Supreme Court: जजों के खिलाफ गुमनाम शिकायतों पर भड़का SC, बिल्डरों को फटकार; CBI जांच का दिया आदेश
जजों, एमिकस क्यूरी और वकीलों के खिलाफ लगातार मिल रही गुमनाम शिकायतों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। यह मामला उन रियल एस्टेट कंपनियों और बिल्डरों से जुड़ी सुनवाई के दौरान सामने आया, जिन पर घर खरीदारों को कथित तौर पर नुकसान पहुंचाने, सबवेंशन स्कीम का गलत इस्तेमाल करने, प्रोजेक्ट में देरी करने और निवेश की रकम वापस नहीं करने के आरोपों की जांच चल रही है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि अगर गुमनाम शिकायतों के पीछे किसी बिल्डर या अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बेंच में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
‘हम CBI जांच का आदेश देंगे’
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट गुमनाम शिकायतों की CBI जांच कराने का निर्देश दे सकता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इन्हें भेजने के पीछे कौन लोग हैं।
CJI ने सवाल किया कि इन मामलों में बिल्डरों की ओर से कौन-कौन से वकील पेश हो रहे हैं। उन्होंने शिकायतों को लेकर नाराजगी जताते हुए कहा कि क्या बिल्डरों को लगता है कि इस तरह की गुमनाम शिकायतों से अदालत पर दबाव बनाया जा सकता है।
बेंच ने यह भी कहा कि वह शिकायतों के पीछे जिम्मेदार लोगों का पता लगाएगी। कोर्ट के मुताबिक, यदि जरूरत पड़ी तो CBI को FIR दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया जा सकता है।
अगली सुनवाई में शिकायतों की जांच की बात
सुनवाई के दौरान CJI ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि अगली तारीख पर शिकायतों का एक और सेट उन्हें दिया जाएगा। उन्होंने शिकायतों की जांच कर यह पता लगाने को कहा कि उन्हें लिखने या भेजने के लिए कौन जिम्मेदार है।
बेंच ने टिप्पणी की कि प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि इनमें कुछ बिल्डरों की भूमिका हो सकती है। साथ ही, उन वकीलों की भूमिका की भी जांच की जरूरत हो सकती है, जिन्होंने बिल्डरों को इस तरह की शिकायतें करने की सलाह दी हो।
सबवेंशन स्कीम मामले में CBI की जांच
सुप्रीम कोर्ट के सामने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बिल्डरों और बैंक अधिकारियों के बीच कथित मिलीभगत से जुड़ी CBI जांच की स्टेटस रिपोर्ट पेश की।
मामला उन सबवेंशन स्कीम से जुड़ा है, जिनमें कई घर खरीदारों को यह भरोसा दिलाया गया था कि निर्माण पूरा होने या घर का कब्जा मिलने तक उनके होम लोन की EMI या प्री-EMI बिल्डर चुकाएगा। आरोप है कि कुछ मामलों में बैंक से रकम जारी होने के बावजूद प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं हुए और घर खरीदारों पर EMI चुकाने का बोझ बना रहा।
कई खरीदारों को लंबे समय तक अपने घर का कब्जा नहीं मिला। इसके बावजूद उन्हें बैंक लोन की किस्तें भरनी पड़ीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की स्थिति को गंभीरता से लिया है।
CBI ने कई FIR और चार्जशीट दाखिल कीं
पिछली सुनवाई में CBI की जांच की जानकारी देते हुए बताया गया था कि एजेंसी ने बिल्डरों और बैंक अधिकारियों से जुड़े मामलों में कई FIR दर्ज की हैं। इनमें से कुछ मामलों की जांच पूरी हो चुकी है और संबंधित अदालतों में चार्जशीट भी दाखिल की गई हैं।
जांच के दौरान कुछ बैंक अधिकारियों की भूमिका भी सामने आने की बात कही गई है। ऐसे अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की गई है।
CBI ने कुछ बैंकों से संबंधित अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए अभियोजन स्वीकृति भी मांगी है। इनमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक, HDFC बैंक और ICICI बैंक का नाम शामिल है।
अप्रैल 2025 में शुरू हुई थी जांच
सबवेंशन स्कीम के कथित दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में CBI जांच का निर्देश दिया था। इस मामले में घर खरीदारों ने आरोप लगाया था कि बिल्डरों और वित्तीय संस्थानों के बीच हुए समझौतों का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने जांच के दौरान बिल्डरों, बैंक अधिकारियों और संबंधित वित्तीय संस्थानों की भूमिका की पड़ताल करने को कहा था। अदालत का उद्देश्य यह पता लगाना है कि होम लोन की रकम किस तरह जारी की गई और क्या इसमें नियमों का उल्लंघन या किसी तरह की मिलीभगत हुई।
अब इसी मामले की सुनवाई के दौरान जजों और वकीलों के खिलाफ गुमनाम शिकायतों का मुद्दा सामने आने से कोर्ट ने इसे भी गंभीरता से लिया है। हालांकि, शिकायतों के पीछे किसकी भूमिका है, यह CBI जांच या आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
No Insurance No Fuel Rule: अब बिना इंश्योरेंस नहीं मिलेगा पेट्रोल-डीजल; गाड़ियों की नंबर प्लेट स्कैन करेंगे कैमरे
देशभर में बिना वैध इंश्योरेंस के सड़कों पर दौड़ रहे वाहनों पर नकेल कसने के लिए सरकार और बीमा नियामक (IRDAI) एक बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बाद अब 'नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल' (No Insurance, No Fuel) व्यवस्था को धरातल पर उतारने की तैयारी तेज हो गई है।
इसके तहत पेट्रोल पंपों को सीधे वाहनों के बीमा डेटाबेस से जोड़ा जाएगा, जिससे बिना इंश्योरेंस वाली गाड़ियों की पहचान कर उन्हें पेट्रोल या डीजल देने से रोका जा सके।
पेट्रोल पंपों पर कैमरे स्कैन करेंगे नंबर प्लेट
इस नई व्यवस्था के तहत पेट्रोल पंपों पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन (ANPR) कैमरे लगाए जाएंगे। जैसे ही कोई गाड़ी ईंधन भरवाने के लिए पंप पर पहुंचेगी, ये कैमरे उसकी नंबर प्लेट को तुरंत स्कैन करेंगे। अगर वाहन का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस एक्टिव (वैध) नहीं पाया जाता है, तो पेट्रोल पंप का सिस्टम ऑटोमैटिक तरीके से फ्यूल डिस्पेंसिंग रोक देगा।
दिल्ली से होगी ट्रायल की शुरुआत
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने 4 अगस्त को केंद्र सरकार को दिल्ली से एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्देश दिया था। IRDAI जल्द ही दिल्ली समेत कुछ प्रमुख शहरों में इसका ट्रायल शुरू करने जा रहा है। देश में मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 146 के तहत थर्ड-पार्टी बीमा अनिवार्य होने के बावजूद आधे से अधिक वाहन मालिक इसे रिन्यू नहीं कराते हैं, जिसे रोकने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है।
नई गाड़ियों के लिए बदले थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के नियम
सुप्रीम कोर्ट ने नई गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन के समय खरीदे जाने वाले अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की समयसीमा में भी बदलाव किया है:
- नई कार: अब 3 साल के बजाय 4 साल का अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस लेना होगा।
- नई बाइक/स्कूटी: अब 5 साल के बजाय 6 साल का अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस लेना होगा।
पीड़ितों को राहत और इंश्योरेंस सेक्टर पर असर
बिना बीमा वाली गाड़ियों से हादसे होने पर पीड़ितों और उनके परिजनों को मुआवजे के लिए सालों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इस सख्त नियम से सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों को तुरंत आर्थिक मुआवजा मिल सकेगा।
वहीं, दूसरी ओर नियम लागू होने से जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के प्रीमियम कलेक्शन में भारी बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी। वित्त वर्ष 2026 में देश की टॉप-5 मोटर इंश्योरेंस कंपनियों ने मोटर प्रीमियम के रूप में करीब ₹48,400 करोड़ जुटाए थे।
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