो इसका असर निर्दोष लोगों पर पड़ सकता है. इसलिए कोर्ट ने संबंधित पक्षों से व्यावहारिक समाधान का प्रस्ताव देने को कहा था. कुकी संगठन की याचिका में यह भी कहा गया था कि कथित आर्थिक नाकेबंदी ने आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को प्रभावित किया. संगठन के मुताबिक, खाद्य सामग्री, पेट्रोलियम उत्पाद और दवाओं की आपूर्ति बाधित होने से मानवीय संकट जैसी स्थिति पैदा हुई. हालांकि, ये याचिका में लगाए गए आरोप थे और अदालत ने मौजूदा स्थिति को देखते हुए याचिका का निपटारा किया है.
दरअसल रिपोर्ट के अनुसार, नाकेबंदी से जुड़े घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में मई 2026 में हुई हिंसक घटनाएं भी थीं. 13 मई को कांगपोकपी जिले में कुकी-जो समुदाय से जुड़े चर्च नेताओं के एक समूह पर कथित घात लगाकर हमला किया गया था, जिसमें तीन लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की बात सामने आई थी. इसके बाद इलाके में तनाव बढ़ा और विभिन्न मार्गों पर नाकेबंदी से जुड़ी स्थिति बनी. अब मणिपुर सरकार की ओर से NH-2 खुलने और जरूरी सामान की सप्लाई बहाल होने की जानकारी मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को समाप्त कर दिया है. हालांकि, दूसरे राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया को लेकर सरकार की स्थिति रिपोर्ट में दी गई जानकारी महत्वपूर्ण रहेगी,
बहराइच की 7 सीटों का क्या है चुनावी इतिहास? जानिए किसका रहा दबदबा
UP Election 2027: यूपी में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, जिसको लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है. यूपी के प्रमुख जिलों में बहराइच भी शामिल है. यहां विधानसभा की बलहा , नानपारा, म मटेरा, महसी, बहराइच, पयागपुर और कैसरगंज समेत सात सीटें आती है. आपको बता दें कि बहराइच विधानसभा सीट पर लंबे समय तक समाजवादी पार्टी (SP) का मजबूत प्रभाव रहा है, जिसे सपा के कद्दावर नेता डॉ. वकार अहमद शाह का गढ़ माना जाता था. हालांकि, हाल के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने यहां अपनी मजबूत पकड़ बनाई है. आइए जानते हैं बहराइच विधानसभा के बारे में.
बलहा विधानसभा का इतिहास
बलहा विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित है. यह सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है और बहराइच लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है. यह सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई. इससे पहले यह क्षेत्र अलग-अलग सीमाओं में था. यहां दलित मतदाताओं की अच्छी संख्या है, इसलिए पहले BSP की मजबूत पकड़ मानी जाती थी, लेकिन बाद में BJP ने यहां अपनी जगह बना ली.
सीट का इतिहास मुख्य रूप से 2012 से उपलब्ध है (परिसीमन के बाद):
| वर्ष | विधायक | पार्टी | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 2012 | सावित्री बाई फुले | BJP | पहली जीत, BSP के किरन भारती को हराया |
| 2014 (उपचुनाव) | बंशीधर बौद्ध | SP | सावित्री बाई फुले के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद रिक्त हुई सीट |
| 2017 | अक्षयबर लाल (अक्षयवर लाल) | BJP | BSP के किरन भारती को बड़े अंतर से हराया |
| 2019 (उपचुनाव) | सरोज सोनकर | BJP | अक्षयबर लाल के निधन/रिक्ति के बाद |
| 2022 | सरोज सोनकर | BJP | SP को हराकर फिर जीत |
2022 में सरोज सोनकर (BJP) ने 1,00,483 वोट (लगभग 46.8%) हासिल किए और SP के अक्षयबर नाथ कनौजिया को करीब 16,573 वोटों से हराया। BSP तीसरे स्थान पर रही. 2017 में BJP को 51% से अधिक वोट मिले. 2012 में BJP ने करीब 33% वोटों के साथ जीत हासिल की.
किस पार्टी का गढ़?
BJP का गढ़ बन चुका है. परिसीमन के बाद से BJP ने 2012, 2017, 2019 (उपचुनाव) और 2022 में जीत हासिल की है. केवल 2014 के उपचुनाव में SP जीती थी. पहले BSP यहां प्रतिस्पर्धी रही (खासकर दलित वोटों की वजह से), लेकिन 2017 के बाद BJP की पकड़ मजबूत हुई है। SP भी समय-समय पर चुनौती देती रही है. बलहा एक अपेक्षाकृत नई (2008 के बाद) SC आरक्षित सीट है, जहां दलित मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. पिछले एक दशक में BJP ने इसे अपना मजबूत क्षेत्र बना लिया है. वर्तमान में सरोज सोनकर यहां की विधायक हैं.
नानपारा विधानसभा सीट का इतिहास
नानपारा विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित है. यह सामान्य श्रेणी की सीट है और बहराइच लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है. 2008 के परिसीमन के बाद इसका नंबर 283 है. इस सीट पर वर्तमान में विधायक राम निवास वर्मा (अपना दल (सोनेलाल) 2022 में चुने गए. BJP गठबंधन (NDA) के हिस्से के रूप में. यह सीट पुरानी है और 1950-60 के दशक से अस्तित्व में है. पहले यहां CPI (कम्युनिस्ट पार्टी) का प्रभाव रहा, फिर BJP, BSP, कांग्रेस और अन्य पार्टियां बारी-बारी से जीतीं. दिलचस्प बात यह है कि समाजवादी पार्टी (SP) ने 1977 से 2017 तक कभी इस सीट पर जीत नहीं हासिल की (2022 में माधुरी वर्मा SP से लड़ीं लेकिन हार गईं). 2022 में अपना दल प्रत्याशी राम निवास वर्मा को 87,689 वोट (लगभग 43.9%), वहीं समाजवादी प्रत्याशी माधुरी वर्मा को 75,505 वोट मिले.
| वर्ष | विधायक | पार्टी | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 2022 | राम निवास वर्मा | AD(S) | SP की माधुरी वर्मा को ~12,184 वोटों से हराया |
| 2017 | माधुरी वर्मा | BJP | कांग्रेस के वारिस अली को ~18,669 वोटों से हराया |
| 2012 | माधुरी वर्मा | INC (कांग्रेस) | BSP के वारिस अली को हराया |
| 2007 | वारिस अली | BSP | BJP के जटा शंकर सिंह को हराया |
| 2002 | जटा शंकर सिंह | BJP | BSP के वारिस अली को कड़ी टक्कर देकर जीते |
| 1996 | जटा शंकर सिंह | BJP | - |
| 1993 | फजलुर रहमान अंसारी | BSP | BJP को हराया |
| 1991 | जय शंकर सिंह / जटा शंकर | BJP | राम मंदिर लहर के दौरान |
| 1989 | देवता दीन | JD (जनता दल) | - |
| 1985 | देवता दीन | INC | - |
| 1980 | जटा शंकर सिंह | BJP | - |
| 1977 | फजलुर रहमान अंसारी | CPI | - |
| 1974 | फजलुर रहमान | CPI | - |
किस पार्टी का गढ़?
BJP ने यहां कई बार जीत (1980, 1991, 1996, 2002, 2017) हासिल की है. जटा शंकर सिंह लंबे समय तक BJP के प्रमुख चेहरे रहे. 2017 में माधुरी वर्मा (जो पहले कांग्रेस से जीती थीं) BJP में शामिल होकर जीतीं. BSP ने 1993 और 2007 में जीत दर्ज की. कांग्रेस ने 1985 और 2012 में जीत हासिल की. CPI का शुरुआती प्रभाव (1970 के दशक) रहा. 2022 में BJP की सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने जीत हासिल की. कुल मिलाकर, BJP और उसके सहयोगी हाल के वर्षों में मजबूत रहे हैं, लेकिन सीट किसी एक दल का “किला” नहीं रही. नानपारा बहराइच की एक महत्वपूर्ण और पुरानी सामान्य श्रेणी की सीट है. यहां राजनीतिक उतार-चढ़ाव ज्यादा रहे हैं. वर्तमान में अपना दल (सोनेलाल) के राम निवास वर्मा विधायक हैं.
मटेरा विधानसभा सीट का इतिहास
मटेरा विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित है. यह सामान्य श्रेणी की सीट है और बहराइच लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है. यह सीट 2008 के परिसीमन के बाद नई बनी. इससे पहले यह क्षेत्र मुख्य रूप से चरदा विधानसभा सीट का हिस्सा था, जिसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया. चरदा के बड़े हिस्से और नानपारा के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर मटेरा बनाया गया. पहला चुनाव 2012 में हुआ.
| वर्ष | विधायक | पार्टी | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 2012 | यासर शाह | SP | कांग्रेस के अली अकबर को ~2,801 वोटों से हराया (पहला चुनाव) |
| 2017 | यासर शाह | SP | BJP के अरुण वीर सिंह को सिर्फ ~1,595 वोटों के बेहद करीबी अंतर से हराया |
| 2022 | मारिया शाह | SP | BJP के अरुण वीर सिंह को ~10,428 वोटों से हराया |
चुनाव इतिहास और विधायक
मटेरा पर अब तक तीन चुनाव हुए हैं, और तीनों बार समाजवादी पार्टी (SP) जीती है. 2022 में मारिया शाह (SP) ने 1,02,255 वोट (लगभग 48.15%) हासिल किए. BJP के अरुण वीर सिंह को 91,827 वोट मिले. 2017 में मोदी लहर के बावजूद SP ने यह सीट बचाई, जबकि बहराइच की ज्यादातर सीटें BJP के पास चली गईं. यासर शाह दो बार विधायक रहे, और 2022 में उनकी पत्नी मारिया शाह जीतीं.
समाजवादी पार्टी (SP) का मजबूत गढ़ है. सीट के अस्तित्व में आने के बाद से SP ने लगातार तीन बार जीत हासिल की है. BJP यहां मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी रही है (खासकर 2017 और 2022 में करीबी मुकाबला), लेकिन अभी तक जीत नहीं पाई. BSP और कांग्रेस भी प्रतिस्पर्धा करती रही हैं, लेकिन SP का दबदबा कायम है. पुरानी चरदा सीट पर भी 1990 के दशक से SP का प्रभाव रहा था. मटेरा बहराइच की एक अपेक्षाकृत नई सामान्य श्रेणी की सीट है, जो SP का विश्वसनीय क्षेत्र बन चुकी है. यासर शाह और उनकी पत्नी मारिया शाह के परिवार का यहां मजबूत प्रभाव है. वर्तमान में मारिया शाह विधायक हैं.
महसी विधानसभा सीट का इतिहास
महसी विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित है. यह सामान्य श्रेणी की सीट है और बहराइच लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है. यह सीट 1970 के दशक से अस्तित्व में है (पहला चुनाव 1974)। महसी तहसील और आसपास के क्षेत्रों को कवर करती है। सुरेश्वर सिंह का परिवार यहां लंबे समय से सक्रिय रहा है—उनके पिता सुखद राज सिंह भी पहले विधायक रह चुके हैं.
| वर्ष | विधायक | पार्टी | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 2022 | सुरेश्वर सिंह | BJP | SP के कृष्ण कुमार ओझा को ~42,684 वोटों से हराया |
| 2017 | सुरेश्वर सिंह | BJP | कांग्रेस के अली अकबर को ~58,969 वोटों के बड़े अंतर से हराया |
| 2012 | कृष्ण कुमार ओझा | BSP | BJP के सुरेश्वर सिंह को करीब 2,489 वोटों से हराया |
| 2007 | सुरेश्वर सिंह | BJP | BSP के अली अकबर को सिर्फ 441 वोटों से हराया |
| 2002 | अली बहादुर | BSP | - |
| 2003 (उपचुनाव) | दिलीप कुमार वर्मा | SP | अली बहादुर के निधन के बाद |
| 1996 | दिलीप कुमार | SP | - |
| 1993 | दिलीप कुमार वर्मा | SP | - |
| 1991 | नीलम सिंह | BJP | सुखद राज सिंह की पत्नी |
| 1989/85/80 | इंद्र प्रताप सिंह | INC | तीन बार जीते |
| 1977 | सुखद राज सिंह | JNP | - |
| 1974 | सुखद राज सिंह | BJS | पहली बार |
किस पार्टी का गढ़?
हाल के वर्षों में BJP का मजबूत गढ़ बन चुका है. सुरेश्वर सिंह ने 2007, 2017 और 2022 में जीत हासिल की (2012 में हारे थे). 1990 के दशक में SP का प्रभाव रहा, 2000 के दशक में BSP ने भी जीत दर्ज की. 1980 के दशक में कांग्रेस का दबदबा था. परिवारिक राजनीति (सुखद राज सिंह → नीलम सिंह → सुरेश्वर सिंह) यहां महत्वपूर्ण रही है. कुल मिलाकर, BJP ने पिछले दो चुनावों में बड़े अंतर से जीत हासिल कर इसे अपना क्षेत्र बना लिया है. महसी बहराइच की एक पुरानी सामान्य श्रेणी की सीट है, जहां राजनीतिक बदलाव देखने को मिले हैं. वर्तमान में BJP के सुरेश्वर सिंह विधायक हैं और पार्टी की पकड़ मजबूत है.
बहराइच विधानसभा का इतिहास
बहराइच विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की मुख्य सीट है. यह सामान्य श्रेणी की सीट है और बहराइच लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है. यह सीट जिले का शहरी-ग्रामीण मिश्रित क्षेत्र कवर करती है. शुरुआती वर्षों में यह बहराइच पूर्व/पश्चिम या उत्तर/दक्षिण के रूप में विभाजित थी. 1967 के बाद एकीकृत बहराइच सीट बनी.
किस पार्टी का गढ़?
पहले लंबे समय तक समाजवादी पार्टी (SP) का गढ़ रहा, अब BJP ने कब्जा कर लिया है. डॉ. वकार अहमद शाह ने 1993 से 2012 तक पांच बार लगातार जीत हासिल की. यह SP का मजबूत गढ़ था. 2017 में BJP की अनुपमा जायसवाल ने वकार शाह के परिवार (पत्नी रूबाब सैयदा) को हराकर सीट छीन ली. 2022 में उन्होंने फिर जीत हासिल की (यासर शाह के खिलाफ). 1990 के दशक से पहले कांग्रेस और BJP/जनसंघ का प्रभाव रहा. कुल मिलाकर, 1990-2010 के दशक में SP का दबदबा था, लेकिन 2017 के बाद BJP ने इसे अपना क्षेत्र बना लिया है। मुकाबला अक्सर करीबी रहता है. बहराइच जिले की प्रमुख विधानसभा सीट है, जहां लंबे समय तक वकार अहमद शाह परिवार का प्रभाव रहा. वर्तमान में BJP की अनुपमा जायसवाल विधायक हैं.
| वर्ष | विधायक | पार्टी | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 2022 | अनुपमा जायसवाल | BJP | SP के यासर शाह को ~4,078 वोटों के करीबी अंतर से हराया |
| 2017 | अनुपमा जायसवाल | BJP | SP की रूबाब सैयदा को ~6,702 वोटों से हराया |
| 2012 | डॉ. वकार अहमद शाह | SP | कांग्रेस को हराया |
| 2007 | डॉ. वकार अहमद शाह | SP | BSP को हराया |
| 2002 | डॉ. वकार अहमद शाह | SP | - |
| 1996 | वकार अहमद शाह | SP | - |
| 1993 | वकार अहमद शाह | SP | - |
| 1991 | बृज राज त्रिपाठी | BJP | - |
| 1989 | धर्मपाल | INC | - |
| 1985 | महारन नाथ कौल | INC | - |
| 1980 | धर्मपाल | BJP | - |
| 1977 | खान मोहम्मद आतिफ खान | JNP | - |
पयागपुर विधानसभा सीट का इतिहास
पयागपुर विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित है. यह सामान्य श्रेणी की सीट है और कैसरगंज लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है. यह सीट 2008 के परिसीमन के बाद नई बनी. बहराइच सदर, कैसरगंज और पुरानी फखरपुर विधानसभा के कुछ इलाकों को मिलाकर इसका गठन हुआ. 2022 में सुभाष त्रिपाठी (BJP) ने 1,10,162 वोट (लगभग 47.77%) हासिल किए। SP के मुकेश श्रीवास्तव को 98,106 वोट मिले. मुकेश श्रीवास्तव 2012 में कांग्रेस से जीते थे, बाद में SP में शामिल हो गए और दोनों बार BJP से हारे.
किस पार्टी का गढ़?
हाल के वर्षों में BJP का गढ़ बन चुका है. इस सीट पर पहला चुनाव 2012 में हुआ. 2012 में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी. 2017 और 2022 में BJP के सुभाष त्रिपाठी ने लगातार जीत दर्ज की. SP यहां मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी रही है, लेकिन अभी तक जीत नहीं पाई. कुल मिलाकर, 2017 के बाद BJP ने इसे अपना मजबूत क्षेत्र बना लिया है. पयागपुर बहराइच की एक अपेक्षाकृत नई सामान्य श्रेणी की सीट है। वर्तमान में BJP के सुभाष त्रिपाठी विधायक हैं.
| वर्ष | विधायक | पार्टी | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 2012 | मुकेश श्रीवास्तव (उर्फ ज्ञानेंद्र प्रताप) | INC (कांग्रेस) | BSP के अजीत प्रताप सिंह को ~27,000 वोटों से हराया (पहला चुनाव) |
| 2017 | सुभाष त्रिपाठी | BJP | SP के मुकेश श्रीवास्तव को ~41,541 वोटों के बड़े अंतर से हराया |
| 2022 | सुभाष त्रिपाठी | BJP | SP के मुकेश श्रीवास्तव को ~12,056 वोटों से हराया |
कैसरगंज विधानसभा सीट का इतिहास
कैसरगंज विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित है. यह सीट बहराइच और गोंडा जिले की सीमाओं को प्रभावित करने वाली राज्य की सबसे हाई-प्रोफाइल और चर्चित सीटों में से एक है. राजनीतिक रूप से यह निर्वाचन क्षेत्र कैसरगंज लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है, जो कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कद्दावर नेता बृजभूषण शरण सिंह और उनके परिवार का मजबूत प्रभाव क्षेत्र माना जाता है.
कैसरगंज विधानसभा: किसका रहा है गढ़?
कैसरगंज विधानसभा का चुनावी इतिहास मिला-जुला रहा है और इसे किसी एक पार्टी का स्थायी गढ़ नहीं कहा जा सकता. यहां समय-समय पर मतदाताओं ने परिवर्तन को चुना है: सपा और भाजपा के बीच मुकाबला: हालिया दशकों में मुख्य लड़ाई भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच सिमट कर रह गई है. बृजभूषण शरण सिंह का प्रभाव: भले ही यह विधानसभा सीट अलग हो, लेकिन लोकसभा स्तर पर बृजभूषण शरण सिंह के व्यक्तिगत प्रभाव के कारण इसे भाजपा का प्रभाव-क्षेत्र माना जाता रहा है. हालांकि, विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी यहां भाजपा को कड़ी टक्कर देती आई है और वर्तमान में यहां सपा का ही कब्जा है.
• शुरुआती दौर: 1977 में यहां पहली बार जनता पार्टी के बाबू लाल वर्मा जीते थे। इसके बाद 1980 और 1985 में कांग्रेस ने वापसी की.
• भाजपा की पहली जीत: राम मंदिर लहर के दौरान 1991 में पहली बार भाजपा के रुद्रेंद्र विक्रम सिंह ने यहाँ कमल खिलाया.
• सपा की धमक: 1993 के ऐतिहासिक चुनाव में समाजवादी पार्टी के रामतेज ने भाजपा को हराकर यह सीट सपा के खाते में डाली.
• बसपा का खाता: 2007 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर यहां से चुनाव जीता गया था.
• भाजपा की वापसी: 2012 के विधानसभा चुनाव और फिर 2017 के चुनाव में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुकुट बिहारी वर्मा ने लगातार दो बार यहां से शानदार जीत दर्ज कर इसे भाजपा का मजबूत किला बना दिया था.
• 2022 का बड़ा उलटफेर: 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की हैट्रिक लगाने की उम्मीदों को करारा झटका लगा। समाजवादी पार्टी (SP) के आनंद कुमार यादव ने 1,03,135 वोट हासिल कर भाजपा के गौरव वर्मा (मुकुट बिहारी के बेटे) को बेहद करीबी मुकाबले में हरा दिया.
| वर्ष | विजेता | पार्टी | मुख्य बात / अंतर |
|---|---|---|---|
| 1951/52 | सियाराम | कांग्रेस | कैसरगंज सेंट्रल |
| 1957 | हुकुम सिंह | कांग्रेस | पहली स्पष्ट जीत (निर्दलीय को हराया) |
| 1962 | हुकुम सिंह विसेन | कांग्रेस | दोबारा जीत |
| 1967 | डी. सिंह | भारतीय जनसंघ | पहली बार जनसंघ की जीत |
| 1969 | भगवती सिंह | कांग्रेस | वापसी |
| 1974 | बाबू लाल वर्मा | भारतीय जनसंघ | - |
| 1977 | बाबू लाल वर्मा | जनता पार्टी | आपातकाल के बाद |
| 1980 | सुंदर सिंह | कांग्रेस (I) | - |
| 1985 | एहतिशाम वली खान | कांग्रेस | - |
| 1989 | रामतेज यादव | लोकदल (बी) | बहुत कम अंतर से |
| 1991 | रुदेन्द्र विक्रम सिंह | भाजपा | राम मंदिर लहर |
| 1993 | रामतेज यादव | समाजवादी पार्टी | - |
| 1996 | रामतेज यादव | समाजवादी पार्टी | बहुत कम अंतर (234 वोट) |
| 2002 | मुकुट बिहारी वर्मा | भाजपा | - |
| 2007 | गुलाम मोहम्मद खान | बसपा | बसपा की एकमात्र जीत |
| 2012 | मुकुट बिहारी वर्मा | भाजपा | - |
| 2017 | मुकुट बिहारी | भाजपा | 27,363 वोटों से जीत |
| 2022 | आनंद कुमार यादव | समाजवादी पार्टी | 7,711 वोटों से जीत (भाजपा की हैट्रिक रोकी) |
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