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भारत@स्पेस 2025: अंतरिक्ष में भारत की निर्णायक छलांग का स्वर्णिम अध्याय

वर्ष 2025 भारत के अंतरिक्ष इतिहास में वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता, तकनीकी परिपक्वता और वैश्विक नेतृत्व का प्रतीक बनकर उभरा। यह वह वर्ष रहा, जब भारत ने अंतरिक्ष को केवल शोध और प्रयोगशाला की सीमाओं से निकालकर रणनीतिक शक्ति, आर्थिक अवसर और वैश्विक साझेदारी के केंद्र में स्थापित कर दिया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 2025 में जो उपलब्धियां हासिल की, वे यह स्पष्ट करती हैं कि भारत अब अंतरिक्ष की दौड़ में अनुयायी नहीं बल्कि एजेंडा तय करने वाला देश बन चुका है। इस वर्ष 200 से अधिक सफल मिशन, भारी संचार उपग्रह का प्रक्षेपण, क्रायोजेनिक तकनीक में आत्मनिर्भरता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मानव अंतरिक्ष उड़ान, ये सभी उपलब्धियां मिलकर भारत की बढ़ती अंतरिक्ष शक्ति की ठोस तस्वीर पेश करती हैं।

वाणिज्यिक अंतरिक्ष में भारत का आत्मविश्वास

2025 का समापन जिस मिशन के साथ हुआ, उसने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर नई मजबूती के साथ स्थापित कर दिया। 24 दिसंबर को इसरो के एलवीएम-3 ‘बाहुबली’ रॉकेट द्वारा 6100 किलोग्राम वजनी अत्याधुनिक संचार उपग्रह ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का सफल प्रक्षेपण, भारत की हैवी-लिफ्ट क्षमता का निर्णायक प्रमाण बना। यह उपलब्धि केवल एक तकनीकी सफलता नहीं थी बल्कि यह उस भरोसे की घोषणा थी, जो अब वैश्विक स्पेस मार्किट में भारत के साथ जुड़ चुकी है। कम लागत, उच्च विश्वसनीयता और समयबद्ध प्रक्षेपण, इन तीनों के संतुलन ने भारत को अमेरिका और यूरोप के स्थापित अंतरिक्ष खिलाड़ियों की पंक्ति में खड़ा कर दिया है। ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 मिशन ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब केवल अंतरिक्ष अभियानों में भागीदार नहीं बल्कि वाणिज्यिक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का भरोसेमंद स्तंभ बन चुका है।

आत्मनिर्भरता की रीढ़ ‘एलवीएम-3’ और ‘क्रायोजेनिक’ तकनीक

वर्ष 2025 में एलवीएम-3 की निरंतर सफल उड़ानों ने स्पष्ट कर दिया कि भारत की हेवी-लिफ्ट रॉकेट क्षमता अब प्रयोग और परीक्षण के दौर से आगे निकलकर पूर्ण ऑपरेशनल परिपक्वता हासिल कर चुकी है। इसरो द्वारा सी-25 क्रायोजेनिक अपर स्टेज के इन-ऑर्बिट इग्निशन का सफल परीक्षण तकनीकी दृष्टि से एक ऐतिहासिक उपलब्धि रहा। इसके साथ ही सेमी-क्रायोजेनिक इंजन एसई2000 का सफल हॉट-टेस्ट भारत को उन गिने-चुने देशों की श्रेणी में ले आया है, जिनके पास संपूर्ण रॉकेट-चेन तकनीक स्वदेशी रूप से उपलब्ध है। इसका सीधा अर्थ है, रणनीतिक स्वतंत्रता, कम विदेशी निर्भरता और गगनयान जैसे भविष्य के मानव अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक मजबूत, आत्मनिर्भर आधार।

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सूर्य विज्ञान में भारत की वैश्विक भूमिका

भारत का पहला सौर मिशन आदित्य-एल1 वर्ष 2025 में वैज्ञानिक उपलब्धियों के नए शिखर पर पहुंचा। सूर्य-पृथ्वी के एल1 बिंदु से इस मिशन द्वारा एकत्र किए गए लगभग 15 टेराबाइट वैज्ञानिक डेटा को वैश्विक शोध समुदाय के लिए सार्वजनिक करना, भारत की ओपन-साइंस नीति और सहयोगात्मक नेतृत्व का सशक्त उदाहरण है। यह पहल भारत को केवल डेटा-उपभोक्ता नहीं बल्कि ज्ञान-प्रदाता राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है। आदित्य-एल1 से प्राप्त सूचनाएं सौर ज्वालाओं, कोरोना की संरचना और अंतरिक्ष मौसम को समझने में निर्णायक साबित हो रही हैं। इसका व्यावहारिक लाभ उपग्रह संचार की सुरक्षा, बिजली ग्रिड की स्थिरता और जलवायु परिवर्तन से जुड़े पूर्वानुमानों में भी दिखाई दे रहा है। इस मिशन ने सूर्य विज्ञान में भारत को वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया है।

भारत-अमेरिका साझेदारी का नया आयाम ‘निसार’

वर्ष 2025 की सबसे महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष उपलब्धियों में निसार उपग्रह का प्रक्षेपण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। यह मिशन इसरो और नासा के बीच गहराते वैज्ञानिक सहयोग का सशक्त प्रतीक है। निसार दुनिया का पहला ऐसा अत्याधुनिक रडार इमेजिंग सैटेलाइट है, जो दो अलग-अलग फ्रीक्वेंसी बैंड का उपयोग करता है, जिससे पृथ्वी की सतह की अत्यंत सूक्ष्म गतिविधियों पर निरंतर निगरानी संभव हो सकेगी। भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी, ग्लेशियर पिघलना, भूस्खलन और जलवायु परिवर्तन जैसे जटिल प्राकृतिक घटनाओं के अध्ययन में यह उपग्रह निर्णायक भूमिका निभाएगा। निसार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल उन्नत तकनीक सीखने वाला देश नहीं बल्कि वैश्विक चुनौतियों के समाधान में बराबरी का भागीदार बन चुका है।

निरंतरता का कीर्तिमान 100वां रॉकेट प्रक्षेपण

29 जनवरी 2025 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इसरो ने अपने 100वें रॉकेट प्रक्षेपण के साथ इतिहास रच दिया। जीएसएलवी-एफ15 रॉकेट द्वारा एनवीएस-02 उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा जाना भले ही कुछ तकनीकी चुनौतियों के साथ रहा हो, फिर भी यह भारत की निरंतर, भरोसेमंद और परिपक्व लॉन्च क्षमता का सशक्त प्रमाण बना। यह उपलब्धि इस बात को रेखांकित करती है कि भारत अब अंतरिक्ष अभियानों को किसी एक अवसर या उत्सव की तरह नहीं बल्कि नियमित राष्ट्रीय क्षमता के रूप में संचालित कर रहा है। बार-बार सफल प्रक्षेपण, सटीक समयबद्धता और संस्थागत स्थिरता यह दर्शाती है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक रणनीतिक सोच के मजबूत चरण में प्रवेश कर चुका है।

अंतरिक्ष डॉकिंग में भारत की ऐतिहासिक सफलता

जनवरी 2025 में ‘स्पैडेक्स’ (स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट) के अंतर्गत दो भारतीय उपग्रहों का सफलतापूर्वक डॉक होना, भारत के अंतरिक्ष इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इस उपलब्धि के साथ भारत अंतरिक्ष डॉकिंग जैसी अत्यंत जटिल और संवेदनशील तकनीक में सफलता प्राप्त करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया। यह प्रयोग इसरो की उच्च तकनीकी दक्षता, सटीक नियंत्रण प्रणाली और दीर्घकालिक दृष्टि का प्रमाण है। स्पैडेक्स की सफलता भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना, चंद्रमा पर मानव मिशन तथा गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए ठोस आधार प्रदान करती है। यह उपलब्धि स्पष्ट संकेत देती है कि भारत अब केवल अल्पकालिक अभियानों तक सीमित नहीं बल्कि दीर्घावधि मानव अंतरिक्ष अभियानों के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह तैयार है।

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भारतीय उपस्थिति

वर्ष 2025 का सबसे भावनात्मक और प्रेरणादायी क्षण वह रहा, जब एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर कदम रखा। एक्सिओम-4 मिशन के तहत अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला का आईएसएस पर लगभग 18 दिनों का प्रवास, राकेश शर्मा के बाद भारत की मानव अंतरिक्ष यात्रा में एक ऐतिहासिक अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं थी बल्कि इससे पूरे देश में गर्व और आत्मविश्वास की भावना जागृत हुई। इस मिशन ने यह सिद्ध किया कि भारतीय अंतरिक्ष यात्री वैश्विक मानकों पर खरे उतरने में पूरी तरह सक्षम हैं। साथ ही, यह अनुभव गगनयान कार्यक्रम के लिए तकनीकी, मानवीय और परिचालन स्तर पर अमूल्य साबित हुआ। यह मिशन भारत की मानव अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को नई उड़ान देने वाला आत्मविश्वास का सशक्त प्रतीक बन गया।

200+ मिशन और बदलता दृष्टिकोण

इसरो प्रमुख वी. नारायणन द्वारा उल्लेखित 200 से अधिक अंतरिक्ष मिशन केवल संख्यात्मक उपलब्धि नहीं हैं बल्कि वे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में आए गुणात्मक परिवर्तन का संकेत देते हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत ने अंतरिक्ष को अब केवल वैज्ञानिक प्रयोगों तक सीमित नहीं रखा है बल्कि उसे नीति, उद्योग, स्टार्ट-अप और शिक्षा से प्रभावी रूप से जोड़ दिया है। निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी, एनएसआईएल और इन-स्पेस जैसी संस्थाओं की सक्रिय भूमिका तथा उभरता हुआ स्टार्ट-अप इकोसिस्टम, ये सभी मिलकर भारत को एक समग्र और आत्मनिर्भर अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। यह बदला हुआ दृष्टिकोण न केवल नवाचार को प्रोत्साहित कर रहा है बल्कि रोजगार सृजन, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता को भी मजबूती प्रदान कर रहा है।

भविष्य की नींव

वर्ष 2025 ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अंतरिक्ष में केवल उपलब्धियों की सूची गिनाने के चरण से आगे निकल चुका है। आज भारत रणनीति गढ़ रहा है, तकनीकी मानक तय कर रहा है और वैश्विक अंतरिक्ष विमर्श की दिशा को प्रभावित कर रहा है। भारी उपग्रह प्रक्षेपण, सूर्य और पृथ्वी के वैज्ञानिक अध्ययन, अंतरिक्ष डॉकिंग जैसी जटिल तकनीकें और मानव अंतरिक्ष अभियानों में सफलता, भारत ने हर मोर्चे पर अपनी विश्वसनीयता, किफायत और दूरदर्शिता सिद्ध की है। यह वर्ष उस भारत की उद्घोषणा बनकर उभरा, जो आने वाले दशक में अंतरिक्ष को केवल विज्ञान या प्रयोग का क्षेत्र नहीं बल्कि राष्ट्रीय शक्ति, आर्थिक प्रगति और मानव भविष्य की आधारशिला के रूप में विकसित करने के लिए संकल्पित है।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं)

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