रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने फिलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास का क्रेमलिन में जिस तरह स्वागत किया, उसने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। पुतिन ने सामान्य राजनयिक प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए पारंपरिक अरब शैली में अब्बास का अभिनंदन किया और इस तरह सामान्य राजनयिक प्रोटोकॉल को तोड़ दिया। देखा जाये तो आम तौर पर राष्ट्राध्यक्षों के स्वागत में औपचारिकता और दूरी बरती जाती है, लेकिन यहां गर्मजोशी और सांस्कृतिक सम्मान का संदेश दिया गया। सोशल मीडिया पर इस दृश्य ने जबरदस्त चर्चा पैदा की।
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने गाजा, फिलस्तीन और पूरे क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर गहन बातचीत की। पुतिन ने स्पष्ट किया कि रूस फिलस्तीनियों के हितों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाने को तैयार है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि रूस गाजा के पुनर्निर्माण और फिलस्तीनियों के समर्थन के लिए एक अरब डॉलर आवंटित करने को तैयार है। हालांकि यह राशि उस स्थिति में दी जाएगी, जब अमेरिका में फ्रीज रूसी संपत्तियों को मुक्त किया जाए।
बैठक में अब्बास ने साफ कहा कि किसी भी कीमत पर फिलस्तीनियों को उनकी जमीन से हटाने के प्रयासों को सफल नहीं होने दिया जायेगा। उन्होंने कब्जे वाले क्षेत्रों से सेनाओं की वापसी, गाजा के पुनर्निर्माण और फिलस्तीनी एकता की आवश्यकता पर जोर दिया। खास बात यह है कि यह बैठक ऐसे समय पर हुई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में बोर्ड ऑफ पीस नामक पहल के तहत गाजा के लिए एक नई शांति योजना पेश की थी।
ट्रंप की इस योजना के तहत गाजा में स्थायी संघर्षविराम, अंतरिम प्रशासन और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे के विकास का खाका खींचा गया है। लेकिन इस बोर्ड और उसकी विकास समिति से महमूद अब्बास को बाहर रखा गया है। यही वजह है कि अब्बास की मॉस्को यात्रा को वाशिंगटन की एकतरफा नीति के प्रति चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, बोर्ड ऑफ पीस में स्थायी सदस्यता के लिए एक अरब डॉलर का योगदान जरूरी है। पुतिन ने संकेत दिया कि रूस इस शर्त को स्वीकार करेगा और वह इस मंच पर शामिल होकर फिलस्तीनियों के हितों को सुरक्षित करने की कोशिश करेगा। इस बोर्ड में कई देश शामिल हुए हैं, वहीं इजराइल की मौजूदगी और कुछ अन्य देशों की भागीदारी को लेकर गाजा में विरोध भी हो रहा है। इसी बीच, रूस का हमास से संवाद और उसे मॉस्को बुलाने की नीति भी इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती है।
साथ ही महमूद अब्बास और व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत भी है। जिस समय ट्रंप दावोस में बोर्ड ऑफ पीस के जरिए खुद को गाजा संकट का मुख्य समाधानकर्ता दिखा रहे थे, उसी समय अब्बास का मॉस्को पहुंचना एक साफ संदेश देता है कि फिलस्तीन नेतृत्व खुद को हाशिये पर डाले जाने को स्वीकार नहीं करेगा।
पुतिन द्वारा प्रोटोकॉल तोड़कर अरब शैली में स्वागत करना प्रतीकात्मक कदम है। यह संकेत देता है कि रूस फिलस्तीन मुद्दे को केवल कूटनीतिक फाइल की तरह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक संदर्भ में भी देख रहा है। इससे अरब और मुस्लिम दुनिया में रूस की छवि एक संवेदनशील और सम्मानजनक शक्ति के रूप में उभरती है। यही कारण है कि इस दृश्य ने वैश्विक स्तर पर चर्चा बटोरी।
वहीं ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस प्रस्ताव देखने में विकास और शांति की बात करता है, लेकिन इसके भीतर शक्ति राजनीति की गहरी छाया है। अब्बास को बाहर रखना और इजराइल को प्रमुख भूमिका देना फिलस्तीनियों में अविश्वास पैदा करता है। पुतिन की इस बोर्ड में शामिल होने की इच्छा, वह भी फिलस्तीनियों के हितों को प्राथमिकता देने की शर्त पर, अमेरिका और पश्चिम के लिए स्पष्ट चुनौती है। यह कदम मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया को यूक्रेन युद्ध और रूस पश्चिम आर्थिक टकराव से भी जोड़ देता है।
सामरिक दृष्टि से देखें तो रूस गाजा के पुनर्निर्माण में निवेश कर वहां दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित करना चाहता है। एक अरब डॉलर की पेशकश केवल मानवीय सहायता नहीं, बल्कि रणनीतिक निवेश भी है। इससे रूस को न केवल अरब दुनिया में राजनीतिक समर्थन मिल सकता है, बल्कि भूमध्यसागर क्षेत्र में उसकी मौजूदगी भी मजबूत हो सकती है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि अब्बास ने फिलस्तीनियों के विस्थापन को सिरे से खारिज कर यह साफ कर दिया कि किसी भी शांति योजना की बुनियाद न्याय और स्वायत्तता पर ही टिक सकती है। पुतिन के साथ खड़े होकर उन्होंने यह संदेश दिया कि फिलस्तीन मुद्दा अब केवल अमेरिका के हाथ में नहीं है।
बहरहाल, ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस प्रस्ताव के बीच अब्बास की पुतिन से मुलाकात एक वैकल्पिक वैश्विक धुरी का संकेत देती है। यह बताती है कि आने वाले समय में मध्य पूर्व की राजनीति बहुध्रुवीय होगी, जहां रूस, अमेरिका और क्षेत्रीय शक्तियां एक दूसरे को संतुलित करने की कोशिश करेंगी। देखा जाये तो पुतिन का प्रोटोकॉल तोड़ना इसी नई राजनीति का प्रतीक है, जहां संकेत और प्रतीक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी नीतियां।
-नीरज कुमार दुबे
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