घर छोड़ने पर तलाक के बाद भी महिला Maintenance की हकदार : Allahabad High Court
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि घर छोड़ने के आधार पर हुए तलाक के मामले में भी महिला अपने पूर्व पति से गुज़ारा भत्ता मांग सकती है, बशर्ते उसने दोबारा शादी न की हो और वह अपना खर्च उठाने में असमर्थ हो। न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र ने सुनीता नामक महिला द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को मंजूरी देते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में सुलतानपुर परिवार अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें उसके गुजारा भत्ता के दावे को खारिज कर दिया गया था।
सुनीता ने 2009 में अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता का मामला दायर किया था। उसने अपने पति और ससुराल के लोगों पर अतिरिक्त दहेज के लिए परेशान करने का आरोप लगाते हुए दावा किया था कि वे दहेज में एक लाख रुपये, एक मोटरसाइकिल और एक रंगीन टेलीविजन की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित कर रहे हैं। हालांकि, सुनीता के पति ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि उसकी पत्नी उसके साथ रहना नहीं चाहती थी इसीलिए उसने उसे छोड़ दिया था।
मामले में इस कार्यवाही के दौरान पति ने 25 सितंबर 2014 को घर छोड़ने के आधार पर एकतरफा विवाह विच्छेद का आदेश हासिल कर लिया था, जिसमें उच्च न्यायालय ने ऐसे सुबूत भी देखे जिनसे पता चला कि उसने बाद में दूसरी शादी कर ली थी और उसके सर्विस रिकॉर्ड में दूसरी महिला का नाम उसकी पत्नी के तौर पर दर्ज था। आदेश के अनुसार पीठ ने कहा कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांगने के सीमित मकसद के लिए तलाकशुदा महिला को पत्नी ही माना जाता है। केवल इस बात से कि विवाह विच्छेद घर छोड़ने के आधार पर हुआ था, उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि तलाकशुदा महिला तब तक गुजारा भत्ता पाने की हकदार है, जब तक वह दोबारा शादी नहीं कर लेती या अपनी कमाई से अपना खर्च उठाने (लागू कानूनी शर्तों के अधीन) में सक्षम नहीं हो जाती। उच्च न्यायालय ने माना कि परिवार अदालत ने सुनीता के दावे को पूरी तरह खारिज करके गलती की थी। अदालत ने कहा कि विवाह विच्छेद से पहले की अवधि के लिए उसके हक की अलग से जांच की जानी चाहिए, लेकिन परिवार अदालत को निर्देश दिया कि वह 25 सितंबर 2014 (विवाह विच्छेद की तारीख) से उसके दावे पर फिर से विचार करे।
मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए परिवार अदालत को वापस भेज दिया गया। उच्च न्यायालय ने मामले पर नए सिरे से सुनवाई होने तक पति को निर्देश दिया कि वह सुनीता को अंतरिम भरण-पोषण के तौर पर हर महीने चार हजार रुपये दे।
सीएमआरएल केस: केरल सरकार ने विजयन और परिवार के खिलाफ जांच को कानूनी रूप से सही बताया
केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने बुधवार को सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता पिनराई विजयन और उनके परिवार के खिलाफ आरोपों की जांच कराने के राज्य सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि यह कानूनी सलाह और उच्चतम न्यायालय के फैसलों पर आधारित है तथा इसका उद्देश्य किसी को निशाना बनाना नहीं है। सतीशन ने यहां आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की रिपोर्ट के आधार पर पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, उनकी बेटी वीणा टी. और उनके दामाद पी. ए. मोहम्मद रियास के खिलाफ कथित सीएमआरएल रिश्वत मामले में पुलिस जांच कराने के राज्य सरकार के फैसले से जुड़े सवाल का जवाब दिया। ईडी ने सीएमआरएल और एक्सालॉजिक के बीच हुए वित्तीय लेनदेन से जुड़े आरोपों के सिलसिले में विजयन, उनके परिजनों और अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की थी।
कांग्रेस नीत सरकार का हालिसा फैसला सीधे प्राथमिकी दर्ज करने के बजाय जांच आगे बढ़ाने का है। सतीशन ने कहा कि सरकार ने फैसला लेने से पहले आवश्यक कानूनी जांच की है। उन्होंने कहा, ऐसा फैसला लेना सरकार की कानूनी बाध्यता है और अब यह फैसला ले लिया गया है।
माकपा के राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप को खारिज करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, यह सरकार किसी को निशाना बनाने, पीछे पड़ने या बदले की भावना से काम नहीं कर रही है। जैसा कि मैंने कहा, कानून अपना काम करेगा। सरकार के इस फैसले पर हमला बोलते हुए माकपा ने आरोप लगाया कि एक अजीब स्थिति पैदा हो गई है, जिसमें ऐसा लग रहा है कि राज्य सरकार वामपंथी दल को निशाना बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी नीत सरकार से हाथ मिला रही है।
सतीशन ने कहा कि जांच का सामना कर रहे लोगों के पास जांच के दौरान अपना पक्ष रखने के सभी कानूनी अधिकार होंगे। उन्होंने कहा, जब कानून अपना काम करेगा, तो सभी के पास सभी अधिकार उपलब्ध होंगे। जांच के दौरान, उन्हें अपना पक्ष रखने और जो भी बात वे कहना चाहते हैं, उसे प्रस्तुत करने का पूरा अधिकार होगा।
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