KYC अपडेट के नाम पर चल रही ठगी, एक गलत क्लिक और जिंदगी भर की कमाई गायब
KYC Update Fraud Alert: आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन पर हर दिन दर्जनों मैसेज आते हैं. इनमें से कई संदेश हमारे काम के होते हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से एक खास तरह के संदेशों की बाढ़ आ गई है. यह मैसेज होते हैं KYC यानी अपने ग्राहक को जानो से जुड़े हुए. कभी बैंक खाते को चालू रखने के लिए KYC का दबाव बनाया जाता है, तो कभी रसोई गैस सिलेंडर की सब्सिडी, राशन कार्ड या फिर नौकरीपेशा लोगों के भविष्य निधि खाते को लेकर तुरंत जानकारी अपडेट करने को कहा जाता है. देखने में यह संदेश पूरी तरह असली और जरूरी लगते हैं, लेकिन असलियत में यह साइबर अपराधियों का बिछाया गया एक खतरनाक जाल है. जरा सी असावधानी और एक गलत क्लिक से आपकी मेहनत की पूरी कमाई कुछ ही पलों में गायब हो सकती है.
साइबर ठगों का नया हथियार बना KYC का बहाना
अपराधियों ने अब लोगों को ठगने के लिए सीधे पैसे मांगने का तरीका छोड़ दिया है. वह अच्छी तरह जानते हैं कि आज हर नागरिक किसी न किसी सरकारी योजना, बैंक या जरूरी सेवा से जुड़ा हुआ है. इसी बात का फायदा उठाकर ठग मोबाइल फोन पर संदेश भेजते हैं कि आपकी KYC की मियाद पूरी हो चुकी है. मैसेज में साफ तौर पर लिखा होता है कि अगर आपने अगले चौबीस घंटे के भीतर अपनी जानकारी नहीं भरी, तो आपका खाता बंद कर दिया जाएगा या गैस की आपूर्ति रोक दी जाएगी. इस तरह की चेतावनी देखकर आम इंसान घबरा जाता है. जल्दबाजी में वह बिना सोचे समझे उस संदेश में दिए गए लिंक को दबा देता है और यहीं से ठगी की असली शुरुआत होती है.
फर्जी लिंक को ऐसे पहचानें और बचें
संदेश असली है या नकली, इसकी पहचान सबसे पहले उसमें दिए गए लिंक को देखकर की जा सकती है. जालसाज जो लिंक भेजते हैं, वह किसी आधिकारिक संस्था के पते से बिल्कुल मेल नहीं खाते हैं. बैंक या सरकारी विभागों के वेब पते हमेशा सुरक्षित और साफ होते हैं. वहीं ठग छोटे किए गए लिंक या फिर अजीब अक्षरों से बने पते भेजते हैं, जिनमें किसी जानी पहचानी कंपनी के नाम की स्पेलिंग जानबूझकर गलत लिखी होती है. अगर आप उस पते को ध्यान से पढ़ेंगे, तो आपको उसमें साफ तौर पर गड़बड़ी नजर आ जाएगी. कोई भी जिम्मेदार बैंक या विभाग कभी भी ऐसे बेतरतीब लिंक के जरिए ग्राहकों से निजी जानकारी नहीं मांगता है.
डराने वाली भाषा ही है जालसाजों की सबसे बड़ी पहचान
साइबर ठगों का पूरा खेल इंसान के मन में डर पैदा करने पर टिका होता है. उनके भेजे गए संदेशों की भाषा बेहद आक्रामक और डराने वाली होती है. मैसेज में लिखा होगा कि आपका एटीएम कार्ड ब्लॉक कर दिया गया है, बिजली का कनेक्शन काट दिया जाएगा या सिम कार्ड हमेशा के लिए बंद हो जाएगा. इस तरह की धमकियों के साथ ही नीचे एक फॉर्म भरने का दबाव बनाया जाता है, जिसमें बैंक खाते की संख्या, जन्मतिथि और गुप्त पासवर्ड जैसी चीजें मांगी जाती हैं. असली वित्तीय संस्थान कभी भी अपने ग्राहकों को इस तरह से डराते नहीं हैं और न ही किसी सेवा को बिना उचित सूचना के एकदम से बंद करने की धमकी देते हैं.
असमंजस की स्थिति में सीधे करें सही जगह बात
अगर आपके फोन पर भी इस तरह का कोई संदेश आता है, तो घबराने या तुरंत कोई कदम उठाने की बिल्कुल जरूरत नहीं है. सबसे पहले उस संदेश को वहीं छोड़ दें और उसमें दिए गए किसी भी नंबर या लिंक का इस्तेमाल न करें. अगर आपको सच में लगता है कि आपका कोई खाता बंद हो सकता है, तो अपनी पासबुक, रसीद या बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद टोल फ्री नंबर निकालें. सीधे कस्टमर केयर पर फोन मिलाकर अपनी स्थिति के बारे में बात करें. आप चाहें तो अपनी नजदीकी बैंक शाखा या गैस एजेंसी के दफ्तर जाकर भी आमने सामने पूरी बात पता कर सकते हैं.
सावधानी ही है सबसे बड़ा सुरक्षा चक्र
इंटरनेट की दुनिया में सुरक्षित रहने का सबसे पहला नियम यह है कि अपनी निजी जानकारी किसी के साथ साझा न की जाए. किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर मोबाइल में कोई नई ऐप डाउनलोड न करें और न ही किसी स्क्रीन शेयरिंग सुविधा को चालू करें. अगर किसी लिंक को खोलने के बाद आपसे ओटीपी मांगा जाता है, तो उसे बिल्कुल दर्ज न करें. अपने मोबाइल में अनजान नंबरों से आने वाले संदेशों को समय समय पर ब्लॉक करते रहें. थोड़ी सी जागरूकता और धैर्य रखकर आप खुद को और अपने परिवार को इस तरह की ऑनलाइन जालसाजी से पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं.
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कैंसर जैसी दवाओं की कीमतों में 10 गुना अंतर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एमआरपी तय करने के तरीके पर उठाए सवाल
नई दिल्ली, 22 सितंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर को लेकर सख्त सवाल उठाए हैं। अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच दवाओं की कीमतों और उनकी बिक्री से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि अगर किसी दवा को कंपनी दुकानदार को 2,700 रुपए में बेचती है और उसी दवा पर 27,000 अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) लिखा जाता है, तो यह बहुत बड़ा अंतर है। कोर्ट ने पूछा कि ऐसी कीमतों पर रोक लगाने वाली अथॉरिटी चुप क्यों है?
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि जब कोई दवा कंपनी दुकानदार को 2,700 में बेच रही है, तो उसका एमआरपी 27,000 क्यों रखा जा रहा है?
कोर्ट ने कहा कि अगर दवा की कीमत में 10 गुना का अंतर है, तो इसका कारण समझना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि दवाओं की कीमत पर नजर रखने वाली सरकारी अथॉरिटी इस मामले में क्या कर रही है?
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने कोर्ट को बताया कि दवा (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत करीब 1,000 दवाओं की कीमत पर सीधा नियंत्रण है। लेकिन जो दवाएं इस सूची में नहीं हैं, उनकी शुरुआती कीमत तय करने पर वैसी रोक नहीं है। उनके मुताबिक, कोई कंपनी नई दवा बाजार में उतारते समय अपनी शुरुआती कीमत खुद तय कर सकती है। कीमत तय होने के बाद उसमें सालाना 10 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं करने का नियम है।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि बाजार में करीब 82 प्रतिशत दवाएं ऐसी हैं, जो तय कीमत वाली सूची में नहीं आतीं। उन्होंने यह भी बताया कि बाजार में करीब 60 हजार ब्रांड हैं, जबकि कीमत तय करने की व्यवस्था 5 हजार से कम दवाओं पर लागू होती है।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि अगर दवाओं की कीमतों की जानकारी दुकानदारों के पास उपलब्ध रहेगी, तो क्या इससे मरीज को वास्तव में फायदा होगा?
जस्टिस मेहता ने कहा कि जब किसी मरीज को इमरजेंसी में तुरंत दवा की जरूरत होती है, तब उसका परिवार दवा लेने से पहले कीमतों की लंबी जांच नहीं करेगा।
एडवोकेट कपिल सिब्बल ने इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस (आईपीए) की ओर से कोर्ट में कहा कि दवाओं की ऊंची कीमत के लिए निर्माता जिम्मेदार नहीं हैं। रिटेलर्स दवाओं पर बहुत ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं। इस पर जस्टिस मेहता ने सवाल उठाते हुए कहा कि दवाओं पर एमआरपी तो निर्माता ही तय करते हैं। अगर किसी दवा की एमआरपी बहुत ज्यादा है, तो यह सवाल उठता है कि इतनी ऊंची कीमत तय कौन कर रहा है?
--आईएएनएस
एएसएच/एबीएम
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