भारत में सर्वाइकल कैंसर से लड़ाई के लिए एचपीवी टीकाकरण और डीएनए आधारित जांच अहम: सरकार
नई दिल्ली, 17 जनवरी (आईएएनएस)। मानव पैपिलोमावायरस (एचपीवी) के खिलाफ टीकाकरण और डीएनए आधारित स्क्रीनिंग तक पहुंच को मजबूत करना भारत में सर्वाइकल कैंसर के उन्मूलन के लिए बेहद जरूरी है। यह बात स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने शनिवार को कही।
ये विशेषज्ञ एम्स (एम्स) द्वारा आयोजित भारत के पहले राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में बोल रहे थे, जिसका उद्देश्य सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन के एजेंडे को तेज करना है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की अतिरिक्त सचिव और प्रबंध निदेशक अराधना पटनायक ने सर्वाइकल कैंसर को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने के लिए सरकार की अटूट प्रतिबद्धता दोहराई।
उन्होंने कहा, “भारत के लिए सर्वाइकल कैंसर का उन्मूलन एक हासिल किया जा सकने वाला लक्ष्य है और हम रोकथाम, स्क्रीनिंग और उपचार- तीनों स्तरों पर तेजी से कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।”
पटनायक ने आगे कहा, “हमारा फोकस एचपीवी टीकाकरण के तेजी से विस्तार और सभी स्तरों पर स्क्रीनिंग को मजबूत करने पर है, खासकर एचपीवी डीएनए टेस्टिंग जैसी उच्च प्रदर्शन वाली विधियों के जरिए, ताकि हर महिला को समय पर जांच और इलाज मिल सके। मजबूत प्रणालियों, स्पष्ट संचालन प्रोटोकॉल और राज्यों व अन्य हितधारकों के साथ सतत साझेदारी के जरिए हम सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन को वास्तविकता बना सकते हैं और देशभर की लाखों महिलाओं के स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं।”
नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) प्रो. डॉ. वी.के. पॉल ने कहा, “भारत के पास सर्वाइकल कैंसर को समाप्त करने का ऐतिहासिक अवसर है, लेकिन इसके लिए तेजी, व्यापक स्तर पर कार्यान्वयन और पूरे सिस्टम का समन्वय जरूरी है।”
उन्होंने साक्ष्य-आधारित कार्यान्वयन मॉडल की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “हमें ऐसे पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने होंगे, जो यह दिखाएं कि एचपीवी डीएनए आधारित स्क्रीनिंग और सेल्फ-सैंपलिंग को बड़े पैमाने पर, खासकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से, कैसे लागू किया जा सकता है। इससे भारत को एक राष्ट्रीय मॉडल विकसित करने में मदद मिलेगी, जिससे हर महिला को समय पर स्क्रीनिंग, सटीक जांच और प्रभावी फॉलो-अप का लाभ मिल सके।”
एम्स के डॉ. बी.आर. अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी और ऑनको-एनेस्थीसिया एवं पैलिएटिव मेडिसिन विभागों द्वारा आयोजित इस शिखर सम्मेलन का फोकस तीन प्रमुख स्तंभों पर रहा।
इनमें एचपीवी टीकाकरण के विस्तार से लेकर उच्च प्रदर्शन वाली एचपीवी डीएनए टेस्टिंग के जरिए स्क्रीनिंग को मजबूत करना, सेल्फ-सैंपलिंग विधियों को बढ़ावा देना और प्रभावी कैंसर उपचार के साथ पूरी प्रक्रिया को जोड़ना शामिल था।
सम्मेलन में एकरूप राष्ट्रीय मानक संचालन प्रक्रियाएं तैयार करने, हब-एंड-स्पोक केयर मॉडल लागू करने और इलाज व फॉलो-अप की प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर भी चर्चा हुई, ताकि देशभर में समान और उच्च गुणवत्ता वाली देखभाल सुनिश्चित की जा सके।
एम्स के डॉ. बी.आर. अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अभिषेक शंकर ने कहा, “सर्वाइकल कैंसर से अब अलग-थलग तरीके से नहीं निपटा जा सकता। सरकार, चिकित्सकों, नवोन्मेषकों और मरीज प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाना रोकथाम, शुरुआती पहचान और प्रभावी इलाज को तेज करने के लिए जरूरी गति और जवाबदेही पैदा करता है।”
उन्होंने कहा, “इस पहल के जरिए हमारा लक्ष्य स्पष्ट और व्यावहारिक सिफारिशें तय करना है, जो भारत के सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन रोडमैप को दिशा देंगी।”
इस शिखर सम्मेलन में देशभर के एम्स संस्थानों, राज्य स्वास्थ्य विभागों, कैंसर संस्थानों, डब्ल्यूएचओ, यूनिसेफ, आईसीएमआर, सिविल सोसायटी संगठनों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों सहित 500 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन का समापन एक राष्ट्रीय ‘कॉल टू एक्शन’ के साथ हुआ, जिसमें भारत में सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन को तेज करने के लिए प्राथमिक कदमों की रूपरेखा तय की गई।
--आईएएनएस
डीएससी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
समुद्री विज्ञान और बायोटेक्नोलॉजी से मजबूत होगी भारत की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार: जितेंद्र सिंह
नई दिल्ली, 17 जनवरी (आईएएनएस)। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने शनिवार को कहा कि समुद्री विज्ञान और बायोटेक्नोलॉजी को एक साथ जोड़ने से भारत की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के अवसरों को मजबूत किया जा सकता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह बात अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित अटल सेंटर फॉर ओशन साइंस एंड टेक्नोलॉजी फॉर आइलैंड्स (एसीओएसटीआई) के दौरे के दौरान कही। इस दौरान उन्होंने ब्लू इकोनॉमी को मजबूत करने और स्थानीय लोगों की आजीविका बढ़ाने से जुड़ी कई समुद्री तकनीकी परियोजनाओं की शुरुआत और समीक्षा की।
मंत्री ने कहा कि जैसे-जैसे भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे भविष्य में देश की आर्थिक तरक्की का बड़ा हिस्सा अप्रयुक्त समुद्री संसाधनों से आएगा।
उन्होंने बताया कि सरकार का ब्लू इकोनॉमी पर विशेष ध्यान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दृष्टिकोण को दर्शाता है कि देश का विकास केवल मुख्य भूमि तक सीमित न होकर द्वीपों और तटीय क्षेत्रों को साथ लेकर किया जाना चाहिए।
डॉ. सिंह ने कहा कि समुद्री संसाधन अब तक कम खोजे गए हैं, लेकिन आने वाले समय में ये भारत की आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएंगे, खासकर तब जब जमीन पर मौजूद पारंपरिक संसाधन धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। ब्लू इकोनॉमी से रोजगार बढ़ेगा, निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, पर्यावरण की रक्षा होगी और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत बनेगी।
उन्होंने बताया कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास बायोटेक्नोलॉजी के लिए अलग नीति है, जिसे बायोई3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) कहा जाता है। समुद्री जैव संसाधनों से प्लास्टिक के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प, नई दवाइयां और मूल्यवान जैव उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
डॉ. सिंह ने कहा कि ऐसे प्रयासों से एक साथ रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और बायोइकोनॉमी को मजबूती मिलेगी।
उन्होंने यह भी बताया कि गैर-पशु आधारित खाद्य उत्पाद, समुद्री पोषण के नए विकल्प, कचरे से उपयोगी चीजें बनाने की तकनीक और निर्यात के लिए समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्र तेजी से उभर रहे हैं। खासतौर पर यूरोप में इन उत्पादों की मांग बढ़ रही है।
मंत्री ने जोर देकर कहा कि स्वयं सहायता समूहों और महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना जरूरी है, ताकि ये योजनाएं परिवारों की आमदनी बढ़ाने में मदद करें और वोकल फॉर लोकल तथा लोकल फॉर ग्लोबल की सोच को आगे बढ़ाया जा सके।
उन्होंने कहा कि यदि सीएसआईआर और बायोटेक्नोलॉजी शोध संस्थानों जैसे संगठनों के साथ मिलकर काम किया जाए तो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत की ब्लू इकॉनमी का एक बड़ा केंद्र बन सकता है।
मंत्री ने भरोसा दिलाया कि सरकार इस क्षेत्र के साथ लगातार जुड़ी रहेगी और इन प्रयासों से द्वीपों को लंबे समय तक वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक लाभ मिलेंगे।
--आईएएनएस
डीबीपी/डीकेपी
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