तेलंगाना में दर्दनाक हादसा: डिवाइडर से टकराने के बाद कार में लगी भीषण आग, 50 वर्षीय डॉक्टर की मौत
Telangana car fire accident: तेलंगाना के सूर्यपेट जिले से एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। यहां रविवार सुबह एक तेज रफ्तार कार अनियंत्रित होकर डिवाइडर से जा टकराई, जिसके तुरंत बाद वाहन में भीषण आग लग गई। इस भयावह हादसे में कार चला रहे 50 वर्षीय डॉक्टर की जलकर दर्दनाक मौत हो गई। घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय प्रशासन और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया।
हैदराबाद-खम्मम हाईवे पर हुआ हादसा
अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक, यह दुर्घटना सुबह करीब 7:15 बजे हैदराबाद-खम्मम राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 365BB) पर स्थित पिल्ललामर्री फ्लाईओवर के पास हुई। मृत चिकित्सक की पहचान डॉ. जगदीश के रूप में हुई है, जो खम्मम के ममता अस्पताल में न्यूरोसर्जन के पद पर सेवाएं दे रहे थे। मूल रूप से वाइरा के रहने वाले डॉ. जगदीश अकेले ही हैदराबाद से खम्मम की ओर जा रहे थे, तभी यह दुर्भाग्यपूर्ण हादसा हो गया। दुर्घटना के कई फोटो और वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं।
Neurosurgeon Burnt Alive After His Car Crashes into Divider in Suryapet
— Sowmith Yakkati (@YakkatiSowmith) September 20, 2026
A horrific road accident occurred on National Highway 365, connecting Suryapet and Khammam.
Near Pillalamarri, a Volvo car reportedly lost control, hit the road divider at high speed and suddenly caught… pic.twitter.com/eCSKMR8XYg
टोल गेट और नंबर प्लेट से हुई पहचान
घटनास्थल पर मौजूद स्थानीय लोगों ने तुरंत मदद के लिए दौड़ लगाई और पुलिस तथा दमकल विभाग को इसकी सूचना दी। सूचना मिलते ही दमकल की एक गाड़ी मौके पर पहुंची और कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक कार पूरी तरह जलकर खाक हो चुकी थी। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, एक अधिकारी ने बताया कि बाद में ड्राइवर की सीट पर एक जला हुआ शव बरामद किया गया। पास के टोल प्लाजा से मिली जानकारी और कार के अस्थायी पंजीकरण नंबर के आधार पर मृतक की शिनाख्त डॉक्टर के रूप में की गई।
पुलिस जांच और फोरेंसिक टीम की कार्रवाई
हादसे की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली है। मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए सूर्यपेट गवर्नमेंट जनरल अस्पताल भेज दिया गया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की गहराई से जांच की जा रही है और जांच के बाद ही अन्य सभी तथ्य सामने आएंगे। इसके अलावा, फोरेंसिक विशेषज्ञों की टीम ने भी घटनास्थल से अहम साक्ष्य जुटाए हैं ताकि दुर्घटना के सटीक कारणों का पता लगाया जा सके।
दिल्ली में टला था बड़ा हादसा
गौरतलब है कि लगभग एक हफ्ते पहले दिल्ली के आज़ादपुर चौक पर भी कार में आग लगने की एक ऐसी ही घटना सामने आई थी। हालांकि, वहां तैनात यातायात पुलिसकर्मियों की सूझबूझ और त्वरित कार्रवाई के चलते बड़ा हादसा टल गया था और कार सवारों की जान बचा ली गई थी। शालीमार बाग से आज़ादपुर की तरफ जा रही उस कार में अचानक आग लग गई थी, जिसमें 26 वर्षीय चालक हर्ष जैन और अन्य लोग सवार थे जिन्हें सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया था।
भक्ति की कसौटी: अपने में न्यूनता और सबमें आत्मीयता का भाव
जितने बड़े भक्त, उतनी अधिक उन्हें अपने में न्यूनता दिखाई देती है।
दो गुरु-भाई थे। दोनों आपस में लड़ रहे थे। दोनों का कहना था, “मैं जितना भजन-पूजन करता हूं, तू उतना नहीं करता। तुझसे अधिक महान तो मैं हूं। मैं तो बहुत महान हूं, तू कुछ नहीं है।”
इसी तू-तू, मैं-मैं के बीच दोनों स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, “प्रभु, आप बताइए। आप गुरु-पद पर हैं और हमें ठीक से जानते हैं।”
स्वामीजी बोले, “जो अपने को छोटा माने, वह महान।”
महानता का लक्षण अपने को छोटा मानना है, विशेषकर भगवद्भक्त के लिए। जो लोग पूजा-पाठ करते हैं, भजन करते हैं, तीर्थ और उपवास करते हैं, गुरु-चरणों में दीक्षित हैं और संतों का सम्मान करते हैं, उनमें यह भाव होना आवश्यक है।
गुरु नानक देवजी ने भी यही बात कही है-
“जो अपने को जाने नीचा, सो सबसे ऊंचा।”
आत्म-निरीक्षण
अब अपने मन में सोचकर देख लें।
क्या हमें ऐसा लगता है कि हम अन्य साधकों की अपेक्षा नीचे हैं?
या हमें लगता है कि हम उनसे थोड़ा ऊंचे उठे हुए हैं?
क्या हमारा मन ऐसा मानता है कि जो सत्संगी लोग हैं, वे हमसे अधिक साधना करने वाले हैं? या साधना करें न करें, कहीं न कहीं, किसी न किसी गुण में वे हमसे अधिक हैं?
अपने-अपने मन में स्वयं विचार करके देखें। अपने मन में झांककर देखें। अन्तर्दृष्टि से देखें, भीतर की आंखों से देखें।
साधना एक क्रिया का नाम है, लेकिन भगवान क्रिया से अधिक मानसिकता की बात करते हैं। जिसका मन आपसे अधिक सुंदर है, वह आपसे अधिक महान है।
कमी ठाकुर में या हमारे में?
अब अपने मन में यह भी विचार करें- अगर ठाकुर का साक्षात्कार नहीं हुआ, तो कमी ठाकुर में है या हमारे में?
पूज्य श्री जयदयाल गोयनका जी कहते थे कि यदि तुम्हें भगवान के दर्शन की चाहत है और साक्षात्कार नहीं हुआ, तो कमी या तो तुममें है या भगवान में। अगर तुम भक्त हो, तो तुम जानते हो कि भगवान में कमी नहीं हुआ करती। भगवान तो परिपूर्ण हैं।
उपनिषद् का शान्तिपाठ भी कहता है-
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
-ईशावास्योपनिषद्, शान्तिपाठ
भगवान तो परिपूर्ण हैं। इसलिए यदि कहीं कमी है, तो वह हमारे भीतर है। हमें अपने मन में झांककर देखना चाहिए कि ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके कारण सर्वसमर्थ, भक्तवत्सल और दयालु ठाकुर हमें अपनी कृपा का पात्र नहीं बना रहे हैं।
जीवमात्र से प्यार, आसक्ति किसी में नहीं
भगवत्प्राप्ति और भगवत्साक्षात्कार का भी एक लक्षण है- जीवमात्र से प्रेम, लेकिन किसी में आसक्ति नहीं।
दोनों बातें महत्वपूर्ण हैं- जीवमात्र से प्रेम और किसी में आसक्ति न होना।
इसका एक छोटा-सा उदाहरण समझिए। किसी तकनीकी कॉलेज में आपने अपने बेटे का दाखिला कराना है। एक दूसरा लड़का आपके बेटे से अधिक योग्य है। भगवद्भाव यह है कि जो अधिक योग्य है, उसे दाखिला मिल जाए।
इसके विपरीत सामान्य मनुष्य का मन यह चाहता है कि लड़का जैसा भी हो, दाखिला उसी को मिले। पैसे भी हमारे पास हैं, कुछ न कुछ करके काम हो जाएगा।
लेकिन भगवद्भाव रखने वाले व्यक्ति की सोच अलग होती है। वह चाहता है कि जो योग्य है, उसे अवसर मिले।
यही भेदभाव का अभाव है। यही अपने-पराए के भाव से ऊपर उठना है। सभी अपने हैं।
“आत्मवत् सर्वभूतेषु, निर्वैरः सर्वभूतेषु।”
- महाभारत, अश्वमेधिक पर्व 19.3; श्रीमद्भगवद्गीता 11.55
सर्वात्मभाव, एकात्मभाव और परमात्मभाव की यही अनिवार्यता है।
भगवद्दर्शन प्राप्त व्यक्ति का और भगवत्कृपा प्राप्त व्यक्ति का ऐसा सहज स्वरूप और स्वभाव बन जाता है।
कोई भी भक्त-गाथा पढ़कर देखिए। जितनी भक्त-गाथाएं पढ़ेंगे, उनमें यह गुण अवश्य मिलेगा- सुख-दुःख में समान रहना, मान-अपमान में समान रहना, किसी को ईर्ष्या की दृष्टि से न देखना, सबका हित-चिंतन करना और सबका भला करना।
साधना की कसौटी
अतः साधना की कसौटी केवल यह नहीं है कि हम कितना भजन-पूजन करते हैं। हमें अपने मन में झांककर देखना है कि हमारी मानसिकता कैसी है?
क्या हमें दूसरे साधक अपने से अधिक दिखाई देते हैं?
क्या हम किसी दूसरे के गुण को सहज भाव से स्वीकार कर सकते हैं?
क्या हमारे भीतर से अपने-पराए का भेद मिट रहा है?
क्या सबके हित का चिंतन और सबका भला करने का भाव हमारे भीतर विकसित हो रहा है?
भगवान क्रिया की बात नहीं करते, भगवान मानसिकता की बात करते हैं।
जिसका मन आपसे अधिक सुंदर, वह आपसे अधिक महान।
और भगवद्भक्त की महानता का सहज लक्षण यही है- जितना वह ऊंचा होता जाता है, उतनी ही अधिक उसे अपने भीतर न्यूनता दिखाई देती है।
‘श्री भाइसाब’ के सत्संग से
संकलन एवं प्रस्तुति: भारती अरोड़ा
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