Modi की Delhi में छक्के लगा गये Putin, Global South में Russia का नया Power Network देखकर Trump हैरान
नई दिल्ली में BRICS का मंच इस बार सिर्फ दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बैठक नहीं बल्कि तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था का एक जीवंत कूटनीतिक नक्शा नजर आया। इसका सबसे स्पष्ट संकेत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की दिल्ली यात्रा में दिखाई देता है। 11 और 12 सितंबर के दौरान पुतिन ने भारत, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, मलेशिया, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेतृत्व के साथ अलग-अलग बातचीत की। यानी एक ही मंच पर एशिया, अफ्रीका, अरब जगत और Global South की अलग-अलग रणनीतिक धुरियों को साधने की कोशिश दिखाई दी है।
सबसे महत्वपूर्ण बैठक स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रही। यह सिर्फ भारत-रूस संबंधों की समीक्षा नहीं थी, बल्कि ऐसे समय में हुई है जब रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में है, भारत अपनी strategic autonomy को बनाए रखते हुए अमेरिका, यूरोप और रूस, तीनों के साथ संबंधों को संतुलित कर रहा है और दुनिया ऊर्जा तथा व्यापार के नए संकटों से गुजर रही है। मोदी और पुतिन ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, अंतरिक्ष, राजनीतिक सहयोग, critical minerals और औद्योगिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों की समीक्षा की। दोनों देशों ने व्यापार और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया।
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इसके बाद पुतिन की दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ बातचीत हुई। यहां रूस का लक्ष्य साफ दिखाई देता है। अफ्रीका में अपने राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव को लगातार मजबूत करना। रामाफोसा ने रूस-दक्षिण अफ्रीका व्यापार बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि पुतिन ने अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों को विशेष महत्व देने की बात कही।
मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के साथ बैठक और भी रणनीतिक है। रूस और मिस्र के रिश्तों में ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और परमाणु सहयोग पहले से महत्वपूर्ण हैं। बातचीत में रूसी अनाज की आपूर्ति और मिस्र में एल-दबाआ परमाणु परियोजना का मुद्दा सामने आया। यानी रूस मध्य पूर्व में सिर्फ राजनीतिक खिलाड़ी नहीं, बल्कि ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण साझेदार बनकर मौजूद है।
मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ बातचीत रूस की दक्षिण-पूर्व एशिया नीति की ओर इशारा करती है। यह संबंध BRICS से आगे ASEAN और Indo-Pacific की आर्थिक तथा रणनीतिक संभावनाओं तक जाता है। वहीं इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद के साथ बातचीत रूस की अफ्रीका नीति का दूसरा महत्वपूर्ण सिरा है। यह एक ऐसा अफ्रीकी देश है जिसके साथ मॉस्को के राजनयिक संबंध 120 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।
फिर आता है संयुक्त अरब अमीरात। अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ पुतिन की बैठक विशेष महत्व रखती है, क्योंकि UAE अरब दुनिया में रूस का एक प्रमुख आर्थिक साझेदार है। साथ ही ईरान और खाड़ी के बीच चल रहे तनाव के दौर में मॉस्को का अबू धाबी से संवाद उसकी मध्यस्थ और संतुलनकारी भूमिका को भी मजबूत करता है।
इस पूरी श्रृंखला को एक साथ देखें तो तस्वीर बेहद स्पष्ट है। पुतिन दिल्ली में सिर्फ BRICS Summit में हिस्सा लेने नहीं आए थे, वह BRICS के भीतर रूस की strategic connectivity को मजबूत करने भी आये थे। देखा जाये तो भारत से लेकर दक्षिण अफ्रीका, मिस्र से UAE और मलेशिया से इथियोपिया तक, रूस उन देशों से संवाद बढ़ा रहा है जो अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के रूप में किसी न किसी रूप में अधिक बहुध्रुवीय विश्व की वकालत करते हैं।
यही दिल्ली BRICS की असली कहानी है। रूस पश्चिम से टकराव के बीच अकेला नहीं दिखना चाहता; वह एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में अपने लिए वैकल्पिक आर्थिक, ऊर्जा, व्यापारिक और राजनीतिक नेटवर्क तैयार कर रहा है। दूसरी ओर भारत इस पूरे समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति है। इस तरह BRICS का मंच अब केवल रूस-चीन की धुरी नहीं रह गया है। यह कई शक्तियों के बीच बातचीत का ऐसा मंच बन रहा है जहां मॉस्को को नई साझेदारियां, नई दिल्ली को strategic autonomy और Global South को अपनी सामूहिक bargaining power दिखाई दे रही है। यही वजह है कि दिल्ली में पुतिन की ये छह मुलाकातें उस विश्व व्यवस्था की झलक हैं जिसमें शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे एक ध्रुव से निकलकर कई दिशाओं में फैल रहा है। यहां एक बात और काबिलेगौर है कि अमेरिका ने पुतिन को विश्व राजनीति में अलग थलग करने के लिए पूरा जोर लगाया लेकिन पुतिन की शक्ति बढ़ती जा रही है और उन्हें अपनी स्थिति मजबूत बनाये रखने में भारत और चीन भरपूर मदद भी दे रहे हैं।
-नीरज कुमार दुबे
यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया
महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को किसी देश के दबाव का हथियार नहीं बनने देने से लेकर समुद्र में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो बेहद अहम मुद्दे उठाए। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्था जिन महत्वपूर्ण खनिजों पर तेजी से निर्भर हो रही है, उनकी आपूर्ति सुरक्षित और भरोसेमंद रहनी चाहिए। साथ ही, उन्होंने संकट के समय नाविकों को मदद पहुंचाने के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। यानी नई दिल्ली में मोदी ने एक तरफ संसाधनों की सुरक्षा का सवाल उठाया, तो दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार की उस मानवीय कड़ी पर ध्यान खींचा, जिस पर समुद्र के रास्ते होने वाला पूरा कारोबार टिका है।
मोदी ने इसी क्रम में समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को भी प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार तभी सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है, जब समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें, आपूर्ति मार्ग खुले रहें और नाविक सुरक्षित रहें। पश्चिम एशिया तथा काला सागर क्षेत्र के संघर्षों का असर समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ा है। इससे पहले ईरान और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ अपनी अलग-अलग बैठकों में भी मोदी ने समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता, व्यापार की निर्बाध आवाजाही और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था।
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शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने नाविकों के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव भी रखा। इसका उद्देश्य संकट के समय समुद्री अधिकारियों और संबंधित देशों के तंत्र को जोड़कर संकट संबंधी सूचनाएं पहुंचाना, चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना, परिवारों तक सूचना पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर बचाव तथा निकासी अभियान में मदद करना है। समुद्री व्यापार पर बढ़ते संघर्षों के असर के बीच यह प्रस्ताव सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार की उस कमजोर कड़ी को सामने लाता है, जिस पर करोड़ों टन माल की आवाजाही टिकी हुई है।
लेकिन नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में मोदी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक रेखा ब्रिक्स के स्वरूप को लेकर रही। उन्होंने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया कि ब्रिक्स पश्चिम के खिलाफ खड़ा कोई राजनीतिक गठबंधन है। मोदी ने कहा कि ब्रिक्स किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला समावेशी मंच है। पिछले दो दशकों में ब्रिक्स ने अपनी अलग पहचान बनाई है और अब उसके सामने चुनौती अपनी एकता तथा सहमति को ठोस परिणामों में बदलने की है।
यही वजह रही कि मोदी ने ग्लोबल साउथ को केवल निर्णयों का पालन करने वाला पक्ष बनाए रखने की बजाय नियम बनाने में प्रभावी भूमिका देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेक देश वैश्विक संकटों की पहली कतार में खड़े हैं, लेकिन निर्णय लेने की व्यवस्था में पीछे हैं। इस असंतुलन को बदलने के लिए वैश्विक शासन व्यवस्था को आज की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग भी इसी संदर्भ में सामने आई।
मोदी ने ब्रिक्स के भीतर युवाओं, राजनयिकों और नीति-निर्माताओं को बातचीत की कला, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने की बात भी रखी, ताकि ग्लोबल साउथ केवल बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों को आकार देने वाला समूह बने।
उन्होंने ब्रिक्स के भीतर व्यापारिक अड़चनों को घटाने, निवेश बढ़ाने और कारोबारी संबंधों को मजबूत करने पर भी जोर दिया। भारत की अध्यक्षता में कृषि, स्वास्थ्य, कौशल और स्मार्ट बिजली तंत्र जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए ढांचे बनाए गए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए दस प्रमुख व्यापारिक बाधाओं को हटाने, हर वर्ष सौ नए उद्यमों को सदस्य देशों के बाजारों तक पहुंचाने और एक हजार नई कारोबारी साझेदारियां विकसित करने का लक्ष्य भी सामने रखा गया है।
इस पूरे घटनाक्रम में मोदी की रणनीति साफ दिखाई दी। महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर समुद्री सुरक्षा, व्यापार से लेकर वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व तक, उन्होंने ब्रिक्स को किसी ध्रुव के खिलाफ खड़ा करने के बजाय वैश्विक व्यवस्था में अधिक हिस्सेदारी मांगने वाले मंच के रूप में पेश किया। संदेश यही रहा कि भविष्य साझा है तो उसे आकार देने का अधिकार भी साझा होना चाहिए। नई दिल्ली घोषणा के साथ ब्रिक्स ने इसी दिशा में आगे बढ़ने की साझा प्राथमिकताएं तय कीं।
-नीरज कुमार दुबे
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