Kabul Blast: अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में धमाका, कई लोगों की मौत की खबरें
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में ब्लास्ट हो गया है. ब्लास्ट में अब तक कई लोगों की मौत हो गई है. हालांकि, मृतकों का सही आंकड़ा अब तक सामने नहीं आया है. तालिबानी गृह मंत्रालय ने घटना की पुष्टि की है.
अब जानें क्या है पूरा मामला
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, धमाका सोमवार को काबुल के शहर-ए-नवा इलाके में हुआ है, जहां विदेशी रहते थे. इस इलाके को काबुल के सबसे सुरक्षित इलाकों में से एक माना जाता है. गृहमंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुल मतीन कानी ने मीडिया को बताया कि शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार, कई लोग घटना में मारे गए हैं और घायल हुए हैं. मतीन का कहना है कि घटना का विवरण बाद में जारी किया जाएगा.
देश में अब भी एक्टिव हैं ISIS से जुड़े लोग
बता दें, अमेरिका ने 2021 में जब अफगानिस्तान से वापसी की तो तालिबान ने सत्ता में लौट आई. इसके बाद से काबुल सहित पूरे अफगानिस्तान में धमाके कम हो गए हैं. हालांकि, ISIS से जुड़े लोग अब भी देश में एक्टिव हैं, वे छिटपुट हमले करते रहते हैं.
अफगानिस्तान की सत्ता में काबिज है तालिबान
तालिबान ने वर्षों तक अफगानिस्तान में सशस्त्र विद्रोह किया है. वे अब सत्ता में काबिज हैं. उन्होंने युद्धग्रस्त देश में सुरक्षा को बहाल करने का वादा किया. हालांकि हमले अब भी जारी है, जिनमें से कई हमलों की जिम्मेदारी ISIL ने ली है.
वांसे सम्मेलन: जब हिटलर के सबसे क्रूर सहयोगी की अगुवाई में लिखी गई खौफनाक कहानी
नई दिल्ली, 19 जनवरी (आईएएनएस)। जर्मनी की राजधानी बर्लिन में मौजूद वांसे झील के किनारे स्थित एक आलीशान विला में 20 जनवरी 1942 को नाजी शासन की वह बैठक हुई, जिसने मानव इतिहास के सबसे भयानक अपराध को एक सुनियोजित प्रशासनिक नीति का रूप दे दिया। इस बैठक को इतिहास में “वांसे सम्मेलन” के नाम से जाना जाता है। यहीं पर यूरोप के यहूदियों के सामूहिक नरसंहार, जिसे बाद में “होलोकॉस्ट” कहा गया, को व्यवस्थित रूप से लागू करने की योजना पर अंतिम मुहर लगाई गई थी।
वांसे सम्मेलन की अध्यक्षता नाजी नेता और एसएस अधिकारी राइनहार्ड हाइड्रिख ने की, जो हिटलर के सबसे क्रूर और प्रभावशाली सहयोगियों में गिने जाते थे। बैठक में नाजी शासन के विभिन्न मंत्रालयों और सुरक्षा एजेंसियों के लगभग 15 वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इनमें गृह मंत्रालय, न्याय मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और एसएस के शीर्ष अधिकारी थे। यह तथ्य स्वयं में बताता है कि यह नरसंहार केवल कट्टरपंथी हिंसा नहीं, बल्कि राज्य की पूरी मशीनरी द्वारा समर्थित और संचालित अपराध था।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य तथाकथित “यहूदी प्रश्न के अंतिम समाधान,” यानी फाइनल सॉल्यूशन को स्पष्ट करना था। हालांकि इससे पहले भी यहूदियों के उत्पीड़न, गेट्टो में बंदीकरण और सामूहिक हत्याएं शुरू हो चुकी थीं, लेकिन वान्जी सम्मेलन ने इन कार्रवाइयों को एक संगठित, कानूनी और प्रशासनिक ढांचे में ढाल दिया। बैठक में यूरोप के विभिन्न देशों में रहने वाले लगभग 1 करोड़ 10 लाख यहूदियों की सूची तक प्रस्तुत की गई, जिन्हें नाजी योजना के तहत निशाना बनाया जाना था।
वांसे सम्मेलन की सबसे भयावह बात यह थी कि इसमें किसी भी तरह की नैतिक बहस नहीं हुई। यहूदियों की हत्या को एक “प्रशासनिक समस्या” की तरह देखा गया—किसे कहां भेजना है, परिवहन कैसे होगा, श्रम शिविरों में किसे रखा जाएगा और किसे सीधे मौत के घाट उतार दिया जाएगा। ऑशविट्ज, ट्रेब्लिंका और सोबिबोर जैसे मृत्यु शिविरों में बाद में जो औद्योगिक स्तर की हत्याएं हुईं, उनकी नींव इसी सोच में निहित थी।
इतिहासकार मानते हैं कि वांसे सम्मेलन होलोकॉस्ट की शुरुआत नहीं था, लेकिन यह उसका निर्णायक मोड़ अवश्य था। इसके बाद नरसंहार और अधिक तेज, संगठित और व्यापक हो गया।
--आईएएनएस
केआर/
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