Fiscal Deficit को 4.3 प्रतिशत रखने के लिए Central Government लेगी 7.86 लाख करोड़ का कर्ज
वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में केंद्र सरकार बाजार से 7.86 लाख करोड़ रुपये जुटाने जा रही है। इसमें 15,000 करोड़ रुपये हरित सरकारी बॉन्ड के जरिए जुटाए जाएंगे। वित्त मंत्रालय की ओर से 25 सितंबर को जारी कर्ज लेने की योजना में इसकी जानकारी दी गई है। सरकार यह रकम अलग-अलग अवधि वाली सरकारी प्रतिभूतियां जारी करके जुटाएगी।
मौजूद जानकारी के अनुसार, पूरे वित्त वर्ष में सरकार का बाजार से कुल कर्ज लेने का लक्ष्य करीब 16 लाख करोड़ रुपये है। यह वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में तय 17.20 लाख करोड़ रुपये से लगभग 1.20 लाख करोड़ रुपये कम है। यानी सरकार ने पहले अनुमान के मुकाबले बाजार से कम कर्ज लेने का फैसला किया है। इसे सरकार की वित्तीय स्थिति को धीरे-धीरे मजबूत करने की योजना का हिस्सा माना जा रहा है।
बता दें कि वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.3% तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। सरकार ने कर्ज का बोझ भी धीरे-धीरे कम करने की दिशा में योजना बनाई है। ऐसे में कम बाजार कर्ज सरकार के वित्तीय अनुशासन पर जोर को दिखाता है।
दूसरी छमाही में 7.86 लाख करोड़ रुपये का कर्ज 23 साप्ताहिक नीलामियों के जरिए जुटाया जाएगा। इसके लिए 3, 5, 7, 10, 15, 30, 40 और 50 साल की अवधि वाली प्रतिभूतियां जारी की जाएंगी। इनमें 10 साल की अवधि वाली प्रतिभूतियों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 26.3% होगी। इसके बाद 15 साल की प्रतिभूतियों की हिस्सेदारी 17.6% रखी गई है।
वहीं 5 साल की प्रतिभूतियों से 12.1% और 3 साल की प्रतिभूतियों से 6.9% रकम जुटाई जाएगी। 7 साल की अवधि वाली प्रतिभूतियों की हिस्सेदारी 9.1%, 30 साल की 9.2%, 40 साल की 8.9% और 50 साल की प्रतिभूतियों की हिस्सेदारी 9.9% होगी। इस तरह सरकार अलग-अलग अवधि में कर्ज फैलाकर भुगतान के दबाव को संतुलित रखने की कोशिश करेगी।
गौरतलब है कि सरकार पहले से जारी प्रतिभूतियों के भुगतान की समयसीमा को बेहतर तरीके से संभालने के लिए अदला-बदली और वापस खरीद की प्रक्रिया भी जारी रखेगी। इसके अलावा सरकार को प्रत्येक नीलामी में घोषित प्रतिभूतियों पर 2,000 करोड़ रुपये तक अतिरिक्त राशि स्वीकार करने का विकल्प भी दिया गया है।
इसके अलावा वित्त वर्ष 2026-27 की तीसरी तिमाही में सरकार 13 नीलामी सप्ताह के दौरान हर सप्ताह 23,000 करोड़ रुपये राजकोषीय पत्रों के जरिए जुटाने की योजना बना रही है। इसमें 91 दिन और 182 दिन की अवधि वाले पत्रों से 8,000-8,000 करोड़ रुपये तथा 364 दिन वाले पत्रों से 7,000 करोड़ रुपये जुटाए जाएंगे।
सरकार के खातों में कभी-कभार होने वाली अस्थायी नकदी कमी को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने दूसरी छमाही के लिए 50,000 करोड़ रुपये की सीमा तय की है।
Saudi Aramco पर Houthi विद्रोहियों के हमलों से Crude Oil की कीमतों में बड़ा उछाल
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के साथ कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज उछाल आया है। यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब पर नए हमलों की खबर के बाद गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 3% से ज्यादा बढ़ गई। इन हमलों में सरकारी ऊर्जा कंपनी अरामको की सुविधाओं को निशाना बनाने का दावा भी किया गया है। इससे पहले से दबाव झेल रही वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
ब्रेंट कच्चा तेल, जिसे दुनिया में तेल की कीमतों का प्रमुख पैमाना माना जाता है, गुरुवार को कारोबार के दौरान 108 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया था। बाद में नवंबर के लिए ब्रेंट वायदा 106.50 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बंद हुआ। शुक्रवार सुबह एशियाई कारोबार में कीमत थोड़ी नीचे आई और 02:00 जीएमटी तक ब्रेंट 105.77 डॉलर प्रति बैरल पर था।
मौजूद जानकारी के अनुसार, हूती विद्रोहियों ने गुरुवार को सऊदी अरब की राजधानी रियाद में एक संवेदनशील ठिकाने और लाल सागर के किनारे बसे यानबू शहर में अरामको की सुविधाओं पर मिसाइल और ड्रोन हमले करने का दावा किया है। हूती समूह के मुताबिक, दोनों हमलों ने अपने लक्ष्य हासिल किए हैं। यह दावा हूती समूह द्वारा संचालित यमन समाचार एजेंसी में जारी बयान में किया गया है।
वहीं, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन बलों ने कहा कि उन्होंने हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब की तरफ दागी गई 6 बैलिस्टिक मिसाइलों को रास्ते में ही रोक दिया है। सऊदी अधिकारियों ने अभी यह पुष्टि नहीं की है कि इन हमलों से किसी तरह का नुकसान हुआ है या कोई व्यक्ति हताहत हुआ है। अरामको की ओर से भी सामान्य कामकाजी समय के बाहर इस मामले पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
गौरतलब है कि अरामको दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में शामिल है और उसकी आपूर्ति वैश्विक तेल मांग का करीब 10% हिस्सा पूरी करती है। ऐसे में उसकी तेल सुविधाओं या आपूर्ति मार्गों पर किसी भी तरह का बड़ा हमला बाजार में चिंता बढ़ा सकता है। तेल कारोबार में यह डर रहता है कि किसी प्रमुख उत्पादक देश के ठिकानों पर हमला होने से उत्पादन या आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
मध्य पूर्व में ताजा तनाव ऐसे समय बढ़ा है, जब अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए कूटनीतिक कोशिशें फिर शुरू हुई हैं। दोनों देशों के बीच बातचीत संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयॉर्क में आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने गुरुवार को उम्मीद जताई कि अमेरिका युद्ध खत्म करने से जुड़े पहले के समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर फिर लौटेगा।
यह समझौता ज्ञापन अगस्त के मध्य में बिना किसी शांति समझौते के खत्म हो गया था। पेजेशकियन ने नवंबर में होने वाले अमेरिका के मध्यावधि चुनाव से पहले इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की उम्मीद जताई है।
सिडनी में केसीएम ट्रेड के मुख्य बाजार विश्लेषक टिम वॉटर ने कहा कि युद्ध के बाद के स्तरों की तुलना में तेल की मौजूदा कीमतें अभी भी काफी ऊंची हैं। उनके अनुसार, इससे यह पता चलता है कि तेल की जरूरी आपूर्ति वाले रास्ते और सुविधाएं अब भी खतरे से पूरी तरह बाहर नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र में चल रही कूटनीतिक कोशिशें कीमतों पर कुछ दबाव कम कर रही हैं, लेकिन स्थायी तनाव कम होने के स्पष्ट संकेत नहीं मिलने तक तेल की कीमतों में ऊपर जाने का रुख बना रह सकता है।
सिंगापुर की स्पार्टा कमोडिटीज की वरिष्ठ तेल बाजार विश्लेषक जून गोह ने भी कहा कि ईरान से जुड़ा युद्ध जारी रहने तक तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहने की संभावना है। उनके मुताबिक, स्थिति का साफ समाधान नहीं निकलने से दुनिया के कई हिस्सों में तेल भंडार और उपलब्ध आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ रहा है।
बता दें कि तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर सिर्फ ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहता है। कच्चा तेल महंगा होने पर परिवहन, उत्पादन और कई जरूरी सामान की लागत बढ़ सकती है। ऐसे में मध्य पूर्व में जारी तनाव और आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा पर दुनिया भर के बाजारों की नजर बनी हुई हैं।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi









