Supreme Court पर्यावरण न्याय का वटवृक्ष, विकास व संरक्षण में संतुलन जरूरी: CJI
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि भारतीय अदालतों के सामने अब सवाल संरक्षण बनाम विकास का नहीं, बल्कि यह है कि दोनों के बीच तालमेल कैसे बिठाया जाए और उन्हें साथ-साथ कैसे कायम रखा जाए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इसी के साथ उच्चतम न्यायालय को पर्यावरणीय न्याय का ‘वटवृक्ष’ करार दिया। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने न्यायालय के पर्यावरण से जुड़े कानूनी फैसलों के चार दशकों के सफर का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण का कोई एक ही संवैधानिक रास्ता नहीं है और उन्होंने ‘कॉपी-पेस्ट’ फैसलों के प्रति आगाह किया।
उन्होंने कहा कि हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने ‘पर्यावरण-केंद्रित आनुपातिकता’ के विचार को स्पष्ट रूप से सामने रखा है, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि पर्यावरण संरक्षण कठोर होने के साथ-साथ इतना बुद्धिमत्तापूर्ण भी होना चाहिए कि वह दुनिया के साथ उसी रूप में जुड़ सके जैसा वह वास्तव में है। सीजेआई ने कहा, ‘‘यह अवधारणा विकास को केवल तभी अनुमति देकर एक बड़े बदलाव की वकालत करती है जब इसके साथ लागू करने योग्य शर्तें, विशेषज्ञों की देखरेख, बहाली, पूरक वनीकरण और जवाबदेही जुड़ी हों।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत यहां विज्ञान भवन में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की ओर से आयोजित ‘पर्यावरण और जलवायु की गतिशीलता का भविष्य’ विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस कार्यक्रम में एनजीटी मोबाइल एप्लिकेशन की शुरुआत की।
सीजेआई ने कहा, ‘‘फिलहाल, हमारी अदालतों के सामने सवाल यह नहीं है कि संरक्षण या विकास में से किसे चुना जाए, बल्कि यह है कि इन दोनों के बीच समन्वय कैसे स्थापित किया जाए और इन्हें साथ-साथ कैसे बनाए रखा जाए।’’ उन्होंने कहा कि एक अहम बदलाव यह है कि यह आंदोलन अब पर्यावरण संबंधी अधिकारों से हटकर जलवायु से जुड़े अधिकारों की ओर बढ़ रहा है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘जलवायु से जुड़े हालिया भारतीय कानूनी फैसलों ने इस सवाल को संवैधानिक नजरिए से और भी अहम बना दिया है। इन फैसलों में यह माना गया है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव समानता, आजीविका और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकारों, और इन अधिकारों का सही ढंग से उपभोग करने के लिए आवश्यक परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं।’’ उन्होंने कहा कि दूसरा बदलाव अलग-थलग पर्यावरणीय नुकसान की जांच से हटकर, संचयी पारिस्थितिक नुकसान को समझने की ओर है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘नदी प्रशासनिक सीमाओं के हिसाब से प्रदूषण का सामना नहीं करती। जंगल एक परियोजना और दूसरी परियोजना के बीच का फर्क नहीं समझते। वातावरण राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानता।
इसलिए, जलवायु से जुड़े मामलों में फैसला करते समय केवल उस परियोजना पर ही गौर नहीं करना चाहिए, बल्कि उस बड़े पारिस्थितिकी तंत्र को भी देखना चाहिए जिसका वह परियोजना एक हिस्सा है।’’ उन्होंने कहा कि आने वाली चुनौतियां और भी मुश्किल होंगी, और ऊर्जा बदलाव के लिए नयी आधारभूत अवसंरचना, नयी प्रौद्योगिकी और ज़मीन व संसाधनों के इस्तेमाल के नये तरीकों की जरूरत होगी। एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का नुकसान और प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों की कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं होती और इनका सबसे नकारात्मक ससर अक्सर उन लोगों पर पड़ता है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए सबसे कम जिम्मेदार होते हैं। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पर्यावरण और जलवायु न्याय के लिए मज़बूत वैश्विक संस्थागत तंत्र विकसित करने के वास्ते संधियों और घोषणाओं से आगे बढ़ने का आह्वान किया, जिसमें एक साझा और लागू करने योग्य अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण न्याय अदालत की संभावना भी शामिल हो।
Dehradun DM को 1 हफ्ते में देनी होगी रिपोर्ट, Uttarakhand के मेडिकल कॉलेजों में फर्जीवाड़े पर एक्शन
उत्तराखंड के मेडिकल शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने उन आरोपों की ज़िला-स्तर पर जांच के आदेश दिए हैं, जिनमें कहा गया है कि राज्य के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए फ़र्ज़ी स्थायी निवास और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण-पत्रों का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने देहरादून के ज़िला मजिस्ट्रेट से एक हफ़्ते के अंदर रिपोर्ट सौंपने को कहा है, क्योंकि मेडिकल एडमिशन और काउंसलिंग की प्रक्रिया अभी चल रही है। यह कदम प्रदीप बहुगुणा की शिकायत के बाद उठाया गया है। उन्होंने शुक्रवार को उनियाल से मुलाक़ात की थी और लगभग 350 उम्मीदवारों की एक सूची सौंपी थी, जिनके दस्तावेज़ों की जांच की ज़रूरत है। बहुगुणा ने कहा कि वह यह दावा नहीं कर रहे हैं कि सभी सर्टिफिकेट नकली हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और एडमिशन से जुड़ी जानकारी से इतना शक पैदा होता है कि इसकी आधिकारिक जांच होनी चाहिए।
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उनियाल ने कहा कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही है और जांच जल्द पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि एडमिशन की प्रक्रिया खत्म होने से पहले संदिग्ध मामलों की स्थिति साफ हो सके। उन्होंने कहा कि शुरुआती जांच में कुछ सर्टिफिकेट नकली पाए गए हैं और स्थायी निवास प्रमाण पत्र के बारे में भी शिकायतें मिली हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी बाहरी व्यक्ति को धोखाधड़ी से स्थायी निवास या स्वतंत्रता सेनानी पर आश्रित होने का प्रमाण पत्र जारी किया गया है, तो यह एक गंभीर मामला होगा। 350 उम्मीदवारों की जांच की मांग करने का कारण बताते हुए बहुगुणा ने समाचार एजेंसी PTI को बताया कि उन्होंने मेडिकल एडमिशन में शामिल उन उम्मीदवारों की एक सूची तैयार की थी जिनके दस्तावेजों की जांच की जानी थी।
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उन्होंने बताया कि उनमें से कई लोगों ने अपनी हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई उत्तराखंड के बाहर की थी, और कुछ ने बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में NEET की परीक्षा दी थी। हालांकि, उन्होंने कहा कि किसी दूसरे राज्य में पढ़ाई करना या कहीं और NEET की परीक्षा देना, अपने आप में जाली सर्टिफिकेट का सबूत नहीं है। बहुगुणा ने कहा मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इन सभी लोगों के सर्टिफिकेट नकली हैं। लेकिन उनके दस्तावेजों की जांच ज़रूरी है। मैंने लगभग 350 नामों की पहचान की है, और हो सकता है कि ऐसे मामलों की असल संख्या इससे ज़्यादा हो।
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