बकरियाँ चराने वाले बालक से पद्म श्री तक, अलगोजा के सुरों में बसी तगाराम भील की संघर्षगाथा
जैसलमेर की स्वर्ण नगरी के मूलसागर गांव से निकलकर दुनिया के मंचों तक अलगोजा की मधुर सुर-लहरियां बिखेरने वाले प्रसिद्ध लोक वादक तगाराम भील को कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई है. बचपन में अभावों के बीच बकरियां चराने और जंगलों में चोरी-छुपे रियाज़ करने वाले तगाराम ने अपनी साधना से अलगोजा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. वर्ष 1981 में पहली बार मंच पर प्रस्तुति देने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अब तक 35 से अधिक देशों में राजस्थान की लोकसंस्कृति का परचम लहराया है.
Fish farming: पंगेसियस मछली का करें पालन, कम मेहनत, ज्यादा मुनाफा; साल में दो बार होगी कमाई
Pangasius fish farming: आज के समय में मछली पालन का व्यवसाय तेजी से किसानों और युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि इसमें लागत कम और मुनाफा अधिक होता है. बाजार में मछली की मांग सालभर बनी रहती है और सरकार भी मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए अनुदान देती है. बाराबंकी जिले के रसूलपुर गांव निवासी संतोष कुमार ने छोटे तालाब से मछली पालन शुरू किया और आज 3-4 तालाबों में पंगेसियस मछली का पालन कर रहे है. संतोष कुमार के अनुसार एक तालाब में करीब 2.5 से 3 लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि 6 महीने में 5-6 लाख रुपये तक की बचत हो जाती है. पंगेशियस मछली जल्दी तैयार होती है और इसकी मांग अधिक होने से व्यापारी खुद तालाब पर आकर खरीद करते है.
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