Election Commission में मतभेद कोई नई बात नहीं, पहले भी सामने आ चुके हैं विवाद
(स्लग में बदलाव के साथ) नयी दिल्ली, 23 सितंबर निर्वाचन आयुक्तों के बीच विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर मतभेद की जानकारी सामने आने के बाद ऐसे कम से कम दो पुराने मामले फिर से चर्चा में आ गए हैं, जब निर्वाचन आयोग के सदस्यों के बीच अलग-अलग राय होने की बात सामने आई थी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्ष नेताओं को दी गई ‘क्लीन चिट’ पर असहमति दर्ज कराई थी। उन्होंने मांग की थी कि अंतिम प्रकाशित आदेश में इन असहमति टिप्पणियों को भी रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए।
हालांकि, तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा की अध्यक्षता वाले आयोग ने उनकी मांग यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि निर्वाचन आयोग के कार्यकारी आदेशों में अंतिम फैसलों के साथ असहमति टिप्पणियां संलग्न करने का कोई प्रावधान नहीं है। बाद में लवासा ने एशियाई विकास बैंक (एडीबी) में शामिल होने के लिए निर्वाचन आयोग के पद से इस्तीफा दे दिया था। इसी तरह, मई 2021 में तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार ने मद्रास उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के समक्ष निर्वाचन आयोग के बचाव में अलग-अलग हलफनामा दाखिल करने का प्रयास किया था।
ये टिप्पणियां मद्रास उच्च न्यायालय ने की थीं, जिसमें उसने कहा था कि विधानसभा चुनावों के संचालन के तरीके के कारण कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के लिए निर्वाचन आयोग ‘‘पूरी तरह जिम्मेदार’’ था। तत्कालीन सीईसी सुशील चंद्रा, कुमार द्वारा दाखिल किए जाने वाले हलफनामे के पक्ष में नहीं थे। दोनों के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए थे और यह मामला सुर्खियों में आया था।
निर्वाचन आयोग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मौजूदा निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची के जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने समेत विभिन्न मुद्दों पर चिंता जताई है।
Supreme Court ने संवैधानिक मुद्दों के लिए CJI से पांच जजों की स्थायी पीठ बनाने का आग्रह किया
उच्चतम न्यायालय ने वृहद पीठों को भेजे गए मामलों के निपटारे में हो रही “अत्यधिक देरी” का उल्लेख करते हुए बुधवार को भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) से संवैधानिक मुद्दों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की एक स्थायी पीठ गठित करने की संभावना तलाशने का अनुरोध किया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस देरी को “गंभीर चिंता” का विषय बताया और कहा कि आत्ममंथन की जरूरत है, क्योंकि संदर्भों का बहुत लंबे समय तक लंबित रहना संस्था की छवि के लिए अच्छा नहीं है। पीठ की यह टिप्पणी तब आई, जब दोनों न्यायाधीशों ने 2023 के उस कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के संबंध में अलग-अलग राय दी, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले पैनल से सीजेआई को बाहर रखा गया है।
दोनों न्यायाधीशों की राय इस बात पर अलग थी कि क्या इन याचिकाओं को वृहद पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि यदि आंकड़ों को आधार माना जाए, तो कोई भी उचित स्तर की निश्चितता के साथ यह नहीं बता सकता कि लंबे समय से लंबित संदर्भों का निपटारा कब होगा। पीठ ने कहा, “निश्चित रूप से आत्ममंथन की जरूरत है।
इसलिए हम इस अवसर पर सीजेआई से अनुरोध करते हैं कि वह शुद्ध संवैधानिक मुद्दों पर फैसला करने के लिए पांच न्यायाधीशों की एक स्थायी पीठ गठित करने की संभावना पर भी विचार करें।” पीठ ने कहा, “हम ऐसा कुछ नया नहीं कह रहे हैं। देश के जिम्मेदार नागरिकों ने समय-समय पर यह राय रखी है और हम केवल उसका समर्थन कर रहे हैं।” पीठ ने कहा कि संवैधानिक मुद्दों का समाधान करना शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों का प्राथमिक कार्य है और यह एक प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए। पीठ ने कहा, “संदर्भों का पांच से 20 साल या उससे अधिक समय तक लंबित रहना संस्था की छवि के लिए अच्छा नहीं है।
अब समय आ गया है कि संस्था इस मुद्दे का उस तात्कालिकता और तत्परता से समाधान करे, जिसकी इसे दरकार है।” दोनों न्यायाधीशों ने कहा कि वे नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने हाल ही में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत “इंडस्ट्री” शब्द की परिसे जुड़े विवादास्पद मुद्दे पर फैसला सुनाया था। पीठ ने कहा कि उस मामले में सात न्यायाधीशों की पीठ द्वारा भेजे गए संदर्भ को नौ न्यायाधीशों की पीठ तक पहुंचने में कई साल लग गए। उच्चतम न्यायालय ने 2023 के उस कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को एक वृहद पीठ के पास भेजने के मामले में बुधवार को खंडित फैसला सुनाया, जिसके तहत प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) का चयन करने वाले पैनल से बाहर रखा गया है।
संबंधित पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने केंद्र की इस दलील को मानने से इनकार कर दिया कि याचिकाओं में संवैधानिक महत्व के अहम सवाल उठाए गए हैं और इन्हें पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। पीठ में शामिल न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने न्यायमूर्ति दत्ता की राय से सहमति नहीं जताई। हालांकि, दोनों न्यायाधीश इस बात पर सहमत थे कि मामले को प्रशासनिक स्तर पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष पेश किया जाए, ताकि प्रभावी और आधिकारिक फैसले के लिए उचित पीठ का गठन किया जा सके।
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