Responsive Scrollable Menu

आरती के बाद हाथों को आंखों से क्यों लगाया जाता है? जानें इस परंपरा का धार्मिक महत्व

Aarti lene ka sahi tarika: हिंदू धर्म में आरती संपन्न होने के बाद भक्त आरती की थाली के ऊपर अपने हाथ घुमाकर उन्हें अपनी आंखों और सिर से लगाते हैं। यह परंपरा लगभग हर मंदिर और घर की पूजा में देखने को मिलती है। मान्यता है कि यह क्रिया भगवान का आशीर्वाद ग्रहण करने का प्रतीक मानी जाती है, इसी वजह से आरती के बाद इसे अनिवार्य रूप से निभाया जाता है।

इस परंपरा से जुड़ी धार्मिक मान्यता
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, आरती की लौ को दिव्य ऊर्जा और भगवान की कृपा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जब भक्त आरती की लौ के ऊपर हाथ घुमाता है, तो वह उस दिव्य ऊर्जा को अपने भीतर ग्रहण करता है, और फिर उसे अपनी आंखों व सिर पर लगाकर स्वयं को उस आशीर्वाद से आच्छादित करता है। कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि आंखों को ज्ञान और दृष्टि का केंद्र माना जाता है, इसी वजह से भगवान की कृपा को सबसे पहले आंखों तक पहुंचाना शुभ माना जाता है।

आरती लेने का सही तरीका
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, आरती लेते समय दोनों हाथों को आरती की थाली के ऊपर हल्के से घुमाना चाहिए, न कि लौ को सीधे छूना चाहिए। मान्यता है कि इसके बाद हाथों को पहले आंखों पर और फिर सिर पर लगाना चाहिए, जिसे विनम्रता और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान मन में भगवान का ध्यान करना और श्रद्धा भाव बनाए रखना भी अत्यंत आवश्यक बताया गया है।

आरती करते समय रखें इन बातों का ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आरती हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में यानी दक्षिणावर्त घुमानी चाहिए, क्योंकि इसे सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह की दिशा माना जाता है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि आरती के दौरान जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए और पूरी आरती संपन्न होने तक शांत भाव से खड़े रहना चाहिए। आरती के समय घंटी और शंख बजाना भी परंपरा का अहम हिस्सा माना जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी है इसका महत्व
धार्मिक महत्व के साथ-साथ इस परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझाया जाता है। कहा जाता है कि आरती की लौ से निकलने वाली हल्की गर्मी और कपूर की सुगंध हथेलियों के जरिए शरीर तक पहुंचती है, जिसे मन को शांत करने और सकारात्मक ऊर्जा देने में सहायक माना जाता है। इसके अलावा इस क्रिया के दौरान कुछ क्षण ठहरकर श्रद्धा भाव से खड़े रहना मानसिक स्थिरता प्रदान करने वाला भी माना जाता है।

आज भी हर आरती में निभाई जाती है यह परंपरा
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन आरती के बाद हाथों को आंखों और सिर से लगाने की यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। आज भी देशभर के मंदिरों और घरों में आरती के बाद भक्त इसी तरह भगवान का आशीर्वाद ग्रहण करते नजर आते हैं।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।

Continue reading on the app

Jal Jhulni Gyaras 2026: परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी क्यों कहते हैं? जानें डोल ग्यारस की अनोखी परंपरा

Jal Jhulni Gyaras 2026: हिंदू पंचांग में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। देश के कई हिस्सों में इसे जलझूलनी एकादशी, डोल ग्यारस, वामन एकादशी, पद्मा एकादशी और पार्श्व एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत के साथ कई जगहों पर भगवान की प्रतिमा को डोले या पालकी में विराजमान कर जल स्रोत तक ले जाने की परंपरा है।

22 सितंबर को मनाई जाएगी जलझूलनी एकादशी
साल 2026 में जलझूलनी एकादशी यानी डोल ग्यारस का पर्व मंगलवार, 22 सितंबर को मनाया जाएगा। यह भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करने की परंपरा भी बताई जाती है।

दी गई तिथि के अनुसार एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात 8 बजे शुरू होकर 22 सितंबर की रात 9:43 बजे समाप्त होगी। व्रत पारण 23 सितंबर को सुबह करीब 6:09 बजे से 10:04 बजे के बीच बताया गया है।

परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी क्यों कहते हैं?
परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी कहने के पीछे कई क्षेत्रों में प्रचलित जल विहार और डोल यात्रा की परंपरा जुड़ी हुई है। इस दिन मंदिरों में भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाकर डोले या पालकी में विराजमान किया जाता है। इसके बाद भक्त भजन-कीर्तन और शोभायात्रा के साथ भगवान की प्रतिमा को नदी, तालाब या किसी अन्य जल स्रोत के किनारे ले जाते हैं।

वहां भगवान का जल विहार कराया जाता है और पूजा-अर्चना की जाती है। इसी परंपरा के कारण इसे जलझूलनी एकादशी और डोल ग्यारस कहा जाता है।

क्या है भगवान के जल विहार की परंपरा?
जलझूलनी एकादशी के दिन कई स्थानों पर मंदिरों से भगवान की प्रतिमा को फूलों और अन्य पूजन सामग्री से सजाकर पालकी में विराजमान किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु गाजे-बाजे और भक्ति भाव के साथ डोल यात्रा निकालते हैं।

शोभायात्रा जल स्रोत तक पहुंचने के बाद भगवान की पूजा की जाती है। कुछ क्षेत्रों में भगवान को जल स्नान या जल विहार कराने की परंपरा है। हालांकि, इस परंपरा का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकता है।

माता यशोदा और बाल कृष्ण से जुड़ी लोक मान्यता
जलझूलनी एकादशी से जुड़ी एक लोक मान्यता माता यशोदा और बाल कृष्ण से भी संबंधित है। मान्यता के अनुसार, जन्माष्टमी के कुछ दिनों बाद माता यशोदा ने बाल गोपाल का जलवा पूजन किया था और उनके वस्त्र धोए थे।

इसी लोक परंपरा को कई जगहों पर जलझूलनी एकादशी से जोड़ा जाता है। हालांकि, यह मान्यता और इससे जुड़ी रस्में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में देखने को मिलती हैं।

परिवर्तिनी एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु की आराधना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करने की परंपरा भी है।

भक्त इस दिन एकादशी व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा, ध्यान तथा भजन-कीर्तन करते हैं। इसके अलावा दान-पुण्य और धार्मिक कार्य करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।

भगवान विष्णु के करवट बदलने से जुड़ी मान्यता
परिवर्तिनी एकादशी के नाम के पीछे भगवान विष्णु के करवट बदलने की धार्मिक मान्यता बताई जाती है। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसी वजह से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

कैसे निकाली जाती है डोल यात्रा?
जलझूलनी एकादशी के अवसर पर कई मंदिरों में भगवान की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाकर डोले में विराजमान किया जाता है। श्रद्धालु भगवान की पालकी लेकर शोभायात्रा के रूप में जल स्रोत तक पहुंचते हैं।

इस दौरान भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। जल स्रोत के पास भगवान की पूजा के बाद जल विहार या स्नान की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद प्रतिमा को वापस मंदिर लाया जाता है।

Continue reading on the app

  Sports

मोहम्मद शमी शुरू करेंगे राजनीतिक पारी? जयंत चौधरी से अमरोहा एक्सप्रेस ने की मुलाकात, सोशल मीडिया पर लगने लगे कयास

Mohammed Shami Meets Jayant Chaudhary: उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी की मुलाकात ने सूबे की राजनीति में हलचल पैदा हो गई है. जयंत चौधरी द्वारा सोशल मीडिया पर तस्वीर साझा किए जाने के बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या 'अमरोहा एक्सप्रेस' क्रिकेट पिच छोड़कर रालोद के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरेंगे या उनके बड़े भाई राजनीति में कदम रखेंगे. Sun, 20 Sep 2026 23:10:36 +0530

  Videos
See all

Uttarakhand News Today: 12 बजते ही उत्तराखंड से आई बड़ी खबर! | CM Dhami | BJP | Breaking News #tmktech #vivo #v29pro
2026-09-20T18:30:20+00:00

Rashtravad | Debate में Sonia Gandhi पर राधिका खेड़ा का बयान, फिर जो कांग्रेस प्रवक्ता का चढ़ा पारा #tmktech #vivo #v29pro
2026-09-20T18:30:17+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers