मेंटल हेल्थ– पति को बायपोलर डिसऑर्डर है:12 साल से सेवा कर रही हूं, हर वक्त थकान सी रहती है, मैं डिप्रेस हो रही हूं, क्या करूं
सवाल– मेरे हसबैंड को बाइपोलर डिसऑर्डर है। हमारी शादी को 12 साल हो चुके हैं। लंबे समय तक तो हमें पता ही नहीं था कि उन्हें ये कंडीशन है। कभी वो बहुत खुश, बहुत एनर्जेटिक होते और कभी अचानक बहुत ज्यादा डिप्रेस्ड। शुरू-शुरू में तो ये नॉर्मल मूड स्विंग ही लगता था। लेकिन फिर डिप्रेशन वाला दौर इतना लंबा खिंचने लगा कि वो हफ्तों ऑफिस ही नहीं जाते। कमरा बंद करके पड़े रहते। चार साल पहले हमें पता चला कि उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर है। उनका तो इलाज चल रहा है। रेगुलर दवाएं भी खा रहे हैं। लेकिन 12 साल से केयरगिविंग करते-करते मैं अब पूरी तरह एग्जॉस्ट हो चुकी हूं। अब मुझे हेल्प की जरूरत है। लग रहा है कि मेरी मेंटल हेल्थ खराब हो रही है। मैं क्या करूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सबसे पहले सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। मैं समझ सकता हूं कि हमारी कल्चर और सोशल कंडीशनिंग में यह सवाल पूछना भी कितने साहस का काम है। आपका सवाल बिल्कुल वाजिब है और मैं यथासंभव इसका जवाब देने की कोशिश करूंगा। केयरगिवर स्ट्रेस क्या है? किसी तरह की शारीरिक या मानसिक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति की देखभाल करने वाला खुद भी गहरे तनाव से गुजरता है। उसके ऊपर बीमार की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी होती है। इस काम को करने के लिए जिस सपोर्ट और मदद की जरूरत है, कई बार केयरगिवर को वो भी नहीं मिल पाता। ऐसे में केयरगिवर के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी नेगेटिव प्रभाव पड़ता है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे केयरगिवर स्ट्रेस कहते हैं। केयरगिवर की अवधारणा कहां से आई? केयरगिवर स्ट्रेस की अवधारणा पहली बार तब सामने आई, जब यह देखा गया कि लंबी बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति की देखभाल करने वाले लोग खुद भी बीमार पड़ने लगे हैं, जबकि वे “पेशेंट” नहीं थे। 1970–80 के दशक में डिमेंशिया, स्ट्रोक, कैंसर और गंभीर मानसिक बीमारियों पर काम करने वाले रिसर्चर्स ने पाया कि देखभाल करने वाले लोगों की फिजिकल और मेंटल हेल्थ भी खराब हो रही है। ये लोग इमोशनल बर्नआउट और एंग्जाइटी का शिकार होने लगे। उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ गया। इतना ही नहीं, उनमें डायबिटीज जैसे मेटाबॉलिक डिसऑर्डर का अनुपात भी बढ़ने लगा। यहीं से यह समझ बनी कि किसी की केयर करना सिर्फ अपना समय देना नहीं है। केयरगिविंग के काम में मानसिक ऊर्जा लगती है। इसके लिए भावनात्मक रूप से सहनशील होना जरूरी है। केयरगिवर को हर वक्त एलर्ट रहना पड़ता है और यह लगातार दबाव केयर स्ट्रेस को जन्म देता है। केयरगिवर स्ट्रेस किन स्थितियों में होता है? यूं तो केयरगिवर स्ट्रेस किसी भी लंबी बीमारी में पेशेंट की देखभाल करने वाले व्यक्ति को हो सकता है, जैसेकि पैरेलिसिस, कैंसर, पार्किंसंस डिजीज, क्रॉनिक पेन आदि। लेकिन मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों की देखभाल करने वालों में यह स्ट्रेस ज्यादा गहराई से देखा जाता है। इसके कारण स्पष्ट हैं : 1. बीमारी का अनिश्चित स्वरूप मेंटल डिजीज की स्थिति में बीमारी, इलाज और बेहतरी की कोई एक निश्चित टाइमलाइन नहीं होती। पेशेंट कभी भी बेहतर महसूस कर सकता है और उसकी स्थिति कभी भी बिगड़ सकती है। ऐसे में केयरगिवर को हमेशा एलर्ट मोड में रहना पड़ता है। अनिश्चितता उसे हमेशा एलर्ट रखती है। 2. व्यवहार में बदलाव डिप्रेशन, बाइपोलर डिसऑर्डर और स्किड्जोफ्रेनिया जैसी स्थितियों में व्यक्ति का व्यवहार कभी भी बदल सकता है। उसे हर वक्त देखभाल की जरूरत होती है। देखभाल करने वाले के लिए इमोशनली यह काफी थकाने वाला अनुभव होता है। 3. दिखाई न देने वाली बीमारी मानसिक बीमारी के साथ एक दिक्कत ये भी है कि यह बाहर से दिखाई नहीं देती। इसलिए केयरगिवर को उसकी मेहनत और समर्पण का वैलिडेशन भी नहीं मिलता। न परिवार से, न ही समाज से। 4. लगातार इमोशनल मॉनिटरिंग पेशेंट की दवा, नींद, मूड, सोशल विड्रॉल, हरेक चीज पर नजर रखने का बोझ केयरगिवर पर आ जाता है। 5. भूमिकाओं का उलट जाना परिवार के किसी सदस्य की लंबी बीमारी में पत्नी/पति, बेटा/बेटी धीरे-धीरे “केयर मैनेजर” बन जाते हैं। ऐसे में रिश्ते का नेचुरल संतुलन बिगड़ जाता है। 6. भारतीय सामाजिक अपेक्षाएं भारत में केयरगिवर्स से ये उम्मीद की जाती है कि वे शिकायत न करें, सब संभालें और अपनी थकान को दबा दें। इससे स्ट्रेस और गहरा हो जाता है। केयरगिवर स्ट्रेस और डिप्रेशन में फर्क केयरगिवर स्ट्रेस और डिप्रेशन, दोनों एक चीजें नहीं हैं। कई बार दोनों को एक समझ लिया जाता है। देखभाल की मेहनत और दबाव के कारण क्रॉनिक थकान होने लगती है, जिसकी वजह से उदासी, चिड़चिड़ापन महसूस होता है। इसे ही कई बार लोग डिप्रेशन से कनफ्यूज कर देते हैं। इसलिए दोनों का फर्क समझना जरूरी है। ध्यान देने वाली बात: यहां पर सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात ये है कि केयरगिवर स्ट्रेस को अगर लंबे समय तक अनदेखा किया जाए, तो वह क्लिनिकल डिप्रेशन में बदल सकता है। केयरगिवर स्ट्रेस के संभावित जोखिम अगर केयर स्ट्रेस बहुत ज्यादा बढ़ जाए और कंट्रोल से बाहर चला जाए तो इससे कई हेल्थ रिस्क हो सकते हैं। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखिए- केयरगिवर स्ट्रेस के पेशेंट के लिए जोखिम केयरगिवर अगर क्रॉनिक स्ट्रेस का शिकार हो तो यह पेशेंट के लिए भी जोखिम पैदा कर सकता है। उसके लिए जोखिम कुछ इस प्रकार के हो सकते हैं– ● केयर की क्वालिटी गिरना ● इमोशनल नेगलेक्ट (भले ही अनजाने में) ● समय पर दवाइयां न दे पाना ● पेशेंट–केयरगिवर के बीच कॉन्फ्लिक्ट बढ़ना ● केयरगिवर के चिड़चिड़ेपन से पेशेंट की हालत और बिगड़ना ● रिलैप्स, क्राइसिस या मेडिकल इमरजेंसी का रिस्क बढ़ना क्या आप केयर स्ट्रेस से जूझ रहे हैं? यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 8 सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल का आपका जवाब अगर 'नहीं' है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब 'लगभग रोज' है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। जैसेकि अगर आपका स्कोर 0 से 6 के बीच है तो इसका मतलब है कि स्ट्रेस को मैनेज किया जा सकता है। लेकिन अगर आपका स्कोर 14 से ज्यादा है तो आपके साथ बर्नआउट का रिस्क है। आपको अपनी मेंटल हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत है। CBT के जरिए केयरगिवर स्ट्रेस को समझना और संभालना CBT (कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी) यह मानता है कि हमारा स्ट्रेस सिर्फ हालात से नहीं, बल्कि हमारी सोच से भी पैदा होता है। केयरगिवर स्ट्रेस में यह एक आम सोच होती है कि- ● “मुझे हर हाल में स्ट्रांग रहना होगा।” ● “अगर मैंने कंट्रोल छोड़ा तो सब बिगड़ जाएगा।” ● “मेरी थकान सेकेंडरी है।” CBT से इस सोच को रीफ्रेम करना पुरानी सोच: “मैं थक गई हूं, मतलब मैं कमजोर हूं।” नई सोच: “मैं थक गई हूं क्योंकि मैं लंबे समय से केयर कर रही हूं। यह इंसानी प्रतिक्रिया है।” इस बात को रोज लिखना और बार-बार उसे अपने दिमाग में दोहराना है। ऐसा करने से सोच बदलती है। दिमाग ऑल्टरनेटिव विचार को अपनाने लगता है। पत्नी क्या कर सकती हैं कुछ प्रैक्टिकल स्टेप्स 1. रोल बाउंड्री तय करें याद रखें- 2. क्राइसिस और रूटीन में फर्क करें याद रखें- 3. सेल्फ टाइम है नॉन-नेगोशिएबल याद रखें- 4. एक व्यक्ति, जिससे दिल बांट सकें 5. प्रोफेशनल सपोर्ट लेने की हिम्मत केयरगिवर को भी थेरेपी या काउंसिलिंग की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए मदद लेने में बिल्कुल संकोच न करें। ये केयरगिवर की कमजोरी नहीं, बल्कि जरूरत है। तुरंत मदद कब जरूरी इन स्थितियों में तत्काल मदद या प्रोफेशनल मदद बहुत क्रिटिकल होती है। नीचे ग्राफिक में दी स्थितियों में से कोई भी स्थिति पैदा हो तो मदद लेने में संकोच न करें। अंतिम बात केयरगिवर स्ट्रेस कोई मामूली या हाशिए का इश्यू नहीं है। यह एक गंभीर स्थिति है। लेकिन अगर इसे समय पर पहचान लिया जाए और एड्रेस किया जाए तो आसानी से मैनेज हो सकती है। याद रखिए: ……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ– पार्टी करता रहा, दोस्त का फोन नहीं उठाया: उस रात उसने आत्महत्या कर ली, क्या दोस्त की मौत का जिम्मेदार मैं हूं? दोस्त की मृत्यु के लिए स्वयं को दोष देना या जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है। आपका गिल्ट इस बात का सबूत बिल्कुल नहीं है कि अपने दोस्त की मौत के लिए आप जिम्मेदार हैं। आगे पढ़िए...
जरूरत की खबर- धड़ल्ले से बिक रहा मिलावटी सॉस:डॉक्टर की सलाह- स्ट्रीट फूड न खाएं, घर पर ऐसे करें सॉस में मिलावट की पहचान
बीते एक महीने में यूपी और हरियाणा के तीन जिलों से मिलावटी सॉस पकड़े जाने की खबरें सामने आई हैं। यूपी के बागपत जिले के बड़ौत में फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने नकली मेयोनीज और सॉस की सप्लाई करने वाले एक बड़े रैकेट का खुलासा किया। यहां एक गोदाम से मिलावटी सॉस से भरे ड्रम बरामद किए गए। इसके अलावा रामपुर जिले में फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने जांच के दौरान स्ट्रीट वेंडर्स की खराब और मिलावटी सॉस जब्त की। वहीं हरियाणा के सोनीपत में CM फ्लाइंग टीम ने सॉस बनाने वाली फैक्ट्री पर छापा मारकर करीब 600 किलो मिलावटी सॉस नष्ट कराई। लगातार सामने आ रहे ये मामले बताते हैं कि बाजारों में बड़े पैमाने पर मिलावटी सॉस का इस्तेमाल हो रहा है, जो सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक है। तो चलिए, आज जरूरत की खबर में हम मिलावटी सॉस के बारे में विस्तार से बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. अरविंद अग्रवाल, डायरेक्टर इंटरनल मेडिसिन एंड इन्फेक्शियस डिजीज, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली एस.एम. भारद्वाज, रिटायर्ड चीफ फूड एनालिस्ट, स्टेट फूड लैब, नई दिल्ली सवाल- रेड और ग्रीन सॉस में आमतौर पर किन चीजों की मिलावट की जाती है? जवाब- रेड-ग्रीन सॉस में लागत कम करने और लंबे समय तक स्टोर करने के लिए कई तरह की मिलावट की जाती है। जैसेकि– आरारोट, कॉर्न स्टार्च और केमिकल थिकनर की मिलावट सॉस को गाढ़ा करने के लिए होती है। साथ ही इसमें एडेड सॉल्ट और शुगर भी होता है। सवाल- मिलावटी सॉस खाने से किस तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं? जवाब- मिलावटी सॉस में इस्तेमाल होने वाले आर्टिफिशियल कलर, केमिकल फ्लेवर और हैवी प्रिजर्वेटिव्स सेहत पर गंभीर असर डाल सकते हैं। इसे रोज खाने से पेट दर्द, गैस, एसिडिटी, उल्टी और दस्त जैसी पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा मिलावटी सॉस खाने से इम्यूनिटी कमजोर होने, एलर्जी, स्किन रैश और हॉर्मोनल असंतुलन का खतरा भी बढ़ता है। लंबे समय तक इसके सेवन से लिवर और किडनी को नुकसान हो सकता है। साथ ही इससे बच्चों में अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) और फोकस की कमी हो सकती है। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए- सवाल- सॉस में मिलावट की पहचान कैसे करें? जवाब- कुछ आसान संकेतों से सॉस में मिलावट की पहचान की जा सकती है। अगर सॉस का कलर ज्यादा चमकीला हो, खुशबू जरूरत से ज्यादा तेज या केमिकल जैसी हो, स्वाद अननेचुरल हो तो सतर्क हो जाएं। इसके अलावा सॉस में मिलावट के कुछ और भी संकेत हो सकते हैं। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए- सवाल- बाजार से सॉस खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? जवाब- अगर आप भी बाजार से रेड या ग्रीन सॉस खरीदते हैं तो कुछ बातों का खास ख्याल रखें। थोड़ी-सी सावधानी आपको मिलावट के खतरे से बचा सकती है। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए- सवाल- क्या ब्रांडेड टोमैटो कैचअप खाना सुरक्षित है? जवाब- डॉ. अरविंद अग्रवाल बताते हैं कि अगर टोमैटो कैचअप किसी विश्वसनीय ब्रांड का हो, सही तरीके से पैक्ड हो और एक्सपायरी डेट के भीतर हो तो कभी–कभार सीमित मात्रा में खा सकते हैं। इसमें भी चीनी, नमक और प्रिजर्वेटिव्स की मात्रा ज्यादा होती है। इसलिए इसे रोज खाना या ज्यादा मात्रा में खाना सेहत के लिए नुकसानदायक है। सवाल- सॉस को कितने दिनों तक स्टोर किया जा सकता है? जवाब- डॉ. अरविंद अग्रवाल बताते हैं कि यह सॉस की क्वालिटी और स्टोरेज कंडीशन पर निर्भर करता है। पैक्ड सॉस खोलने के बाद आमतौर पर फ्रिज में 1 महीने तक सुरक्षित रहता है, बशर्ते उसे साफ चम्मच से निकाला जाए और ढक्कन अच्छी तरह बंद रखा जाए। वहीं घर के बने सॉस को फ्रिज में 3-5 दिन से ज्यादा स्टोर नहीं करना चाहिए। अगर रंग, गंध या स्वाद में बदलाव दिखे तो सॉस का इस्तेमाल न करें। सवाल- घर पर सॉस बनाने का सही और सुरक्षित तरीका क्या है? जवाब- इसके लिए ताजे टमाटर, मिर्च और अन्य सब्जियां लें। सामग्री को अच्छी तरह धोकर उबालें या पकाएं। फिर साफ मिक्सर में पीसें। स्वाद के लिए सीमित मात्रा में नमक, चीनी और विनेगर डालें। किसी भी तरह का फूड कलर या केमिकल प्रिजर्वेटिव न डालें। तैयार सॉस को ठंडा करके साफ, सूखी और एयरटाइट कांच की बोतल में रखें और हमेशा साफ चम्मच से ही निकालें। इसे फ्रिज में रखकर 5–7 दिनों के भीतर इस्तेमाल करना सबसे सुरक्षित है। सवाल- खराब या बासी सॉस के क्या संकेत हैं? जवाब- अगर सॉस का रंग बदल जाए, स्मेल और स्वाद अजीब हो तो इसका मतलब है कि वह खराब हो गया है। बोतल खोलते ही झाग/गैस निकलना, ढक्कन फूला होना या ऊपर फफूंद दिखना भी सॉस खराब होने के संकेत हैं। ऐसा सॉस बिल्कुल न खाएं। सवाल- मिलावटी फूड की शिकायत कहां और कैसे कर सकते हैं? जवाब- इसके लिए FSSAI की टोल-फ्री हेल्पलाइन 1800-112-100 पर कॉल करें। साथ ही ‘फूड सेफ्टी कनेक्ट’ एप के जरिए ऑनलाइन शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं। इसके अलावा अपने जिले के फूड सेफ्टी ऑफिसर या जिला प्रशासन से भी सीधे शिकायत कर सकते हैं। ध्यान रखें, शिकायत करते समय फूड आइटम का नाम, खरीद की जगह, बिल (अगर हो) और फोटो जैसी जानकारी दें, ताकि समय पर कार्रवाई हो सके। सवाल- फूड में मिलावट पाए जाने पर क्या कार्रवाई हो सकती है? जवाब- फूड में मिलावट पाए जाने पर FSSAI के नियमों के तहत सख्त कार्रवाई की जा सकती है। इसमें भारी जुर्माना लग सकता है। लाइसेंस रद्द या निलंबित किया जा सकता है। अगर मिलावट से लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचा हो तो दोषियों पर आपराधिक मामला भी दर्ज किया जा सकता है। गंभीर मामलों में जेल की सजा तक का प्रावधान है। ...................... जरूरत की ये खबर भी पढ़िए जरूरत की खबर- 900 किलो मिलावटी सौंफ बरामद: आपकी सौंफ में मिलावट तो नहीं, 5 तरीकों से चेक करें, खरीदते हुए 8 बातें ध्यान रखें मिलावटखोर सौंफ की चमक बढ़ाने के लिए आमतौर पर आर्टिफिशियल ग्रीन कलर की मिलावट करते हैं। इससे सौंफ ज्यादा फ्रेश और आकर्षक दिखाई देती है। इसके अलावा पुरानी या खराब सौंफ को नया दिखाने के लिए उसमें भी कलर मिलाते हैं। कुछ मामलों में वजन बढ़ाने के लिए धूल, रेत या अन्य सस्ते बीज भी मिलाते हैं। पूरी खबर पढ़िए...
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