भारतीय शेयर बाजार हरे निशान में खुला, मेटल स्टॉक्स में खरीदारी
मुंबई, 23 जनवरी (आईएएनएस)। भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत शुक्रवार को सपाट हुई। सेंसेक्स 28 अंक की मामूली बढ़त के साथ 82,335 और निफ्टी 55 अंक की बढ़त के साथ 25,344 पर खुला।
शुरुआती कारोबार में मेटल और आईटी जैसे सूचकांक बाजार में तेजी का नेतृत्व कर रहे हैं। इसके अलावा हेल्थकेयर, फार्मा, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, कमोडिटीज, प्राइवेट बैंक और ऑटो हरे निशान में थे।
दूसरी तरफ, रियल्टी, एनर्जी, एफएमसीजी, पीएसयू बैंक, इंडिया डिफेंस, ऑयल एंड गैस और इन्फ्रा शेयरों के सूचकांक लाल निशान में थे।
लार्जकैप के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप में भी तेजी के साथ कारोबार हो रहा है। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 131 अंक या 0.25 अंक की तेजी के साथ 58,322 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 34 अंक या 0.20 प्रतिशत की तेजी के साथ 16,711 पर था।
सेंसेक्स पैक में टीसीएस, एचसीएल टेक, टेक महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, इन्फोसिस, कोटक महिंद्रा बैंक, मारुति सुजुकी, भारती एयरटेल, एमएंडएम, ट्रेंट, आईटीसी और एचडीएफसी बैंक गेनर्स थे। इंडिगो, पावर ग्रिड, एक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एलएंडटी और एसबीआई लूजर्स थे।
ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेजी के साथ कारोबार हो रहा है। शंघाई, टोक्यो, हांगकांग और सोल हरे निशान में थे। हालांकि, जकार्ता लाल निशान में था। अमेरिकी शेयर बाजार गुरुवार को हरे निशान में बंद हुए थे।
एफआईआई की बिकवाली और डीआईआई की खरीदारी का ट्रेंड गुरुवार को भी जारी रहा। एफआईआई ने 2,549.80 करोड़ रुपए के शेयरों की बिकवाली की, जबकि डीआईआई ने 4,222.98 करोड़ रुपए के शेयरों की खरीदारी की।
जानकारों का कहना है कि एफआईआई की बिकवाली और डीआईआई की खरीदारी का ट्रेंड 2026 में भी जारी रहने की उम्मीद है, जब तक कंपनियों के नतीजे उम्मीद से अच्छे नहीं आते या फिर सरकार की ओर से बाजार में विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए कोई नई छूट नहीं दी जाती।
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डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ से तोड़ा नाता, कोविड विफलताओं का लगाया आरोप
वाशिंगटन, 23 जनवरी (आईएएनएस)। अमेरिका ने औपचारिक रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से अपनी सदस्यता खत्म कर दी है। ट्रंप प्रशासन ने कहा कि यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले दिन किए गए वादे को पूरा करने के तहत लिया गया है।
विदेश मंत्री मार्को रुबियो और स्वास्थ्य एवं मानव सेवा मंत्री रॉबर्ट एफ केनेडी जूनियर ने एक संयुक्त बयान में बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित एक कार्यकारी आदेश के जरिए यह वापसी लागू की गई। इस फैसले का उद्देश्य अमेरिका को डब्ल्यूएचओ की पाबंदियों से मुक्त करना और कोविड-19 महामारी के दौरान हुई विफलताओं से हुए नुकसान की भरपाई करना है।
बयान में कहा गया, आज अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से खुद को अलग कर लिया है, जैसा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले दिन वादा किया था। यह कदम कोविड-19 के दौरान डब्ल्यूएचओ की नाकामियों के जवाब में उठाया गया है, जिनका खामियाजा अमेरिकी जनता को भुगतना पड़ा।
प्रशासन ने डब्ल्यूएचओ पर अपने मूल उद्देश्य से भटकने और अमेरिकी हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया। बयान में कहा गया कि अमेरिका डब्ल्यूएचओ का संस्थापक सदस्य और सबसे बड़ा वित्तीय योगदानकर्ता रहा है, इसके बावजूद संगठन ने अमेरिका के हितों की अनदेखी की।
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि डब्ल्यूएचओ ने राजनीतिक और नौकरशाही एजेंडे को अपनाया, जो उन देशों से प्रभावित था जो अमेरिका के विरोधी हैं। साथ ही, महामारी के दौरान समय पर और सटीक जानकारी साझा करने में संगठन असफल रहा।
बयान में यह भी कहा गया कि इन विफलताओं की वजह से अमेरिकी लोगों की जान जा सकती थी और बाद में इन गलतियों को जन स्वास्थ्य के हित के नाम पर छिपाया गया।
प्रशासन ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका के बाहर निकलने के फैसले के बाद डब्ल्यूएचओ का व्यवहार अपमानजनक रहा। कहा गया कि संगठन ने अपने मुख्यालय में लगा अमेरिकी झंडा सौंपने से इनकार कर दिया और यह दावा किया कि उसने अमेरिका की वापसी को मंजूरी नहीं दी है।
संयुक्त बयान में कहा गया, हमारे संस्थापक सदस्य और सबसे बड़े समर्थक होने के बावजूद, अंतिम दिन तक अमेरिका का अपमान जारी रहा।
अमेरिकी सरकार ने साफ किया कि अब डब्ल्यूएचओ के साथ उसका संपर्क केवल वापसी की प्रक्रिया पूरी करने और अमेरिकी नागरिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की रक्षा तक सीमित रहेगा। डब्ल्यूएचओ से जुड़ी सभी अमेरिकी फंडिंग और स्टाफिंग तुरंत समाप्त कर दी गई है।
प्रशासन ने कहा कि अमेरिका अब वैश्विक स्वास्थ्य प्रयासों का नेतृत्व सीधे देशों के साथ द्विपक्षीय साझेदारी और भरोसेमंद स्वास्थ्य संस्थानों के जरिए करेगा। बयान में डब्ल्यूएचओ को भारी-भरकम और अक्षम नौकरशाही बताया गया।
ट्रंप प्रशासन ने कहा कि यह फैसला उन अमेरिकियों को सम्मान देने के लिए लिया गया है जिन्होंने महामारी में अपनों को खोया, खासकर नर्सिंग होम में मरे बुजुर्गों और उन कारोबारियों को, जिन्हें कोविड प्रतिबंधों से भारी नुकसान हुआ।
बता दें कि अमेरिका 1948 में डब्ल्यूएचओ का संस्थापक सदस्य बना था और लंबे समय तक इसका सबसे बड़ा डोनर रहा है।
--आईएएनएस
वीकेयू/एएस
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