Maa Saraswati Aarti Lyrics: सरस्वती पूजा के समय करें यह आरती, ओम जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता, सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता
Maa Saraswati Aarti Lyrics: आज सरस्वती पूजा है. सरस्वती पूजा के समय में माता सरस्वती की आरती करते हैं. इसका प्रारंभ ॐ जय सरस्वती माता...से होता है. यहां पढ़ें हिंदी में सरस्वती माता की आरती अर्थ सहित.
रानी मुखर्जी की कद-काठी, रंग और आवाज का उड़ा मजाक:लोगों ने कहा- हीरोइन बनने के लायक नहीं, 8 फिल्मफेयर और नेशनल अवॉर्ड मिले
बॉलीवुड में अक्सर यह माना जाता है कि फिल्मी परिवार से आने वाले कलाकारों के लिए रास्ते आसान होते हैं, लेकिन रानी मुखर्जी की कहानी इस धारणा को पूरी तरह तोड़ देती है। पिता के सख्त विरोध, इंडस्ट्री में मजाक, आर्थिक परेशानियों और उनके आत्मविश्वास पर लगातार हमले किए गए। कभी यह कहकर दुत्कारा गया कि हीरोइन मटेरियल नहीं हैं। कभी उनकी कद-काठी, रंग और आवाज को लेकर मजाक उड़ाया गया। बावजूद इसके रानी मुखर्जी ने न सिर्फ अपनी जगह बनाई, बल्कि तीन दशक तक सिनेमा पर राज किया। आज वह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुकी एक सशक्त, गंभीर और सम्मानित अभिनेत्री हैं। आज की सक्सेस स्टोरी में जानेंगे रानी मुखर्जी के करियर और लाइफ से जुड़ी कुछ खास बातें.. पिता के मना करने के बावजूद बॉलीवुड में कदम रखा रानी मुखर्जी का जन्म 21 मार्च 1978 को मुंबई में हुआ। वह मशहूर फिल्ममेकर राम मुखर्जी की बेटी और अभिनेत्री तनुजा की भतीजी हैं। यानी फिल्मी बैकग्राउंड मजबूत था, लेकिन इसके बावजूद उनके पिता राम मुखर्जी नहीं चाहते थे कि रानी फिल्मों में जाएं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत के दौरान रानी ने इस बारे में बात की। रानी मुखर्जी कहती हैं- मेरे पापा खुद फिल्म इंडस्ट्री से थे, लेकिन उस समय का माहौल इतना आसान नहीं था। पेरेंट्स का पहला फर्ज बच्चों को बचाना होता है। यह बात मुझे तब समझ में आई जब मैं मां बनी। हमारा पहला ख्याल बच्चों की सुरक्षा का होता है। जब बच्चे 12वीं पास करके करियर चुनने वाले होते हैं, तो पेरेंट्स ज्यादा प्रोटेक्टिव हो जाते हैं, लेकिन हम सबको तो दुनिया में आगे बढ़ना ही पड़ता है, अपनी राह खुद बनानी पड़ती है। हमारी जर्नी अलग होती है। औरत की सहनशक्ति को एक औरत ही समझ सकती है उस समय डैडी को लगा होगा कि इंडस्ट्री के उतार-चढ़ाव मैं झेल नहीं पाऊंगी। शायद उन्हें डर था कि उनकी बेटी ये सब संभाल न पाए। इसलिए वे ज्यादा खुश नहीं थे कि मैं इंडस्ट्री में हूं। हमेशा लोग लड़कियों को कम आंकते हैं। सोचते हैं कि हम मुश्किलें नहीं झेल पाएंगी, लेकिन एक औरत की सहनशक्ति बहुत मजबूत होती है। यह बात सिर्फ औरत ही समझ सकती है। करियर की शुरुआत में खूब मजाक उड़ाया गया रानी मुखर्जी ने अपने पिता राम मुखर्जी के डायरेक्शन में बनी बंगाली फिल्म ‘बियेर फूल’ (1996) से एक्टिंग डेब्यू किया था। इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्म ‘राजा की आएगी बारात’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया। करियर की शुरुआत में कद-काठी, रंग और आवाज को लेकर खूब मजाक उड़ाया गया। बावजूद इसके रानी ने बॉलीवुड में अपनी एक अलग जगह बनाई। रानी कहती हैं- मैं अपने फैंस का तहेदिल से शुक्रिया करती हूं। आर्टिस्ट जैसा होता है, उसे अपनाना दर्शकों का फैसला होता है। इंडस्ट्री ने शुरुआत में मेरी आवाज पसंद न आने पर डब कर दी, लेकिन फैंस ने दिल से सराहा। उनकी ताकत से ही आलोचकों की बोलती बंद हो गई। हार के बाद ही जीत का असली मजा है मेरी जिंदगी में बहुत उतार चढ़ाव आए, लेकिन ऊपर वाले ने जो जिंदगी दी है, उसे हम आसानी से हार नहीं सकते। इसलिए हमेशा ग्रेटफुल रहना जरूरी है। चाहे आगे क्या हो जाए, ये तो बस घटनाएं हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि हम इस दुनिया में पैदा हुए हैं और कुछ न कुछ करना है। भले ही मैं फिल्मों में काम कर रही हूं, लेकिन कोई वर्दी में देश की सेवा कर रहा है, कोई डॉक्टर हॉस्पिटल में मरीजों की मदद कर रहा है। सबका अपना-अपना रोल है। मेरा काम ऐसे किरदार लाना है जो सबको इंस्पायर करें। डल या हारने वाले पल भी महसूस करने चाहिए। तभी जीत का असली मजा आता है। ‘कुछ कुछ होता है’ से बदली किस्मत 1998 में रिलीज फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ रानी मुखर्जी के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। काजोल और शाहरुख खान के साथ सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद रानी ने टीना मल्होत्रा के किरदार से दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवॉर्ड मिला और बॉलीवुड ने पहली बार रानी मुखर्जी को गंभीरता से लेना शुरू किया। ‘कुछ कुछ होता है’ के अलावा रानी को हम तुम, ब्लैक, युवा, साथिया, ब्लैक, नो वन किल्ड जेसिका’ ‘मिसेस चटर्जी वर्सेस नार्वे’ जैसी फिल्मों को मिलाकर 8 फिल्मफेयर अवॉर्ड मिल चुके हैं। रानी मुखर्जी की खसियात यह रही है कि उन्होंने खुद को सिर्फ रोमांटिक फिल्मों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने लगातार अलग-अलग और जोखिम भरे किरदार चुने। ‘साथिया’, ‘ब्लैक’ ‘बंटी और बबली’, ‘नो वन किल्ड जेसिका’, ‘मर्दानी’ जैसी फिल्मों से रानी ने खुद को प्रूव किया है। ‘ब्लैक’ बनी करियर की मील का पत्थर फिल्म ‘ब्लैक’ को रानी मुखर्जी के करियर की मील का पत्थर कहा जाता है। इस फिल्म में उनके अभिनय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज के सामने रानी का प्रदर्शन बराबरी का था। करीब 30 साल के करियर में रानी मुखर्जी ने खुद को बार-बार साबित किया। उन्हें फिल्म ‘मिसेस चटर्जी वर्सेस नॉर्वे’ के लिए नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, जो उनके संघर्ष, धैर्य और प्रतिभा की आधिकारिक मुहर है। नेशनल अवॉर्ड अपने पिता को समर्पित किया नेशनल अवॉर्ड मिलने पर रानी मुखर्जी भावुक हो गई थीं। इस अवॉर्ड को उन्होंने अपने पिता राम मुखर्जी को समर्पित कर दिया था। रानी कहती हैं- ये एक ऐसी कमी है जो कभी पूरी नहीं होगी। पापा मेरे सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम थे, मेरे एंकर थे। उनके जाने के बाद हर खुशी अधूरी लगती है। नेशनल अवॉर्ड ही नहीं, मेरी जिंदगी का हर बड़ा पल उनसे जुड़ा है। जब भी कुछ अच्छा या बुरा होता है, सबसे पहले पापा याद आते हैं। ये खलिश हमेशा रहेगी। औरत वाले इंस्टिंक्ट को फॉलो किया रानी मुखर्जी कहती हैं- मुझे कभी एक्ट्रेस बनना नहीं था। बचपन से ये सपना नहीं था कि मुझे ये अचीव करना है। बस मुझे मम्मी-पापा को एक बहुत ही बेहतरीन जिंदगी देनी थी। मैं बस चांस से एक्ट्रेस बनी। फिर अपने इंसानी और औरत वाले इंस्टिंक्ट को फॉलो किया। किसी को कुछ प्रूव नहीं करना था। बस दर्शकों तक अच्छी कहानियां और स्ट्रॉन्ग फीमेल कैरेक्टर्स पहुंचाने थे। स्टारडम को अपना लक्ष्य कभी नहीं बनाया लोगों को लगता था कि मैंने ऐसे किरदारों का चयन करके जोखिम लिया है, लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं कोई रिस्क ले रही हूं, क्योंकि मैंने कभी स्टारडम को अपना लक्ष्य बनाया ही नहीं। मेरे लिए जरूरी था कि मैं उन कहानियों का हिस्सा बनूं जो मुझे अंदर से छूती हैं। अगर कोई किरदार समाज को असहज करता है, सवाल खड़े करता है या किसी औरत की ताकत दिखाता है, तो मुझे लगता है कि मैं सही दिशा में काम कर रही हूं। छोटी सी उम्र में ही बड़े स्टार्स के साथ मौका मिला जब मैंने करियर शुरू किया था, तब मैं बहुत छोटी थी। जिन स्टार्स के साथ काम कर रही थी, उन्हें भी लगा होगा कि ये इतनी छोटी है और फिर भी काम कर रही है। इसलिए शायद उनका प्यार मेरे प्रति उभरा। मेरे माता-पिता हमेशा साथ रहते थे, तो सब उन्हें भी बहुत चाहते थे। ये एकदम नेचुरल पसंद थी। मैंने अपने सारे रिश्ते ईमानदारी से निभाए, चाहे शाहरुख के साथ हो, आमिर के साथ, बॉबी के साथ या सलमान के साथ। दोस्ती कभी काम के लिए नहीं थी, इसलिए आज भी वही ईमानदारी बरकरार है। काम हो या न हो, रिश्ता वैसा ही है। शाहरुख को दर्शक स्पेशल मानते हैं चाहे कोई कितना भी बड़ा हो या छोटा। सबकी देखभाल करना, हर किसी को बराबर इज्जत देना, शाहरुख के व्यक्तित्व में है। ये उनकी सबसे अच्छी बात लगती है। काम के मामले में उनकी मेहनत, डिसिप्लिन और ईमानदारी कमाल की है। सलमान, आमिर सबकी तरह उन्होंने करियर बनाया, जो मेरे लिए बहुत इंस्पायरिंग रहा। यही वजह है कि दर्शक उन्हें इतना स्पेशल मानते हैं। आमिर के साथ काम करने में बहुत रोमांच था आमिर खान के साथ फिल्म ‘गुलाम’ में काम करना कमाल का था। तब मैं बहुत छोटी थी,17-18 साल की। उनकी ‘कयामत से कयामत तक’ और ‘रंगीला’ देखी थी। बचपन से उनकी फैन थी। मंजे हुए कलाकार के साथ काम करने का रोमांच था। साथ ही जिम्मेदारी भी कि हमारी जोड़ी दर्शकों को अच्छी लगे। सलमान हमेशा से मासूम लगते हैं सलमान खान के साथ बहुत अच्छा बॉन्ड है। सलमा आंटी, सलीम अंकल, खासकर सलमान के घर का माहौल ऐसा है कि सबको खाना मिलता है। सलमान सबको बहुत प्यार से खिलाते हैं। जो खाना खिलाता है, उसमें एक खास रूहानियत होती है। अपने लोगों के लिए खड़े होने की उनकी आदत भी कमाल की है। मुझे सलमान हमेशा मासूम लगते हैं। उनके बिहेवियर में एक फीसदी भी छल-कपट नहीं। जो फील करते हैं, 100 प्रतिशत ईमानदार। बाहर और अंदर, दोनों एक जैसे। इतने सालों में ये ईमानदारी बरकरार रखना मुश्किल है, लेकिन सलमान में ये आज भी है। ईमानदारी से सर ऊंचा रखकर काम किया अपने 30 साल के करियर में रानी मुखर्जी ने कई तरह के चुनौतीपूर्ण किरदार निभाए हैं। वह कहती हैं- आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो डैडी की एक सीख याद आती है। पापा ने शुरू में कहा था कि ये दुनिया चढ़ते सूरज को सलाम करने वाली है। सक्सेस मिले तो ज्यादा उत्साहित न हों, फेलियर आए तो हताश न हों। बस सर ऊंचा रखकर ईमानदारी से अपना काम करते रहें। मैंने यही किया, अपने क्राफ्ट, फिल्मों और कहानियों के प्रति समर्पित रही। आज ऊपर वाले के लिए ग्रेटफुल हूं कि मैं चुन कर काम कर सकती हूं। ______________________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... गांव में गोबर उठाते थे जयदीप अहलावत:आज बॉलीवुड के ‘महाराज' बने, इरफान खान से तुलना पर छलके आंसू, शाहरुख को अपना इश्क बताया हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसी शख्सियत हैं, जो चीख-चिल्लाहट नहीं, बल्कि एक सुकून भरे सुर की तरह आपके दिल में बस गई है। यह सुर इतना गहरा है कि आप शायद कभी अपनी दिलों से इन्हें निकाल ही न पाएं।पूरी खबर पढ़ें....
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