अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप इंतनो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा सरपंच मान रहे हैं। इसलिए तो वह दुनिया भर के झगड़ों में टांग अड़ा रहे हैं। भले ही कई देशों के बीच जंग रुकवाने का दावा करने वाले ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार पाने की लालसा में खुद को शांतिदूत घोषित कर रहे हो लेकिन सच यह है कि जैसी उनकी हरकतें हैं उसके हिसाब से वह शांतिदूत कम हिटलर ज्यादा लग रहे हैं। वैसे तो ट्रंप ने अपनी दादागिरी और कब्जे वाले नीति से दुनिया भर में बवाल मचाया हुआ है। लेकिन अब ट्रंप गाजा बोर्ड ऑफ पीस को लेकर सुर्खियों में है। ट्रंप ने इस बोर्ड का ऐलान गाजा में चीजों को पटरी पर लाने के लिए किया है। ट्रंप के हिसाब से यह बोर्ड इजराइल हमास युद्ध को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। साथ ही गाजा के रोजमर्रा के मामलों को संभालने के लिए एक तकनीकी समिति का ऑब्जरवेशन करेगा और वहां के पुनर्निर्माण के लिए स्ट्रेटजी बनाएगा।
ट्रंप ने भारत को भी गाजा शांति बोर्ड में शामिल होने के लिए न्योता दिया है। जिसको लेकर तमाम तरह की चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि ट्रंप भारत को इस बोर्ड में शामिल करके पीएम मोदी को फंसाना चाहते हैं। दरअसल अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप आए दिन ऐसे एजेंडे लेकर सामने आते रहते हैं जो भले ही दुनिया भर के देशों की नीतियों के खिलाफ हो लेकिन उसमें उनका हित सबसे ऊपर होता है। ऐसा ही कुछ उनकी ओर से गाजा के पुनर्निर्माण के लिए बनाए जा रहे शांति बोर्ड में भी दिख रहा है। गाजा शांति के नाम पर दुनिया भर में वाहवाही बटोरने और आर्थिक लाभ पाने की दुकान चलाने के मकसद से ट्रंप ने शांति बोर्ड का ऐलान किया है। ट्रंप के इस बोर्ड ऑफ पीस के मेंबर देशों को $1 अरब डॉलर यानी कि करीब ₹9000 करोड़ देने होंगे। जिससे साफ है कि ट्रंप का यह बोर्ड गाजा में शांति कम बल्कि उनकी कमाई का जरिया लग रहा है।
इतनी भारी भरकम फीस को देखकर कनाडा और फ्रांस ने तो इसमें शामिल ना होने का इशारा कर दिया है। तो व इस शांति बोर्ड का भारत को मेंबर बनाकर ट्रंप पीएम मोदी को फंसाने की कोशिश कर रहे हैं। जिस गाजा के पुनर्निर्माण के लिए ट्रंप ने यह बोर्ड बनाया है, उसी गांजा के आतंकी पीओके में मुनीर के जिहादियों से हाथ मिलाकर भारत के खिलाफ साजिशें रच रहे हैं। क्योंकि इजराइल ने हमास के आतंकियों को गाजा छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। ऐसे में बचे कुचे हमास के आतंकियों ने अब पाकिस्तान में शरण ले ली है। अगर भारत हमास की आर्थिक मदद करता है तो पाकिस्तान पहुंचे आतंकी फिर से गाजा में आएंगे और अपनी आतंकी जमीन को मजबूत करके भारत के साथी उसके दोस्त इजराइल को भी नुकसान पहुंचाएंगे।
ऐसे में भारत को सोच समझकर ट्रंप के शांति बोर्ड पर फैसला लेना पड़ेगा। ट्रंप के इस ट्रैप में खुद को और भारत को फंसता देखकर इजराइल भड़क उठा है। बोर्ड को इजराइली प्रधानमंत्री कार्यालय ने इजराइल की सरकारी नीति के खिलाफ बताया है। इजराइल का कहना है कि बोर्ड की घोषणा को लेकर उससे बात नहीं की गई। बोर्ड में आतंकी मुल्क पाकिस्तान, तुर्की और क़तर को शामिल किए जाने को लेकर भी इजराइल ने कड़ी आपत्ति जताई है।
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यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने विश्व आर्थिक मंच पर बोलते हुए कहा कि यूरोपीय संघ और भारत मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। उन्होंने कहा कि कुछ काम अभी बाकी है, लेकिन समझौता लगभग तैयार है और इसके विशाल आकार और प्रभाव को देखते हुए इसे "सभी व्यापार समझौतों की जननी" बताया। उन्होंने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच संभावित व्यापार समझौता दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक समझौतों में से एक बन सकता है। वॉन डेर लेयेन ने कहा कि अभी कुछ काम बाकी है। लेकिन हम एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते की कगार पर हैं। कुछ लोग इसे सभी समझौतों की जननी कहते हैं। यह एक ऐसा समझौता होगा जो 2 अरब लोगों का बाजार बनाएगा, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग एक चौथाई हिस्सा होगा।
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते पर बातचीत पहली बार 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन लगभग दस वर्षों तक ठप रही। दोनों पक्षों के नए राजनीतिक समर्थन के साथ 2022 में वार्ता फिर से शुरू हुई। तब से, भारत-यूरोपीय संघ व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद के तहत नियमित वार्ताओं की मदद से प्रगति में तेजी आई है। यह समझौता दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक, भारत को दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक गुटों में से एक, यूरोपीय संघ से जोड़ेगा। ऐसे समय में जब देश जोखिम कम करने और केवल एक साझेदार पर निर्भरता से बचने की कोशिश कर रहे हैं, यह समझौता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और व्यापार मार्गों को नया रूप दे सकता है।
यूरोपीय संघ के लिए, भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार बनता जा रहा है क्योंकि वह चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और विश्वसनीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ अधिक निकटता से काम करना चाहता है। भारत के लिए, यूरोपीय संघ के 27 देशों तक बेहतर पहुंच, जो पहले से ही उसका दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, निर्यात को बढ़ावा देने, रोजगार सृजित करने और उसके विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने में सहायक होगी।
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