यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया
महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को किसी देश के दबाव का हथियार नहीं बनने देने से लेकर समुद्र में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो बेहद अहम मुद्दे उठाए। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्था जिन महत्वपूर्ण खनिजों पर तेजी से निर्भर हो रही है, उनकी आपूर्ति सुरक्षित और भरोसेमंद रहनी चाहिए। साथ ही, उन्होंने संकट के समय नाविकों को मदद पहुंचाने के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। यानी नई दिल्ली में मोदी ने एक तरफ संसाधनों की सुरक्षा का सवाल उठाया, तो दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार की उस मानवीय कड़ी पर ध्यान खींचा, जिस पर समुद्र के रास्ते होने वाला पूरा कारोबार टिका है।
मोदी ने इसी क्रम में समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को भी प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार तभी सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है, जब समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें, आपूर्ति मार्ग खुले रहें और नाविक सुरक्षित रहें। पश्चिम एशिया तथा काला सागर क्षेत्र के संघर्षों का असर समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ा है। इससे पहले ईरान और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ अपनी अलग-अलग बैठकों में भी मोदी ने समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता, व्यापार की निर्बाध आवाजाही और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था।
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शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने नाविकों के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव भी रखा। इसका उद्देश्य संकट के समय समुद्री अधिकारियों और संबंधित देशों के तंत्र को जोड़कर संकट संबंधी सूचनाएं पहुंचाना, चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना, परिवारों तक सूचना पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर बचाव तथा निकासी अभियान में मदद करना है। समुद्री व्यापार पर बढ़ते संघर्षों के असर के बीच यह प्रस्ताव सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार की उस कमजोर कड़ी को सामने लाता है, जिस पर करोड़ों टन माल की आवाजाही टिकी हुई है।
लेकिन नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में मोदी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक रेखा ब्रिक्स के स्वरूप को लेकर रही। उन्होंने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया कि ब्रिक्स पश्चिम के खिलाफ खड़ा कोई राजनीतिक गठबंधन है। मोदी ने कहा कि ब्रिक्स किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला समावेशी मंच है। पिछले दो दशकों में ब्रिक्स ने अपनी अलग पहचान बनाई है और अब उसके सामने चुनौती अपनी एकता तथा सहमति को ठोस परिणामों में बदलने की है।
यही वजह रही कि मोदी ने ग्लोबल साउथ को केवल निर्णयों का पालन करने वाला पक्ष बनाए रखने की बजाय नियम बनाने में प्रभावी भूमिका देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेक देश वैश्विक संकटों की पहली कतार में खड़े हैं, लेकिन निर्णय लेने की व्यवस्था में पीछे हैं। इस असंतुलन को बदलने के लिए वैश्विक शासन व्यवस्था को आज की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग भी इसी संदर्भ में सामने आई।
मोदी ने ब्रिक्स के भीतर युवाओं, राजनयिकों और नीति-निर्माताओं को बातचीत की कला, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने की बात भी रखी, ताकि ग्लोबल साउथ केवल बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों को आकार देने वाला समूह बने।
उन्होंने ब्रिक्स के भीतर व्यापारिक अड़चनों को घटाने, निवेश बढ़ाने और कारोबारी संबंधों को मजबूत करने पर भी जोर दिया। भारत की अध्यक्षता में कृषि, स्वास्थ्य, कौशल और स्मार्ट बिजली तंत्र जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए ढांचे बनाए गए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए दस प्रमुख व्यापारिक बाधाओं को हटाने, हर वर्ष सौ नए उद्यमों को सदस्य देशों के बाजारों तक पहुंचाने और एक हजार नई कारोबारी साझेदारियां विकसित करने का लक्ष्य भी सामने रखा गया है।
इस पूरे घटनाक्रम में मोदी की रणनीति साफ दिखाई दी। महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर समुद्री सुरक्षा, व्यापार से लेकर वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व तक, उन्होंने ब्रिक्स को किसी ध्रुव के खिलाफ खड़ा करने के बजाय वैश्विक व्यवस्था में अधिक हिस्सेदारी मांगने वाले मंच के रूप में पेश किया। संदेश यही रहा कि भविष्य साझा है तो उसे आकार देने का अधिकार भी साझा होना चाहिए। नई दिल्ली घोषणा के साथ ब्रिक्स ने इसी दिशा में आगे बढ़ने की साझा प्राथमिकताएं तय कीं।
-नीरज कुमार दुबे
असंभव को संभव कर दिखाना सबके बस की बात नहीं, Delhi में सुबह 4 बजे तक चली थी Modi की खास Diplomacy, तब जाकर माने थे Iran-UAE
नई दिल्ली में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत ने उस वक्त बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की, जब पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर आमने-सामने खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) एक साझा BRICS घोषणा पर सहमत हो गए। करीब छह महीने से जारी युद्ध और लगातार बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देशों के बीच सहमति बनना सिर्फ BRICS के लिए नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक भूमिका के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।
दरअसल, BRICS के विदेश मंत्रियों की मई में हुई बैठक के दौरान ईरान और UAE के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो पाया था। पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं और संघर्ष की व्याख्या अलग-अलग थी। ऐसे में दिल्ली शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि ऐसी भाषा तैयार की जाए, जिस पर ईरान और UAE समेत BRICS के सभी सदस्य देश एक साथ खड़े हो सकें।
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भारत की अध्यक्षता में हुई लंबी और बेहद कठिन बातचीत के बाद आखिरकार वह रास्ता निकाला गया। बातचीत आधी रात के बाद तक चलती रही और करीब चार बजे तक सहमति बनाने की कोशिशें जारी रहीं। अंतिम घोषणा में किसी एक देश को सीधे तौर पर युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर सामूहिक चिंता जताई गई। सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं।
इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत उस समय सामने आया, जब ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच BRICS सम्मेलन के इतर मुलाकात हुई। युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह सबसे महत्वपूर्ण संपर्कों में से एक माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब क्षेत्रीय संघर्ष ने ईरान और खाड़ी देशों के रिश्तों को बेहद संवेदनशील बना दिया है।
हम आपको बता दें कि BRICS की नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता जताते हुए नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार और समुद्री आवाजाही को सुरक्षित रखने की जरूरत भी रेखांकित की गई। घोषणा का मकसद किसी पक्ष की जीत या हार तय करना नहीं, बल्कि ऐसी न्यूनतम साझा जमीन तैयार करना था, जिस पर अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देश भी एक साथ खड़े हो सकें।
यहीं भारत की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। BRICS के विस्तार के बाद संगठन के भीतर अब सिर्फ आर्थिक हितों का मेल नहीं है, बल्कि ईरान, UAE और अन्य देशों के बीच गंभीर भू-राजनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं। ऐसे माहौल में सर्वसम्मति से घोषणा पारित कराना अपने आप में एक राजनीतिक उपलब्धि है। भारतीय कूटनीति ने पक्ष के साथ खड़े होने की बजाय ऐसी भाषा पर जोर दिया, जिसे विरोधी धड़े भी स्वीकार कर सकें।
देखा जाये तो इसका असर BRICS की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा। अगर युद्ध जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर ईरान और UAE जैसे विरोधी हितों वाले देश एक ही घोषणा पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, तो दिल्ली शिखर सम्मेलन ने यह संदेश जरूर दिया है कि BRICS सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। अब वह ऐसे भू-राजनीतिक संकटों में भी साझा रुख बनाने की कोशिश कर रहा है, जहां वैश्विक शक्तियों के बीच सीधा टकराव मौजूद है।
-नीरज कुमार दुबे
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