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उच्च राजस्व से आरबीआई की पीआईडीएफ योजना खत्म होने के असर की भरपाई होगी: पेटीएम

मुंबई, 23 जनवरी (आईएएनएस)। पेटीएम ने शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजारों को जानकारी दी कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (पीआईडीएफ) योजना के समाप्त होने से होने वाले किसी भी प्रभाव की भरपाई समय के साथ राजस्व में बढ़ोतरी और अधिक लक्षित बिक्री प्रयासों के जरिए की जा सकेगी।

स्टॉक एक्सचेंजों को दी गई जानकारी में पेटीएम की मूल कंपनी वन97 कम्युनिकेशंस लिमिटेड ने कहा कि वह फिलहाल पीआईडीएफ योजना के तहत प्रोत्साहन आय को मान्यता दे रही है, जो साउंडबॉक्स और ईडीसी मशीनों जैसे भुगतान स्वीकृति उपकरणों पर किए गए खर्च से जुड़ी है।

कंपनी ने स्पष्ट किया कि यदि यह योजना अपने मौजूदा कार्यकाल के बाद आगे नहीं बढ़ाई जाती है, तो पेटीएम को उम्मीद है कि वह उच्च राजस्व और ज्यादा केंद्रित बिक्री रणनीति के संयोजन से इसके प्रभाव की समय के साथ काफी हद तक भरपाई कर लेगी।

पीआईडीएफ योजना 31 दिसंबर 2025 तक मान्य है। इसका उद्देश्य टियर-3 से टियर-6 शहरों और पूर्वोत्तर सहित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे कम सेवा प्राप्त क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देना है।

30 सितंबर 2025 को समाप्त छह महीनों की अवधि में पेटीएम ने इस योजना के तहत 128 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन आय दर्ज की।

यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है, जब पेटीएम के वित्तीय प्रदर्शन में लगातार सुधार देखा जा रहा है। लागत नियंत्रण, ऑपरेटिंग लीवरेज और तिमाही-दर-तिमाही लाभप्रदता में सुधार से कंपनी को मजबूती मिली है।

ब्रोकरेज फर्म इन्वेस्टेक इक्विटीज ने भी शुक्रवार को ऑफलाइन भुगतान के क्षेत्र में पेटीएम की मजबूत मौजूदगी और मर्चेंट अधिग्रहण में उसकी अग्रणी भूमिका की सराहना की। रिपोर्ट के अनुसार, साउंडबॉक्स में पेटीएम की 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है, जबकि फिजिकल पीओएस में करीब 10 प्रतिशत और ऑनलाइन पेमेंट गेटवे में 15 से 20 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ कंपनी बेहतर स्थिति में है।

ब्रोकरेज ने यह भी कहा कि पेटीएम की तकनीकी क्षमताएं और व्यापारियों के साथ गहरे संबंध उसे दीर्घकालिक मूल्य निर्धारण की ताकत देते हैं और ग्राहकों के लिए स्विचिंग कॉस्ट को ऊंचा बनाते हैं।

इस खुलासे के साथ पेटीएम ने निवेशकों को आश्वस्त किया कि वह अपनी सतत विकास संभावनाओं को लेकर आश्वस्त है।

--आईएएनएस

डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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रिलीज से पहले बैन हुई थी आमिर खान की ‘रंग दे बसंती’ डायरेक्टर ने सुनाया पूरा किस्सा

Rang De Basanti 20 Years: आमिर खान की आइकॉनिक फिल्म ‘रंग दे बसंती’ को आज भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में गिना जाता है. ऑस्कर्स में ऑफिशियल एंट्री, बाफ्टा अवॉर्ड्स में नॉमिनेशन और नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भी इतिहास रचा था. हालांकि, इतनी बड़ी कामयाबी के बावजूद बहुत कम लोग जानते हैं कि रिलीज से पहले इस ब्लॉकबस्टर फिल्म को बैन का सामना करना पड़ा था.

दिल को छू लेने वाली है फिल्म की कहानी

‘रंग दे बसंती’ में आमिर खान, सिद्धार्थ, अतुल कुलकर्णी, शरमन जोशी, कुनाल कपूर, आर माधवन और ब्रिटिश एक्ट्रेस एलिस पैटन, वहीदा रहमान और सोहा अली खान अहम भूमिकाओं में नजर आए थे. फिल्म की कहानी पांच कॉलेज दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पांच स्वतंत्रता सेनानियों पर बन रही एक डॉक्युमेंट्री का हिस्सा बनते हैं. स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां इन युवाओं को इस कदर प्रभावित करती हैं कि वो मौजूदा व्यवस्था और सरकार की खामियों के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला करते हैं. यही वजह है कि फिल्म ने युवाओं के बीच जबरदस्त प्रभाव छोड़ा.

रिलीज से पहले बैन की मार झेल चुकी है फिल्म

हाल ही में फिल्म के 20 साल पूरे होने पर डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने ‘रंग दे बसंती’ की रिलीज के दौरान आई चुनौतियों पर खुलकर बात की. उन्होंने बताया कि फिल्म को पहले बैन कर दिया गया था. राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने कहा, “रंग दे बसंती को भी बैन कर दिया गया था. हमने इसका डटकर मुकाबला किया और आखिरकार सरकार ने फिल्म का मकसद समझा. उस समय के रक्षा मंत्री माननीय प्रणब मुखर्जी ने फिल्म देखी थी. दिल्ली के एक थिएटर में आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के तीनों प्रमुखों ने भी फिल्म देखी थी, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने. मामला उस स्तर तक पहुंच गया था.”

डरकर फिल्में बनाने वालों पर डायरेक्टर का बयान

डायरेक्टर ने आगे कहा कि कहानियां डर के साथ नहीं कही जानी चाहिए. उन्होंने कहा, “आप कहानियां यह सोचकर नहीं बताते कि उन्हें इजाजत मिलेगी या नहीं. अगर ऐसा सोचेंगे तो कहानियां कभी सामने नहीं आएंगी. अगर आप सिर्फ नतीजे के बारे में सोचेंगे और प्रोसेस पर ध्यान नहीं देंगे, तो सिनेमा का मकसद ही खत्म हो जाएगा. सोशल सिनेमा हमेशा रहा है और हमेशा रहेगा, क्योंकि वह समाज और नागरिकों से जुड़े मुद्दों को उठाता है.”

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