भक्ति की कसौटी: अपने में न्यूनता और सबमें आत्मीयता का भाव
जितने बड़े भक्त, उतनी अधिक उन्हें अपने में न्यूनता दिखाई देती है।
दो गुरु-भाई थे। दोनों आपस में लड़ रहे थे। दोनों का कहना था, “मैं जितना भजन-पूजन करता हूं, तू उतना नहीं करता। तुझसे अधिक महान तो मैं हूं। मैं तो बहुत महान हूं, तू कुछ नहीं है।”
इसी तू-तू, मैं-मैं के बीच दोनों स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, “प्रभु, आप बताइए। आप गुरु-पद पर हैं और हमें ठीक से जानते हैं।”
स्वामीजी बोले, “जो अपने को छोटा माने, वह महान।”
महानता का लक्षण अपने को छोटा मानना है, विशेषकर भगवद्भक्त के लिए। जो लोग पूजा-पाठ करते हैं, भजन करते हैं, तीर्थ और उपवास करते हैं, गुरु-चरणों में दीक्षित हैं और संतों का सम्मान करते हैं, उनमें यह भाव होना आवश्यक है।
गुरु नानक देवजी ने भी यही बात कही है-
“जो अपने को जाने नीचा, सो सबसे ऊंचा।”
आत्म-निरीक्षण
अब अपने मन में सोचकर देख लें।
क्या हमें ऐसा लगता है कि हम अन्य साधकों की अपेक्षा नीचे हैं?
या हमें लगता है कि हम उनसे थोड़ा ऊंचे उठे हुए हैं?
क्या हमारा मन ऐसा मानता है कि जो सत्संगी लोग हैं, वे हमसे अधिक साधना करने वाले हैं? या साधना करें न करें, कहीं न कहीं, किसी न किसी गुण में वे हमसे अधिक हैं?
अपने-अपने मन में स्वयं विचार करके देखें। अपने मन में झांककर देखें। अन्तर्दृष्टि से देखें, भीतर की आंखों से देखें।
साधना एक क्रिया का नाम है, लेकिन भगवान क्रिया से अधिक मानसिकता की बात करते हैं। जिसका मन आपसे अधिक सुंदर है, वह आपसे अधिक महान है।
कमी ठाकुर में या हमारे में?
अब अपने मन में यह भी विचार करें- अगर ठाकुर का साक्षात्कार नहीं हुआ, तो कमी ठाकुर में है या हमारे में?
पूज्य श्री जयदयाल गोयनका जी कहते थे कि यदि तुम्हें भगवान के दर्शन की चाहत है और साक्षात्कार नहीं हुआ, तो कमी या तो तुममें है या भगवान में। अगर तुम भक्त हो, तो तुम जानते हो कि भगवान में कमी नहीं हुआ करती। भगवान तो परिपूर्ण हैं।
उपनिषद् का शान्तिपाठ भी कहता है-
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
-ईशावास्योपनिषद्, शान्तिपाठ
भगवान तो परिपूर्ण हैं। इसलिए यदि कहीं कमी है, तो वह हमारे भीतर है। हमें अपने मन में झांककर देखना चाहिए कि ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके कारण सर्वसमर्थ, भक्तवत्सल और दयालु ठाकुर हमें अपनी कृपा का पात्र नहीं बना रहे हैं।
जीवमात्र से प्यार, आसक्ति किसी में नहीं
भगवत्प्राप्ति और भगवत्साक्षात्कार का भी एक लक्षण है- जीवमात्र से प्रेम, लेकिन किसी में आसक्ति नहीं।
दोनों बातें महत्वपूर्ण हैं- जीवमात्र से प्रेम और किसी में आसक्ति न होना।
इसका एक छोटा-सा उदाहरण समझिए। किसी तकनीकी कॉलेज में आपने अपने बेटे का दाखिला कराना है। एक दूसरा लड़का आपके बेटे से अधिक योग्य है। भगवद्भाव यह है कि जो अधिक योग्य है, उसे दाखिला मिल जाए।
इसके विपरीत सामान्य मनुष्य का मन यह चाहता है कि लड़का जैसा भी हो, दाखिला उसी को मिले। पैसे भी हमारे पास हैं, कुछ न कुछ करके काम हो जाएगा।
लेकिन भगवद्भाव रखने वाले व्यक्ति की सोच अलग होती है। वह चाहता है कि जो योग्य है, उसे अवसर मिले।
यही भेदभाव का अभाव है। यही अपने-पराए के भाव से ऊपर उठना है। सभी अपने हैं।
“आत्मवत् सर्वभूतेषु, निर्वैरः सर्वभूतेषु।”
- महाभारत, अश्वमेधिक पर्व 19.3; श्रीमद्भगवद्गीता 11.55
सर्वात्मभाव, एकात्मभाव और परमात्मभाव की यही अनिवार्यता है।
भगवद्दर्शन प्राप्त व्यक्ति का और भगवत्कृपा प्राप्त व्यक्ति का ऐसा सहज स्वरूप और स्वभाव बन जाता है।
कोई भी भक्त-गाथा पढ़कर देखिए। जितनी भक्त-गाथाएं पढ़ेंगे, उनमें यह गुण अवश्य मिलेगा- सुख-दुःख में समान रहना, मान-अपमान में समान रहना, किसी को ईर्ष्या की दृष्टि से न देखना, सबका हित-चिंतन करना और सबका भला करना।
साधना की कसौटी
अतः साधना की कसौटी केवल यह नहीं है कि हम कितना भजन-पूजन करते हैं। हमें अपने मन में झांककर देखना है कि हमारी मानसिकता कैसी है?
क्या हमें दूसरे साधक अपने से अधिक दिखाई देते हैं?
क्या हम किसी दूसरे के गुण को सहज भाव से स्वीकार कर सकते हैं?
क्या हमारे भीतर से अपने-पराए का भेद मिट रहा है?
क्या सबके हित का चिंतन और सबका भला करने का भाव हमारे भीतर विकसित हो रहा है?
भगवान क्रिया की बात नहीं करते, भगवान मानसिकता की बात करते हैं।
जिसका मन आपसे अधिक सुंदर, वह आपसे अधिक महान।
और भगवद्भक्त की महानता का सहज लक्षण यही है- जितना वह ऊंचा होता जाता है, उतनी ही अधिक उसे अपने भीतर न्यूनता दिखाई देती है।
‘श्री भाइसाब’ के सत्संग से
संकलन एवं प्रस्तुति: भारती अरोड़ा
Anant Chaturdashi 2026: बप्पा को विदा करते समय न करें ये गलतियां, जानें गणपति विसर्जन के जरूरी नियम
Anant Chaturdashi 2026: गणेश उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी के साथ होता है। पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर से शुरू हुआ और गणेश उत्सव का समापन 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा। इन दिनों घरों और पंडालों में गणपति बप्पा की स्थापना कर श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। इसके बाद अपनी परंपरा और श्रद्धा के अनुसार भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
गणपति विसर्जन को केवल मूर्ति को जल में प्रवाहित करने की प्रक्रिया नहीं माना जाता, बल्कि इसे बप्पा को सम्मान और श्रद्धा के साथ विदाई देने की परंपरा से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि विसर्जन के दौरान कुछ धार्मिक और व्यावहारिक बातों का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है।
विसर्जन से पहले करें उत्तर पूजा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणपति विसर्जन से पहले उत्तर पूजा करने की परंपरा है। इस दौरान भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है और उन्हें भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।
कई जगहों पर उत्तर पूजा के बाद गणपति की प्रतिमा को उसके स्थापित स्थान से थोड़ा आगे खिसकाने की परंपरा भी है। इसे बप्पा की विदाई की तैयारी से जोड़कर देखा जाता है।
बप्पा को विदा करते समय क्या करें?
विसर्जन के लिए निकलने से पहले गणपति बप्पा को फूल, दूर्वा, मोदक और अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग अर्पित किया जा सकता है। इसके बाद आरती करके भगवान गणेश से जाने-अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा मांगने की परंपरा है।
प्रतिमा को विसर्जन स्थल तक सम्मानपूर्वक ले जाना चाहिए। इस दौरान परिवार के सदस्य और श्रद्धालु ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ जैसे जयकारों के साथ बप्पा को विदाई देते हैं।
गणपति विसर्जन में किन बातों से बचें?
गणपति विसर्जन के दौरान जल्दबाजी और लापरवाही से बचना चाहिए। प्रतिमा को सम्मानपूर्वक ले जाना और विसर्जन की प्रक्रिया को शांतिपूर्वक पूरा करना चाहिए।
धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण का भी ध्यान रखना जरूरी है। ऐसी जगह प्रतिमा विसर्जित करने से बचना चाहिए, जहां इससे जल प्रदूषण या पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता हो। स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थल और नियमों का पालन करना उचित है।
क्या बप्पा को अकेले विदा करना चाहिए?
गणपति विसर्जन को गणेश उत्सव का अंतिम चरण माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में परिवार और भक्तों के साथ मिलकर बप्पा को विदाई देने की भावना प्रमुख रही है। ऐसे में संभव हो तो परिवार के सदस्य साथ मिलकर गणपति की आरती करें और श्रद्धा के साथ उन्हें विदा करें।
डिस्क्लेमर: इस खबर में बताए गए पूजा और विसर्जन से जुड़े नियम धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा-विधि और विसर्जन की परंपराएं अलग हो सकती हैं।
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