मैथिली ठाकुर के सपोर्ट में आईं कंगना:रोल्स रॉयस कार पर बोलीं- क्या नेताओं को गरीब रहना चाहिए, 13 करोड़ की कार पर ट्रोल हुईं मैथिली
लालबागचा राजा के दर्शन करने मुंबई पहुंचीं गायिका और बिहार की बीजेपी विधायक मैथिली ठाकुर के लग्जरी कार इस्तेमाल करने पर शुरू हुआ विवाद गहरा गया है। करीब 13 करोड़ रुपए कीमत वाली ब्लू रोल्स रॉयस कुलिनन कार में पहुंचने पर सोशल मीडिया यूजर्स उन्हें ट्रोल कर रहे हैं। अब इस मामले में बीजेपी सांसद और एक्ट्रेस कंगना रनोट मैथिली के बचाव में उतर आई हैं। कंगना ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर पोस्ट शेयर करके ट्रोल्स पर निशाना साधा और सवाल उठाया कि नेताओं के अच्छे जीवन जीने पर लोगों को आपत्ति क्यों होती है। कंगना का जवाब- क्या हमारा अपना करियर नहीं? कंगना रनोट ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में लिखा कि कुछ लोगों को नेताओं के अच्छे से रहने पर भी समस्या होती है। उन्होंने लिखा कि हमारी युवा विधायक मैथिली ठाकुर को लग्जरी कार का इस्तेमाल करने के लिए ट्रोल किया जा रहा है। हम लोग समाज सेवा के काम से जुड़े हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमारा अपना करियर, पर्सनल लाइफ और लोकप्रियता नहीं हो सकती। कंगना ने आगे लिखा कि हम बिना किसी स्वार्थ के जनता की सेवा करते हैं, फिर भी कुछ लोगों को आपत्ति होती है। क्या हमसे यह उम्मीद की जाती है कि हम हमेशा गरीब और बेजान बनकर रहें। रोल्स रॉयस कार को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मैथिली ठाकुर मुंबई के प्रसिद्ध लालबागचा राजा पंडाल में गणपति दर्शन के लिए पहुंची थीं। वे जिस ब्लू कलर की रोल्स रॉयस कार में आई थीं, उसकी ऑन-रोड कीमत मुंबई में 13 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई जा रही है। राजनीतिक करियर शुरू होने के एक साल के भीतर इतनी महंगी गाड़ी का इस्तेमाल करने पर सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। कई यूजर्स ने लिखा कि एक साल की राजनीति में इतना बदलाव कैसे आ गया। बिहार की सबसे कम उम्र की विधायक हैं मैथिली ठाकुर मैथिली ठाकुर बिहार की सबसे युवा विधायक हैं। वे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ी थीं और आरजेडी के बड़े नेता बिनोद मिश्रा को हराकर विधायक बनीं। मैथिली मूल रूप से बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी की रहने वाली हैं। उनका परिवार संगीत की शिक्षा और आगे के करियर के लिए बाद में नई दिल्ली के द्वारका में शिफ्ट हो गया था। उनके पिता रमेश ठाकुर खुद संगीत शिक्षक हैं, जिनसे और अपने दादाजी से मैथिली ने बचपन में शास्त्रीय और लोक संगीत की ट्रेनिंग ली थी। मैथिली को सिंगिंग शो से मिली पहचान राजनीति में आने से पहले मैथिली ठाकुर की पहचान एक लोक गायिका के रूप में रही है। साल 2017 में रियलिटी सिंगिंग शो 'राइजिंग स्टार इंडिया' में हिस्सा लेने के बाद उन्हें पूरे देश में पहचान मिली थी। मैथिली मैथिली, भोजपुरी, भक्ति भजन और फिल्मी गानों की अपनी प्रस्तुतियों के लिए जानी जाती हैं। यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उनकी बहुत बड़ी फैन फॉलोइंग है। त्रिशा कृष्णन के समर्थन में भी बोल चुकी हैं कंगना मैथिली ठाकुर से पहले कंगना रनोट हाल ही में साउथ एक्ट्रेस त्रिशा कृष्णन के समर्थन में भी अपनी बात रख चुकी हैं। तमिलनाडु में जब त्रिशा को लेकर विवाद खड़ा हुआ था और उन्हें ट्रोल किया गया था, तब कंगना ने महिलाओं को निशाना बनाए जाने पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि जब भी कोई विवाद होता है या कैरेक्टर लिंचिंग की बात आती है, तो हमेशा महिलाओं को ही निशाना बनाया जाता है। पूरी खबर पढ़ें …………… कंगना रनोट से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… 'मेरी जवानी या बेडरूम के बारे में सपने मत देखो':बाबा रामदेव के बयान पर कंगना रनोट भड़कीं, बोलीं- मेरा चरित्र आपसे बेहतर है एक्ट्रेस और बीजेपी सांसद कंगना रनोट ने योग गुरु बाबा रामदेव की टिप्पणी पर भड़कते हुए कहा कि बाबा जी, मेरी जवानी या बेडरूम के बारे में सपने मत देखिए। दरअसल, कंगना ने बाबा रामदेव की उस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने कंगना के 'जेनरेशन गटर' वाले बयान को लेकर कहा था कि ये बिगड़े दिमाग की निशानी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इंटरव्यू:‘द कन्फ़ेशन...’ की कहानी घटना से ज्यादा नैतिक सवालों पर है: आदिल हुसैन
आदिल हुसैन की फिल्म ‘द कन्फ़ेशन ऑफ मैरी’ टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित हुई है। फिल्म में नाना पाटेकर भी अहम भूमिका में हैं। इस फिल्म को लेकर आदिल ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। क्या यह फिल्म 1966 के केरल के चर्चित ‘मदाथरुवी केस’ पर बेस्ड है? फिल्म को किसी एक व्यक्ति या घटना की सीधी कहानी के तौर पर देखना सही नहीं होगा। फिल्म के संदर्भ में किसी पुराने घटनाक्रम से प्रेरणा लिए जाने की बात रिपोर्ट्स में कही गई थी, लेकिन उस घटना की सटीक पहचान को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इसलिए इसे किसी वास्तविक व्यक्ति का सीधा चित्रण मानने के बजाय इसके विषय और नैतिक द्वंद्व के स्तर पर देखना ज्यादा उचित है। कहानी का मुख्य केंद्र उस व्यक्ति पर है, जो बेहद जिम्मेदारी वाले पद पर है और परिस्थितियों के दबाव के बावजूद अपने सिद्धांतों को संभालने की कोशिश करता है। फिल्म किसी एक घटना को दोहराने के बजाय उससे जुड़े मानवीय और नैतिक सवालों को सिनेमाई अंदाज में पेश करती है। क्या किसी वास्तविक वकील को देखकर आपने किरदार की तैयारी की? मैंने किसी एक वास्तविक वकील की नकल करने के बजाय इस बात पर ध्यान दिया कि इस पेशे की काम करने की प्रक्रिया क्या होती है? मेरे लिए किसी किरदार की विश्वसनीयता उसके बाहरी हावभाव से ज्यादा उसकी सोच और निर्णय लेने की प्रक्रिया में होती है। अगर किरदार वकील है तो उसके सामने आने वाली परिस्थितियों को उसी पेशेवर नजरिए से समझना जरूरी है। वह किसी व्यक्ति के बारे में अपनी निजी धारणा बनाने के बजाय उसके पक्ष को कानूनी नजरिए से देखेगा। इसलिए मैंने किसी खास व्यक्ति को कॉपी करने के बजाय पेशे की तकनीकी समझ को प्राथमिकता दी। आपकी अभिनय शैली और नाना पाटेकर की प्रक्रिया में क्या समानता दिखी? समानता शायद इस स्तर पर है कि दोनों के लिए किरदार को समझना महत्वपूर्ण है, लेकिन हर अभिनेता का रास्ता अलग हो सकता है। थिएटर की पृष्ठभूमि ने मुझे भी यह सिखाया है कि किरदार को केवल सतह पर नहीं देखना चाहिए, लेकिन किसी कलाकार की अपनी तैयारी, अनुभव और भीतर की प्रक्रिया उसके अभिनय को अलग बनाती है। नाना साहब की खासियत यह लगी कि वह स्क्रिप्ट पढ़ते हुए ही किरदार के भीतर मौजूद किसी जरूरी तत्व को पकड़ लेते हैं। उस प्रक्रिया को बाहर से देखकर पूरी तरह समझना संभव नहीं है, क्योंकि अभिनेता के भीतर चल रही तैयारी दिखाई नहीं देती। स्वतंत्र सिनेमा के लिए फेस्टिवल सर्किट कितना महत्वपूर्ण है? स्वतंत्र सिनेमा के लिए फेस्टिवल सर्किट एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है, क्योंकि वहां ऐसी फिल्मों को दर्शक मिलते हैं जिन्हें पारंपरिक व्यावसायिक रिलीज के जरिए पर्याप्त पहचान मिलना मुश्किल हो सकता है। फेस्टिवल में फिल्म सिर्फ दिखाई नहीं जाती, बल्कि उसके साथ बातचीत और नए लोगों से जुड़ने का अवसर भी मिलता है। उसके बाद वितरण, प्रचार और दर्शकों तक पहुंच जैसे चरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
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