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बांग्लादेश में इस्लामी लामबंदी का पुनरुत्थान, ‘तौहीदी जनता’ के उभार से बढ़ी चिंता: रिपोर्ट

कैनबरा, 17 जनवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में ‘तौहीदी जनता’ नामक इस्लामी जनआंदोलन के पुनरुत्थान ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह उभार संगठित उग्रवाद के रूप में नहीं, बल्कि नैतिकता के नाम पर दबाव बनाने वाली जनवादी राजनीति (कोर्सिव पॉपुलिज़्म) के रूप में सामने आ रहा है, जो उन हालात में पनपता है जब संस्थाएं कमजोर हों, कानून-व्यवस्था ढीली पड़े और राजनीतिक वैधता पर सवाल उठें।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह लामबंदी खुले तौर पर काम करती है और ‘गैर-इस्लामी’ मूल्यों को निशाना बनाना धार्मिक कर्तव्य के रूप में पेश करती है। इसी वजह से यह तात्कालिक दमन से बचते हुए सार्वजनिक स्थानों और सामाजिक व्यवहार को नए सिरे से आकार देने में सफल हो रही है।

ऑस्ट्रेलिया स्थित पत्रिका द इंटरप्रेटर में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 16 वर्षों तक शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार ने चुनावी प्रक्रिया, मजबूत सुरक्षा तंत्र और राज्य-समर्थित धर्मनिरपेक्ष “बंगाली राष्ट्रवाद” के सहारे शासन किया। इस दौरान इस्लामी दलों और धार्मिक नेटवर्कों को दबाया गया, अपने साथ मिलाया गया या विभाजित कर दिया गया।

रिपोर्ट में कहा गया, “सार्वजनिक धार्मिक आचरण को तो सहन किया गया, लेकिन राज्य के नियंत्रण से बाहर राजनीतिक इस्लाम को सख्ती से प्रबंधित किया गया। इससे खुले टकराव सीमित रहे, लेकिन धार्मिक राजनीति खत्म नहीं हुई; वह अनौपचारिक और राजनीति-विहीन क्षेत्रों में चली गई। अगस्त 2024 में हसीना के सत्ता से हटने के साथ ही यह व्यवस्था ढह गई, जिससे न केवल राजनीतिक शून्य पैदा हुआ, बल्कि नैतिक अधिकार का भी संकट सामने आ गया।”

हसीना के हटने के बाद बने सत्ता-शून्य में, रिपोर्ट के अनुसार, ‘तौहीदी जनता’ उभर कर सामने आई, जिसने सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने के लिए धार्मिक कर्तव्य का आह्वान किया।

रिपोर्ट में बताया गया, “यह कोई औपचारिक संगठन नहीं है, बल्कि एक ऐसा लेबल है जिसके तहत अलग-अलग तत्व एकत्र होते हैं। ये सार्वजनिक स्थानों में दखल देते हैं, व्यवहार पर पहरा लगाते हैं, सांस्कृतिक गतिविधियों में बाधा डालते हैं और महिलाओं से जुड़े आयोजनों को निशाना बनाते हैं। इसकी ताकत इसकी अस्पष्टता में है—बिना किसी नेतृत्व या औपचारिक ढांचे के यह भीड़, प्रतीकों और नैतिक दबाव के जरिए काम करता है, न कि संस्थागत मौजूदगी के जरिए।”

रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि ‘तौहीदी जनता’ के कथित समर्थकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में प्रत्यक्ष हिंसा की घटनाएं भी सामने आई हैं।

--आईएएनएस

डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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सोने की तेजी से भारतीय परिवारों की संपत्ति में 2025 में हुई रिकॉर्ड 117 लाख करोड़ रुपए की बढ़ोतरी: रिपोर्ट

नई दिल्ली, 17 जनवरी (आईएएनएस)। सोने की कीमतों में आई तेज उछाल के चलते 2025 में भारतीय परिवारों की कुल संपत्ति में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

एचडीएफसी म्यूचुअल फंड ईयरबुक 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में भारतीय घरों की संपत्ति में करीब 117 लाख करोड़ रुपए या लगभग 1.3 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई है, जिससे परिवारों की खर्च करने की क्षमता भी मजबूत हुई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 25 वर्षों में सोने की कीमतों में वृद्धि के चलते यह संपत्ति में सबसे बड़ी बढ़ोतरी है।

साल 2025 में 15 दिसंबर तक सोने की कीमत प्रति 10 ग्राम करीब 57,000 रुपए बढ़ी। इससे पहले 2024 में भी सोने की कीमतों में 14,000 रुपए प्रति 10 ग्राम की बढ़ोतरी हुई थी।

सोने की कीमतों में इस तेज उछाल से लोगों की संपत्ति में बड़ा इजाफा हुआ है, जिसके चलते सोने के बदले लिए जाने वाले रिटेल लोन में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 भारतीय शेयर बाजार के लिए स्थिरता का साल रहा। वहीं, सोना जैसे वैकल्पिक निवेश ने बेहतरीन प्रदर्शन किया।

इस दौरान जब शेयर बाजार पर दबाव था, तब सोना एक सुरक्षित निवेश बनकर सामने आया और निवेशकों का भरोसा जीता।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2025 में भारत का प्रदर्शन वैश्विक बाजारों के मुकाबले कमजोर रहा, जिससे दुनिया के कुल शेयर बाजार मूल्य में भारत की हिस्सेदारी में गिरावट आई।

निफ्टी का प्रदर्शन वैश्विक और उभरते बाजारों के मुकाबले करीब 25 प्रतिशत कमजोर रहा, जो पिछले करीब 30 वर्षों का सबसे खराब प्रदर्शन माना जा रहा है। हालांकि, इस गिरावट से भारतीय बाजार का वैल्यूएशन अब अपने लंबे समय के औसत स्तर के करीब आ गया है।

वैश्विक स्तर पर 2025 में सोना, उभरते बाजार, यूरोप और मैग्निफिसेंट 7 स्टॉक सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वालों में शामिल रहे। वहीं दूसरी ओर, ऑयल, अमेरिकी डॉलर और बिटकॉइन जैसे निवेश विकल्पों का प्रदर्शन कमजोर रहा।

रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सालों की तेजी के बाद 2025 में स्मॉल-कैप और मिड-कैप शेयरों का प्रदर्शन लार्ज-कैप शेयरों से कमजोर रहा।

हालांकि, बाजार के सभी सेगमेंट में मूल्यांकन में कमी आई है, फिर भी लार्ज-कैप स्टॉक्स अभी भी बेहतर निवेश विकल्प माने जा रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 30 प्रतिशत स्मॉल-कैप शेयर अपने 52 हफ्तों के उच्चतम स्तर से 30 प्रतिशत या उससे ज्यादा गिर चुके हैं।

निवेश को लेकर सलाह देते हुए एचडीएफसी म्यूचुअल फंड ने कहा है कि नए निवेशकों को हाइब्रिड फंड्स पर विचार करना चाहिए। इन फंड्स में इक्विटी, डेट और सोने का मिश्रण होता है, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव के समय निवेशकों को बेहतर संतुलन और सुरक्षा मिलती है।

--आईएएनएस

डीबीपी/डीकेपी

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