सीरीज़ हार के बाद भारतीय टीम की कप्तानी और मैदान पर लिए गए फैसलों पर सवाल उठना नई बात नहीं है। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 1–2 से वनडे सीरीज़ गंवाने के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बार चर्चा के केंद्र में टीम के युवा कप्तान शुभमन गिल रहे, जिनके कुछ अहम मौकों पर लिए गए फैसलों पर पूर्व भारतीय स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने खुलकर अपनी राय रखी है।
अश्विन ने अपने यूट्यूब चैनल पर पूरी सीरीज़ का विश्लेषण करते हुए नेतृत्व और अनुभव के अंतर को सरल शब्दों में समझाया। उनके अनुसार, बड़े कप्तानों की पहचान यह होती है कि वे अपने संसाधनों का इस्तेमाल कब, कहां और किस बल्लेबाज़ के खिलाफ करना है, इसे अच्छी तरह जानते हैं। अश्विन ने कहा कि रोहित शर्मा और महेंद्र सिंह धोनी को बतौर कप्तान इसलिए सराहा जाता है क्योंकि वे दबाव की परिस्थितियों में भी सही समय पर सही गेंदबाज़ को आक्रमण पर लाते हैं।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अश्विन को लगा कि न्यूज़ीलैंड के खिलाफ सीरीज़ में भारतीय कप्तानी में यही पहलू कमजोर नजर आया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी गेंदबाज़ पर पिछले मैच के प्रदर्शन के आधार पर भरोसा कम नहीं किया जाना चाहिए। अश्विन के अनुसार, एक मुकाबले में असफल रहने के कारण गेंदबाज़ से आत्मविश्वास छीनना टीम के हित में नहीं होता।
पूर्व स्पिनर ने सीरीज़ के दौरान मिडिल ओवर्स को निर्णायक चरण बताया। उनका मानना है कि इसी दौर में भारत न्यूज़ीलैंड की टीम पर पर्याप्त दबाव बनाने में असफल रहा। कीवी बल्लेबाज़ों को क्रीज़ पर जमने का समय मिल गया और वहीं से मुकाबले भारत के हाथ से फिसलते चले गए।
अश्विन का कहना था कि समस्या गेंदबाज़ी विकल्पों की कमी नहीं थी, बल्कि उनके इस्तेमाल की टाइमिंग सही नहीं रही। उन्होंने विशेष तौर पर कुलदीप यादव के उपयोग पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, कुलदीप जैसे कलाई के स्पिनर को लंबे स्पेल की बजाय छोटे लेकिन आक्रामक स्पेल में आज़माया जाना चाहिए था।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर बीच के ओवरों में ग्लेन फिलिप्स जैसे बल्लेबाज़ को दो-दो ओवर के स्पेल में कुलदीप का सामना करना पड़ता, तो मैच की तस्वीर अलग हो सकती थी। अश्विन का यह भी मानना था कि डेरिल मिचेल जैसे बल्लेबाज़ के खिलाफ राउंड द विकेट गेंदबाज़ी करते हुए एक-दो रन देना भी स्वीकार्य हो सकता था, ताकि बल्लेबाज़ पर लगातार दबाव बनाए रखा जा सके।
अश्विन के अनुसार, सबसे अहम बात यह है कि टीम के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ों को सबसे निर्णायक समय पर गेंद सौंपी जाए। यदि उस रणनीति में असफलता भी मिलती है, तो कम से कम यह संतोष रहता है कि सही योजना के साथ प्रयास किया गया। लेकिन जब उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी उपयोग ही न हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने यह भी महसूस किया कि शुभमन गिल दबाव के क्षणों में कुछ ज्यादा सतर्क दिखाई दिए। अश्विन के संकेत थे कि शायद पिछले मैचों के अनुभव ने कप्तानी फैसलों को प्रभावित किया। साथ ही, जब मैच का रुख बदलने लगा, तो मैदान पर किसी स्पष्ट ‘प्लान बी’ के संकेत नजर नहीं आए।
कुल मिलाकर, अश्विन की टिप्पणियां केवल एक सीरीज़ की हार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उस नेतृत्व दृष्टिकोण की ओर इशारा करती हैं, जो बड़े मुकाबलों में अंतर पैदा करता है। आने वाले समय में, खासकर बड़े टूर्नामेंट्स को ध्यान में रखते हुए, भारतीय टीम प्रबंधन के लिए यह आत्ममंथन का विषय हो सकता है कि दबाव की परिस्थितियों में अनुभव और स्पष्ट रणनीति कितनी निर्णायक भूमिका निभाती है।
Wed, 21 Jan 2026 21:43:51 +0530