Delhi Riots मामले में Umar Khalid और Sharjeel Imam की जमानत पर सुनवाई टली, 30 सितंबर को अगली तारीख
दिल्ली उच्च न्यायालय ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों के पीछे कथित ‘‘व्यापक साजिश’’ से जुड़े यूएपीए मामले में सोमवार को कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई 30 सितंबर के लिए सूचीबद्ध कर दी। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की पीठ ने दिल्ली पुलिस के वकील द्वारा स्थगन का अनुरोध किए जाने के बाद सुनवाई टाल दी। विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडे ने कहा कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू स्वास्थ्य कारणों से उपस्थित नहीं हो सके हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘मामले की सुनवाई 30 सितंबर के लिए स्थगित की जाती है।’’ खालिद और इमाम के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज है। उन पर फरवरी 2020 के दंगों के कथित मुख्य षड्यंत्रकारियों में शामिल होने का आरोप है। दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए), 2019 और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान यह हिंसा भड़की थी। कार्यकर्ता खालिद सैफी और आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत कई अन्य लोगों पर भी कथित व्यापक साजिश में शामिल होने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। इस मामले की जांच दिल्ली पुलिस का विशेष प्रकोष्ठ कर रहा है।
अदालत ने सोमवार को ताहिर हुसैन की जमानत याचिका पर सुनवाई भी टाल दी और इसे नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया। चार जुलाई को निचली अदालत द्वारा जमानत याचिकाएं तीसरी बार खारिज किये जाने के बाद खालिद और इमाम ने उच्च न्यायालय का रुख किया था। इमाम को इस मामले में 25 अगस्त 2020 को गिरफ्तार किया गया था, जबकि खालिद को 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था।
दिल्ली पुलिस ने उच्च न्यायालय में दोनों की जमानत याचिकाओं का विरोध करते हुए उन्हें दंगों का ‘‘मुख्य षड्यंत्रकारी’’ बताया है। पुलिस ने कहा है कि दोनों मामले में अन्य सह-आरोपियों के समानता के आधार पर जमानत का दावा नहीं कर सकते। पुलिस ने यह भी कहा है कि मौजूदा जमानत याचिकाएं उच्चतम न्यायालय के पांच जनवरी के आदेश के विपरीत हैं।
उस आदेश में कहा गया था कि उन्हें संरक्षित गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद या एक वर्ष पूरा होने पर, जो भी पहले हो, ही रिहाई की मांग करनी चाहिए। चार जुलाई को निचली अदालत ने खालिद की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उसके पास उच्चतम न्यायालय के पांच जनवरी के आदेश का पालन करने के अलावा ‘‘कोई विकल्प नहीं’’ है और इसलिए वह याचिका पर ना तो विचार कर सकती है और ना ही उन्हें राहत दे सकती है। उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने दो सितंबर 2025 को खालिद और इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने पांच जनवरी को इस फैसले को बरकरार रखा, लेकिन सह-आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दे दी। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने उस वक्त कहा था कि खालिद और इमाम के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। शीर्ष अदालत ने 22 मई को सह-आरोपी अब्दुल खालिद सैफी और तस्लीम अहमद को छह महीने की अंतरिम जमानत दी थी।
Supreme Court को बताया गया, Ram Mandir चढ़ावा चोरी में 25 सितंबर तक Charge Sheet देगी SIT
उच्चतम न्यायालय को सोमवार को बताया गया कि अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गबन की जांच कर रही अदालत द्वारा गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) 25 सितंबर तक या उससे पहले पहला आरोपपत्र दाखिल करेगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ को बताया कि इस मामले में पहली गिरफ्तारी के बाद से कानूनी तौर पर तय 90 दिन की समय-सीमा जल्द ही खत्म होने वाली है। मेहता ने कहा, ‘‘पहली गिरफ्तारी की तारीख से 90 दिन की अवधि 25 सितंबर को पूरी हो जाएगी, इसलिए हमें आरोपपत्र दाखिल करना होगा, अन्यथा उन्हें (आरोपियों को) डिफॉल्ट जमानत मिल जाएगी।’’ शीर्ष अदालत ने सीलबंद लिफाफे में एसआईटी की ओर से दाखिल की गई विस्तृत वस्तु स्थिति रिपोर्ट का भी अवलोकन किया।
दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 167(2) के तहत, यदि जांच एजेंसी तय अवधि यानी 60 या 90 दिन के भीतर अदालत में आरोपपत्र दाखिल करने में विफल रहती है तो आरोपी को वैधानिक जमानत पाने का अधिकार मिल जाता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 187 ने पहले लागू दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 167(2) का स्थान लिया है। शीर्ष अदालत ने इससे पहले एसआईटी को अपनी जांच जल्द पूरी करने और उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने का निर्देश दिया था।
न्यायालय ने एसआईटी को निर्देश दिया था कि वह चढ़ावा चोरी मामले में जांच में हुई प्रगति की वस्तु स्थिति रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में दाखिल करे। शीर्ष अदालत ने 27 जुलाई को चढ़ावे के कथित गबन की जांच के लिए पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) किरण एस. की अध्यक्षता में गठित चार सदस्यीय एसआईटी का संज्ञान लिया था। उसने उत्तर प्रदेश सरकार से जांच टीम में एक फॉरेंसिक ऑडिटर को भी शामिल करने को कहा था।
सुधारात्मक कदमों पर जोर देते हुए पीठ ने कहा था कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। पीठ ने एसआईटी को दो सप्ताह के भीतर वस्तु स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया था। पीठ ने 20 जुलाई को उत्तर प्रदेश सरकार से चढ़ावे के कथित गबन की जांच के लिए एसआईटी गठित करने की संभावना के बारे में उसे अवगत कराने को कहा था।
शीर्ष अदालत ने 13 जुलाई को उत्तर प्रदेश पुलिस को मामले में वस्तु स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था। पीठ ने चढ़ावे की कथित चोरी की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच के अनुरोध वाली याचिकाओं पर श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को भी नोटिस जारी किया था। राम मंदिर में चढ़ावे के प्रबंधन में अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद सुधाकर सिंह समेत कई याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत का रुख किया था।
उन्होंने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने और मंदिर न्यास के वित्तीय मामलों का ‘फॉरेंसिक ऑडिट’ कराने संबंधी निर्देश का अनुरोध किया था।
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