मध्य पूर्व में शांति की कोशिशों के बीच अमेरिका की ओर से एक बहुत बड़ा कदम उठाया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा युद्ध को हमेशा के लिए खत्म करने के उद्देश्य से गाज़ा बोर्ड ऑफ पीस के गठन का ऐलान किया है। इस ऐतिहासिक मिशन की सबसे बड़ी खबर यह है कि अमेरिका ने भारत को इस बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए आधिकारिक न्योता भेजा है। राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से भारत अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर ने प्रधानमंत्री मोदी को संदेश दिया। यह ना केवल भारत की वैश्विक साख को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि दुनिया के बड़ेसंघर्षों को सुलझाने में अब भारत की भूमिका कितनी अनिवार्य हो चुकी है।
अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी दी। ट्रंप ने गाजा शांति योजना को शानदार और असाधारण योजना बताया है। वहीं, तुर्किये और कतर के शामिल कराने पर इस्राइल ने नाराजगी जताई है। अब सिर्फ गाजा में इस्राइल हमास युद्ध तक यह बोर्ड सीमित नहीं रहने वाला है। यह बोर्ड धीरे-धीरे एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में आकार ले रहा है, जिसका मकसद बड़े संघर्षों को सुलझाना भी हो सकता है। एक्सपर्ट इसे UN के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। गाजा में अगले कदमों की निगरानी के लिए बनाए गए एग्जिक्यूटिव बोर्ड में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन, ब्रिटेन के पूर्व पीएम टोनी ब्लेयर और विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा शामिल है। बोर्ड ऑफ पीस की औपचारिक घोषणा स्विट्जरलैंड के दावोस में होने वाली वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम बैठक के दौरान किए जाने की संभावना है।
पाकिस्तान ने कहा- हमें भी पत्र मिला है
जिन अन्य नेताओ को निमंत्रण भेजे जाने की पुष्टि हुई है, उनमे कनाडा के पीएम मार्क कार्नी, इजिप्ट के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सीसी और तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप अर्दआन शामिल है। पाकिस्तान ने कहा कि पीएम शहबाज शरीफ को भी बोर्ड में शामिल होने का पत्र मिला है। इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा को लेकर बने पैनल पर आपत्ति जताने के बाद रविवार को अपनी सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार की बैठक बुलाई। नेतन्याहू कार्यालय ने कहा कि बोर्ड की सरचना इस्त्राइल से परामर्श किए बिना तय की गई है और यह नीति के विपरीत है।
29 सितंबर 2025 को मैंने गाज़ा के संघर्ष को खत्म करने के लिए एक पूरी योजना की घोषणा की थी। यह 20 बिंदुओं की योजना है जिसे अरब देशों, इजराइल, यूरोप और दुनिया के कई बड़े नेताओं ने समर्थन दिया। इसके बाद 17 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी इस योजना के समर्थन में प्रस्ताव पास किया। अब समय आ गया है कि हम इन बातों को सिर्फ सोच तक सीमित ना रखें बल्कि इन्हें सच में लागू करें। इस योजना के तहत शांति बोर्ड बनाया जाएगा जो अब तक का सबसे मजबूत और असरदार अंतरराष्ट्रीय समूह होगा।
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पीएम मोदी के बारे में एक बात बड़ी प्रचलित है कि वह जब लाठी चलाते हैं तो ज्यादा आवाज नहीं होती और अब कुछ वैसा ही अमेरिका के साथ हुआ है। अमेरिका के ऊपर भारत ने एक ऐसी लाठी चलाई कि अब इसकी हल्कीफुल्की आवाज आना शुरू हो गई है। हुआ यूं है कि जब अमेरिका ने भारत के ऊपर टेरिफ लगाया, तो इसके बाद भारत ने भी एक काउंटर टेररिफ लगाया है और वह टेरिफ की वजह से जो अमेरिकन फार्मर्स हैं वह बिलबिलाए हुए हैं। जिसके बाद एक चिट्ठी सीधे वाइट हाउस में ट्रंप के पास पहुंचती है। जिसमें वह गिड़गिड़ा रहे हैं कि प्लीज आप पीएम मोदी से बात कीजिए। अमेरिकन फार्मर्स को आप बचाइए और भारत से आप रिक्वेस्ट करें कि वह हमें राहत दें। दरअसल आपको बता दें कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत से आने वाले उत्पादों पर 50% तक का टेरिफ लगाया तो भारत ने भी जवाब देने में देरी नहीं की। भारत ने अमेरिका से आयात होने वाली दालों और फलियों पर 30% टेरिफ लगाया।
जहां अमेरिकी सेनेटरों ने भारत द्वारा दालों पर लगाए गए 30% टैरिफ को हटाने की मांग की है। आपको बता दें सेनेटर अमेरिकी कांग्रेस यानी वहां के संसद में अपने राज्य के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं और इन्हीं चुने हुए प्रतिनिधियों ने अब भारत के द्वारा लगाए गए टैरिफ को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक चिट्ठी लिखी है। इस चिट्ठी में भारत अमेरिका ट्रेड एग्रीमेंट में दलहन वाली फसलों के लिए अनुकूल प्रावधान शामिल करने की मांग की गई है। यानी कि सीनेटर अमेरिका को फायदा देने वाले प्रावधान लाने की अपील कर रहे हैं। इन सेनेटरों का कहना है कि भारत को अमेरिकी पीली मटर पर लगाया गया 30% का टैक्स हटाना चाहिए। चिट्ठी में आगे बताया गया कि नॉर्थ डकोटा और मॉनटाना अमेरिका में मटर और दूसरी दलहन फसलों के सबसे बड़े उत्पादक राज्य हैं। वहीं भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है जो वैश्विक खपत का करीब 27% हिस्सा अकेले इस्तेमाल करता है।
दूसरी मांग यह है कि अमेरिकी दलहन पर लगे टेरिफ को कम कराया जाए और तीसरी मांग यह है कि किसानों के लिए भारत का बाजार दोबारा खोला जाए। अब समझिए कि भारत के इस एक्शन के बारे में यानी कि भारत ने कैसे और क्या काम किया जिससे कि अमेरिका को इतना झटका लग रहा है और अब सीधे अमेरिकी सेनेटर्स ट्रंप को डायरेक्ट चिट्ठी लिख रहे हैं और यह कह रहे हैं कि आप प्लीज पीएम मोदी से बात कीजिए। दरअसल भारत में दालें सिर्फ व्यापार नहीं गरीब की थाली का आधार है। बीते सालों में घरेलू उत्पादन बढ़ा। एमएसपी पर खरीद हुई। किसानों को संरक्षण देना जरूरी था।
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